पुष्पा गुप्ता
दद्दा क्यों रिसियाए हैं ! आज दद्दा घर आए हुए हैं. वही दद्दा जो देखते ही देखते राजनीति में बहुत गहरे उतर गए हैं। ऊपर उठने के लिए उन्होंने कुछेक को मौत के घाट भी उतारा। लोग ऐसा कहते हैं।
मगर मैं निश्चित नहीं हूं इस बारे में । जब कभी मेरे मन में हुकहुकी उठती, तो मैं दद्दा से पूछती तो दद्दा इसे चंदूखाने की गप्प कहकर टाल देते। दद्दा के बारे में न जाने ऐसी कितनी बातें चला करती हैं, लेकिन दद्दा कभी इससे विचलित नहीं हुए।
वैसे, दद्दा बहुत दिनों बाद घर आए हैं। सच कहूं तो दद्दा मुझे पसंद नहीं। मगर यह बात न मैं उनसे और न ही अपने पिता जी से कह पाई। दद्दा के स्वर्गवासी पिता और मेरे पिता काफी अच्छे दोस्त रहे।
उनके स्वर्गवासी पिता छत चूने वाले घर में रहकर दम तोड़ दिए, मगर जब से दद्दा विधायक बने हैं तो गाहे-बगाहे किसी नये घर के गृहप्रवेश का निमंत्रण हमें मिलता रहता है।
पिता जी इसी में खुश हो जाते हैं। कहते हैं कि देखा इतना बड़ा आदमी बन गया, मगर हमें नहीं भूला। पर पिता जी की यह बात मेरे समझ में नहीं आती।
मन करता है उनसे पूछूं कि बडे़ आदमी बनने के बाद अपने लोगों का भूलना जरूरी होता है क्या ! पिता जी की वजह से उनका लिहाज करना पड़ता है वरना…
वैसे, दद्दा काफी हंसमुख हैं। बस यही बात उनकी मुझे पसंद आती है। बात-बेबात ठहाके और हर बात को हंसी में उड़ा देना। मैं नहीं चाहती हूं कि दद्दा हमारे घर आएं। मगर जब गाड़ियों की लंबी कतार मेरे घर के सामने लगती है। मोहल्ले वालों की आंखों में जब उत्सुकता दीखती है, तो मेरा उनके न आने का इरादा दम तोड़ देता है।
और हां दद्दा के लग्गू-भग्गू घर के बाहर ही रहते हैं, दद्दा की ये बात भी मुझे पसंद है।
बहुत दिनों बाद आज वही दद्दा घर आए…
‘और बताओ छोटे भइया क्या हाल हैं !’
‘सब आपका आशीर्वाद है दद्दा’
दद्दा झक सफेद पैंट बुशर्ट पहने हुए थे। यहां तक की उनकी चमड़े की चप्पल भी सफेद थी।
‘इस बार दद्दा बहुत दिनों बाद दर्शन दिए!’
‘नागदेवता आए हुए हैं दर्शन कर लो बेटा’ बाहर से आवाज आई।
मैंने इस आवाज को अनसुना कर दिया। दद्दा को देखकर लग रहा था कि शायद उन्होंने भी सुना नहीं।
‘क्या बताएं छोटे भइया, व्यस्तताएं बहुत ज्यादा हो गई हैं!’ दद्दा अपना पैर दूसरे पैर पर चढ़ाते हुए बोले।
‘सो तो है!’
‘अब बतियाओगे ही कि कुछ पिलाओगे भी…’
‘नागदेवता को दूध पिला दे बेटा!’ बाहर से आवाज आई।
दद्दा के चेहर पर एक पल को कुछ भाव आए, पर दूजे पल ही चले गए।
‘ठंडा की गरम!!’
‘आज नागपंचमी का दिन है बेटा! नागदेवता आएं हैं दूध पिला दे बेटा!’ बाहर से फिर आवाज आई।
‘जब तक चाय बन रही है तब तक ठंडा ही ले आओ!’ दद्दा बोले।
सोफे पर कुछ और गड़े । मुझे लगा कि दद्दा ने हंसने की कोशिश की मगर हंस नहीं पाए।
मैं फ्रिज से कोल्डड्रिंक निकालने लगी।
‘बेटा कहां है!’ दद्दा अचानक से पूछे।
‘बालक के साथ ससुराल गए है।’
‘तभी!’ दद्दा कमरे में चारों ओर नजर दौड़ाते हुए बोले :
‘इस बार तो ऐसेम्बली में खूब चिल्लाए!’
‘और नहीं तो क्या! सारे विरोधियों की आवाजें दब गईं’ यह कहकर दद्दा कोल्डड्रिंक उठाने लगे।
‘नागदेवता को दूध पिला दे बेटा’ वही आवाज फिर आई।
पता नहीं क्या हुआ कि दद्दा ने कोल्डड्रिंक नीचे रख दी।
‘क्या हुआ दद्दा…पीजिए न!’
‘जय हो नाग देवता!!!!’
‘चाय पीएंगे!’ मैंने पूछा।
दद्दा ने आंखों से इशारा किया।
मैं किचन में चाय बनाने घुस गई।
‘अच्छा! दद्दा!!!’ चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाते हुए मैं बोली।
‘हूंउ…’
‘तब से आप लोग कुछ ज्यादा ही चीखने-चिल्लाने नहीं लगे हैं, जब से आप लोगों के क्रियाकलापों का टीवी पर सजीव प्रसारण होने लगा है… ’
किसी के यह कहने पर दद्दा बोले : ‘अरे ससुरों को पता तो चले कि हम भी कोई जीव हैं…’ दद्दा हंसे और फिर एकदम से चुप हो गए।
‘नागदेवता आए हैं बेटा! नागपंचमी है।’
‘चाचा-चाची कब आएंगे बैजनाथ धाम से!’ अब दद्दा सोफे पर तन कर बैठ गए और कसमसाते हुए बोले!
‘समय लगेगा! रिश्तेदारी में भी जाएंगे!’ दूध डालते हुए मैं बोली!
‘और चाचा का सुगर कैसा है!’
‘अरे!!!’
‘क्या हुआ!’
‘चीनी डालना तो भूल ही गई थी!’
‘नागदेवता कब से आए हुए हैं! दूध पिला दे बेटा! पुण्य मिलेगा बेटा! पिला दे बेटा! ऐ बेटा! पिला दे बेटा!’
‘दद्दा इस बार का क्या सीन है!’
‘क्यों दद्दा!’
‘दद्दा!!!’
दद्दा की कोई प्रतिक्रिया न पा कर मैंने किचन से बाहर आकर देखा, दद्दा कमरे में थे ही नहीं। तभी बाहर किसी के चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। मैं बाहर भागी।
देखा तो दद्दा एक सपेरे को पीट रहे थे। उनके लग्गू-भग्गू अगर पास आने की कोशिश करते,तो दद्दा उन्हें आंखों के इशारे से दूर कर देते।
संकेत स्पष्ट था कि उसे दद्दा अपने हाथों से ही पीटेंगे! दद्दा के हाथ इस समय करकमल नहीं थे, बल्कि करचप्पल हुए थे।
वे उस बेचारे को अपनी सफेद वाली चप्पल से पीटे जा रहे थे और साथ में ‘दूध पीएगा! क्यों! नागदेवता दूध पीएगा!’ बोले जा रहे थे.





