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ध्यान : सुखासन से साधे स्वयं को!

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 डॉ. विकास मानव

     आसन, प्राणायाम, बंध और मुद्राएं कुंडलिनी जागरण के समय शरीर पर घटने वाली विभिन्न घटनाएं हैं। यानी कुंडलिनी जागरण के बाद जब उर्जा उपर उठती है तो हमारा शरीर उर्जा को जगह देने के लिए स्वयं आसन लगाने लगता है, मुद्रएं और बंध लगाने लगता है। शरीर को यदि प्राण वायु की जरूरत हो तो गहरी श्वास लेकर प्राणायाम करने लगता है।

      यह होता है हमारे होशोहवाश में! हमें पता होता है कि हमें क्या हो रहा है, क्योंकि कुंडलिनी जागरण हमारी बिना जानकारी के नहीं घट सकता! हां, घटता है हमारे जागने में। दूसरों को यह बात समझ में नहीं आती है, तभी तो सन्यासियों को पागल समझा जाता रहा है। 

सुखासन योग का बुनियादी आसन है। सुखासन हमारे शरीर और मन को शांत करते हुए एक ऐसी भावदशा में प्रवेश करवाता है जहां सुख ही सुख है। एक ऐसी स्थिति में प्रवेश करवाता है जहां उर्जा का उपर उठना बहुत आसान हो जाता है।

       सुखासन में शरीर पूरी तरह से शांत, शिथिल और विश्राम पूर्ण अवस्था में आ जाता है। शरीर और मन पर कोई तनाव नहीं होता है, तभी तो शरीर सुख में प्रवेश करता है! क्योंकि तनाव के कारण ही शरीर दुख अनुभव करता रहता है।

       जब कुंडलिनी जागरण घटता है, तब उर्जा के अतिरेक के कारण हमारी रीढ़ सीधी हो जाती है, शरीर शिथिल हो जाता है, श्वास गहरी हो जाती है और नाभि के नीचे मूलाधार पर प्राण उर्जा की चोंट करती है जिससे उर्जा उपर उठने लगती है, और हमारा शरीर सुखासन में प्रवेश करने लगता है।

साधकों के इसी अनुभव के आधार पर फिर इसी प्रक्रिया को दूसरे छोर से लिया गया, कि यदि कुंडलिनी जागरण के घटने पर शरीर सुखासन में चला जाता है तो क्यों न हम सुखासन में प्रवेश करें! ताकि कुंडलिनी जागरण घटित होने की संभावना को बढ़ाया जा सके।

      योग में जो चिजें युगपत घटित होती हैं, उन्हें दोनों छोर से प्रारंभ किया जा सकता है। 

      सामान्यतः पालथी मारकर बैठ जाने को सुखासन कहा गया है। शरीर बिलकुल ढीला, शरीर में कोई तनाव नहीं, श्वास धीमी और गहरी, नाभि को छूती हुई। रीढ़ सीधी, पलकें गिरी हुई, दोनों हाथ गोद में या घुटनों पर रखे हुए, हथेली आकाशोन्मुख।

      सुखासन में दोनों हाथों की मुद्राएं भी बनती है, लेकिन वे “बनती” है, बनानी नहीं पड़ती है। यदि हमारा सुखासन में “प्रवेश” हो जाएगा तो मुद्रा “घटेगी”, यानी हमारे हाथ स्वयं मुद्रा बना लेंगे, हमें नहीं “बनानी” है!

       यदि हम बनाएंगे तो हमारे हाथ तनाव में रहेंगे और प्रवेश में बाधा होगी। अर्थात मुद्रा सुखासन में प्रवेश के बाद की घटना है। और वास्तविकता में तो जितनी भी मुद्राएं हैं, वे सब कुंडलिनी जागरण के बाद शरीर पर घटती है और जरुरी नहीं है कि सारी मुद्राएं घटे ही!

       इसलिए मुद्राएं बनाने में अपना समय नष्ट नहीं करना चाहिए क्योंकि यह बाद में घटने वाली चिजें हैं। ठीक छींक की तरह, अतिरिक्त उर्जा के कारण छींक हमारे शरीर पर घटती है! हम छींक को ला नहीं सकते! इसी भांति मुद्राएं भी घटती हैं। कुछ मुद्राएं सहयोगी हैं, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। 

   सुखासन में सबसे महत्वपूर्ण है रीढ़ का सीधा होना। यदि रीढ़ सीधी होगी तो ही हमारा सुखासन में प्रवेश करना आसान होगा। रीढ़ यदि झुकी हुई होगी तो हमारा सुखासन में प्रवेश करना मुश्किल ही नहीं असंभव होगा।

रीढ़ सीधी होगी, जमीन से नब्बे अंश का कोण बनाती हुई तो हमारे शरीर पर जमीन के गुरूत्वाकर्षण का प्रभाव कम होगा। रीढ़ यदि झुकी हुई होगी तो जमीन का गुरूत्वाकर्षण हमें अपनी ओर खींचेगा जिससे शरीर तनाव में रहेगा और यदि शरीर तनाव में रहा तो ज्यादा देर तक बैठना मुश्किल होगा, शरीर बहुत जल्दी थक जाएगा।

       रीढ़ सीधी नहीं होने पर शरीर यदि तनाव में रहेगा तो मन भी तनाव में रहेगा। और यदि मन तनाव में रहा तो विचार आक्रमण करेंगे और हमारा विचारों के पार निर्विचार को देखना मुश्किल होगा।

       सुखासन में जब हम रीढ़ सीधी करके बैठते हैं, तो हमारे कंधे, हमारे हाथ, छाती और पीठ की हड्डियों का पूरा ढांचा रीढ़ के उपर टंग जाता है, ठीक उसी तरह, जिस तरह से हम कोट को आलमारी में टांगते हैं।

      जैसे ही रीढ़ सीधी होगी तो हमारे शरीर से सारे तनाव हट जाएंगे। क्योंकि टंगी हुई कोई भी चीज तनाव रहित होगी, रिलेक्स होगी।

       तनाव के हटते ही शरीर शांत और शिथिल हो विश्राम में जाने लगेगा। शरीर शांत हो विश्राम में जाने लगेगा तो मन भी शांत हो विश्राम में जाने लगेगा। मन शांत हो विश्राम में जाने लगेगा तो विचारों को भी उर्जा मिलनी बंद हो जाएगी। और यदि विचारों को उर्जा मिलनी बंद हो जाएगी तो विचार लड़खड़ाने लगेंगे, दो विचारों के बीच दूरी बनने लगेगी, खाली जगह बनने  लगेगी और उस खाली जगह से हमें निर्विचार की ध्वनि, निर्विचार का सन्नाटा सुनाई पड़ने लगेगा।

सुखासन में रीढ़ सीधी होगी तो हमारा शरीर शिथिल और विश्राम पूर्ण अवस्था में होगा। शरीर के शिथिल और विश्राम पूर्ण अवस्था में जाते ही हमारी श्वास गहरी होने लगेगी। शरीर में तनाव के कारण जो श्वास छाती तक ही जाती थी, वही श्वास रीढ़ सीधी होने पर शरीर के विश्राम में जाते ही गहरी होकर नाभि के नीचे तक जाकर मूलाधार को छूने लगेगी। 

       श्वास मूलाधार को छूएगी तो श्वास में उपस्थित प्राण तत्व कुंडलिनी उर्जा को सक्रिय करेगा क्योंकि प्राण उर्जा कुंडलिनी का ईंधन है।

    प्राण उर्जा से कुंडलिनी उर्जा सक्रिय होगी तो उपर के चक्रों पर गति करती हुई उन्हें सक्रिय करने लगेगी।

श्वास की चोंट से मूलाधार से उठी उर्जा जब दूसरे भाव वाले चक्र स्वाधिष्ठान से गुजरेगी। रीढ़ सीधी रहेगी तो शरीर की शिथिलता के कारण स्वाधिष्ठान से उठने वाले भाव भी शांत और शिथिल होंगे। यानि उर्जा भाव में नहीं बहेगी और स्वाधिष्ठान चक्र को सक्रिय करती हुई तीसरे विचार वाले चक्र मणिपुर में प्रवेश कर जाएगी।

       गहरी श्वास से शरीर के साथ ही मन के भी शिथिल होने के कारण विचार भी शांत और शिथिल होंगे। अतः उर्जा विचारों में न बहते हुए मणिपुर चक्र को सक्रिय करती हुई चौथे निर्विचार वाले अनाहत् चक्र में प्रवेश करने लगेगी और कुंडलिनी जागरण के घटित होने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

       सुखासन में बैठने से पहले शरीर को थोड़ा थकाना सहयोगी होगा। थोड़ा नाच लें, थोड़ा व्यायाम या कोई खेल खेल लें जिसमें पसीना निकल आए ताकि सुखासन में बाधा पहुंचाने वाले तत्व शरीर से बाहर निकल जाएं।   

       भोजन के तुरंत बाद प्रयोग में नहीं उतरें। खाली पेट हों ताकि नींद और सुस्तीपन से बचा जा सके। तरह पदार्थ ले सकते हैं। जितनी देर तक हमारा शरीर सुखासन में बैठ सके उतनी ही देर बैठना है, शरीर के साथ जबर्दस्ती नहीं करनी है। पैरों में यदि दर्द या ऐंठन हो तो थोड़ी देर के लिए पैेरों को लंबा कर दें, सिर्फ रीढ़ सीधी रखनी है।

      दिवार के सहारे तकिया लगाकर भी बैठ सकते हैं। कुर्सी पर बैठ कर भी कर सकते हैं। सुखासन में सबसे महत्वपूर्ण है “रीढ़ का सीधा होना” और शरीर को सुख में बिठाना।

Ramswaroop Mantri

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