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कैसे बनी जाति?

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रजनीश भारती

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत कह रहे हैं कि “पंडितों ने जाति बनायी।”

पंडित उस वक्त ब्राह्मण ही होते थे।

 अतः भागवत के कहने का साफ मतलब है “ब्राह्मणों ने ही जाति बनायी।”

अम्बेडकर का अनुयायी होने का दावा करने वाले बामसेफ के लोग कह रहे हैं कि हम तो पहले से यही कहते रहे हैं- “ब्राह्मणों ने ही जाति बनायी।”

 इस प्रकार आरएसएस और बामसेफ दोनों एक ही बात कह रहे हैं। दोनों ही ब्राह्मणों को जाति का निर्माता बता रहे हैं।

बामसेफ के लोगों ने अम्बेडकर का फोटो लगाकर यह यह दुष्प्रचार किया कि ‘ब्राह्मणों ने जाति बनायी।’ इससे बहुत लोग यह सोचते होंगे कि अम्बेडकर ने भी यही कहा होगा। परन्तु ऐसा नहीं है।

तो देखिये अम्बेडकर क्या कहते हैं-  “…मैं मनु के विषय में कठोर लगता हूं, परंतु यह निश्चित है कि मुझमें इतनी शक्ति नहीं कि मैं उसका भूत उतार सकूं। वह एक शैतान की तरह जिंदा है, किंतु मैं नहीं समझता कि वह सदा जिंदा रह सकेगा। एक बात मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं कि मनु ने जाति के विधान का निर्माण नहीं किया और न वह ऐसा कर सकता था। जातिप्रथा मनु से पूर्व विद्यमान थी। वह तो उसका पोषक था, इसलिए उसने उसे एक दर्शन का रूप दिया, परंतु निश्चित रूप से हिन्दू समाज का वर्तमान रूप जारी नहीं रहता। प्रचलित जातिप्रथा को ही उसने संहिता का रूप दिया और जाति धर्म का प्रचार किया। जातिप्रथा का विस्तार और उसकी दृढ़ता इतनी विराट है कि यह एक व्यक्ति या वर्ग की धूर्तता और बलबूते का काम नहीं हो सकता।”

(बाबा साहब डा. अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय खण्ड – 1 ‘भारत में जातिप्रथा’ पेज-29 ) 

    इसी पेज पर अम्बेडकर आगे लिखते हैं-  “……तर्क में यह सिद्धांत है कि ब्राह्मणों ने जाति संरचना की। मैंने मनु के विषय में जो कहा है, मैं इससे अधिक और नहीं कहना चाहता, सिवाय यह कहने के कि वैचारिक दृष्टि से यह गलत और इरादतन दुर्भावनापूर्ण हैं। ब्राह्मण और कई बातों के लिए दोषी हो सकते हैं, और मैं नि:संकोच कह सकता हूं कि वे हैं भी, परंतु गैर-ब्राह्मण अन्य जन समुदायों पर जातिप्रथा थोपना उनके बूते के बाहर की बात थी। अपने इस तरह के दर्शन द्वारा, हो सकता है, उन्होंने अपने ही तरीके से इस प्रक्रिया को पनपने में सहायता की हो, परंतु अपनी क्षमता से वे अपनी योजना कार्यान्वित नहीं करा सकते थे।”

                        ‘भारत में जातिप्रथा’ पेज-29

अब यह बात साफ हो गयी कि आरएसएस और बामसेफ दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। विदेशी साम्राज्यवादी ताकतें जनता को जनता से लड़ाने के लिए दोनों को एनजीओ आदि के माध्यम से वित्तपोषित करती हैं। ताकि भारत की जनता विदेशी लुटेरों और उनके भारतीय सहयोगियों के खिलाफ क्रान्ति न कर सके।

विदेशी साम्राज्यवादियों से काला धन पाकर आरएसएस और बामसेफ ने  हजारों करोड़ रूपया फूँककर पूरे समाज में यह स्थापित किया कि ‘ब्राह्मणों ने साजिशन जाति बनायी’।

धर्म क्या कहता है, गीता में कृष्ण दावा कर रहे हैं कि- ‘चातुर्वण्यं मया सृषटम् गुणकर्मविभागश:’ अर्थात पूर्वजन्मों के कुकर्मों के कारण गुण और कर्मों के विभाग से चारों वर्ण मेरे द्वारा रचा गया है। यह दावा भी फर्जी है।

विज्ञान क्या कहता है-

आग पहले लगती है बुझाने का विचार बाद में आता है।

ठंड पहले लगती है स्वेटर पहनने का विचार बाद में आता है।

गर्मी पहले लगती है पंखा झलने का विचार बाद में आता है।

साँप पहले निकलता है लाठी लेकर मारने का विचार बाद में आता है।

यानी वस्तुगत परिस्थिति पहले होती है उससे सम्बन्धित विचार बाद में आता है। इस आधार पर जाति बनने की भौतिक परिस्थिति पहले आती है, जाति नामक विचार बाद में आता है। किसी ब्राह्मण या पंडित के ‘साजिश’ नामक विचार से ‘जाति’ नामक विचार पैदा ही नहीं हो सकता। ब्राह्मण हो या भगवान किसी में दम नहीं है कि वो बिना लोहे के लोहार जाति बना दे, बिना सोनार के सोनार जाति बना दे, बिना नाव के नाविक बना दे।

रिक्शे का आविष्कार न हुआ हो, और कई करोड़ मोहन भागवत मौजूद हों, क्या ये करोड़ों मोहन भागवत मिलकर बिना रिक्शा के रिक्शावान बना सकते हैं? लोहे के बिना लोहार बना सकते हैं? निश्चित रूप से नहीं।

तब यह जानना जरूरी हो जाता है कि जाति व्यवस्था बनी कैसे? इस संबन्ध में आर्थिक सामाजिक विज्ञान क्या कहता है?

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो जाति व्यवस्था एक तरह का उत्पादन संबंध है। अत: उत्पादन के इतिहास का वैज्ञानिक विश्लेषण करके ही जाति व्यवस्था के रहस्य को जान सकते हैं। 

जाति बनने की दो शर्तें हैं-

1- पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही पेशा करें।

2- औजारों में लम्बे समय तक कोई गुणात्मक बदलाव न हो।

आदिम क़बीलाई युग में पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही काम नहीं कर सकते क्योंकि सबको अपने काम का वरण यानी चयन करने वाली वरण व्यवस्था थी। 

दास प्रथा के युग में भी वरण व्यवस्था ही रहती है, मगर

वरण करने का अधिकार दासमालिक को था।  वही चयन करता था कि किस दास को कौन सा काम सौंपा जाये। अतः इस युग में भी पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही काम संभव नहीं था।

 जाति व्यवस्था लोहे के आविष्कार होने के बाद बनी है।   लोहे की कुल्हाड़ी से जंगलों की कटाई हुई तब दूर-दूर तक खेतों का विस्तार हुआ। तब इन खेतों में दासों को बसाया गया, अत: जो पहले दास थे वे भूदास हो गये। तब जमीन के बदले लगान की प्रथा शुरू हुई जिसे सामन्ती प्रथा कहते हैं। 

सामन्तों ने भूदासों को जमीन का टुकड़ा देकर उसके बदले में उन्हें मुद्रा, जिंस और श्रम के तौर पर लगान देने की प्रथा कायम किया। जैसे- जमीन का टुकड़ा दिया बदले में  श्रम लगान के तौर पर पीढ़ी दर पीढ़ी कपड़ा धुलवाते रहे तो धोबी जाति बन गयी। जमीन का टुकड़ा दिया और पीढ़ी दर पीढ़ी बाल काटने का काम करवाते रहे जिससे नाई जाति बन गयी। इसी तरह अन्य पेशों से जुड़ी जातियों की उत्पत्ति हुई। 

 ध्यान देने की बात यह है कि पत्थर काटने व तराशने, मिट्टी के बर्तन बनाने पशु पालने… आदि कई पेशे तो क़बीलाई और दास प्रथा के दौर में भी थे मगर पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही तरह का काम उस वक्त संभव ही नहीं था। सामन्ती व्यवस्था में ही यह संभव हो पाया था। सामंती दौर में जमीन के बदले लगान शुरू हुआ। सामंती दौर में ही लगान देने वाले भूदास पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही पेशा करने के लिए मजबूर होते हैं। 

उस वक्त श्रमिकों के लिए कोई विद्यालय भी नहीं था कि लोहार का बेटा स्कूल जाकर कुम्हारी का पेशा सीख लेता। परिवार ही उनका विद्यालय था। अत: परिवार में पीढ़ियों से जो काम जारी था वही काम बच्चे सीख पाते थे। लोग शादी विवाह भी समान पेशे का ज्ञान रखने वाले से ही करते थे, ताकि पति-पत्नी एक दूसरे की बेहतर मदद कर सकें। हुनर की गणना करके ही शादी ब्याह की परम्परा विकसित हुई। जो आडम्बर के तौर पर हिन्दू समाज में आज भी जारी है।

चूंकि उत्पादन के औजार भी लम्बे समय तक नहीं बदलते हैं, इसलिए पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही काम करना भौतिक मजबूरी भी बन जाती थी। सामन्त वर्ग की भी मजबूरी थी कि वह उन भूदासों को बेच नहीं सकता था, क्योंकि भूदासों को बेच देगा तो खेती कौन करेगा। खेती नहीं होगी तो लगान कहां से आयेगा, लगान नहीं आयेगा तो जेल, अदालत, सेना, पुलिस, नौकरशाही आदि का खर्च कहाँ से आयेगा। जेल, अदालत, सेना, पुलिस, नौकरशाही नहीं रहेगी तो राजा को राजा कौन मान सकता है? 

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि लोहे के बिना एक भी जाति नहीं बन सकती। क्योंकि लोहे के बिना लोहे की कुल्हाड़ी नहीं बन सकती, लोहे की कुल्हाड़ी के बिना जंगल की कटाई नहीं सकती, जंगल कटे बगैर खेत का विस्तार नहीं हो सकता। खेतों का विस्तार हुए बगैर भूदास प्रथा नहीं आ सकती। भूदास प्रथा के बिना जाति नहीं बन सकती।

 अतः यह सिद्ध हो जाता है कि मोहन भागवत, उनकी गीता और उनका छद्म आनुषांगिक संगठन बामसेफ तीनों ही जाति के निर्माण के सवाल पर झूठ बोल कर जनता को गुमराह कर रहे हैं। तीनों ही जनता को जनता से लड़ाने की साजिश कर रहे हैं।*

Ramswaroop Mantri

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