डॉ. विकास मानव
एक जीवन साधक ने लिखा : अगर मैं श्वास- प्रश्वास को अवधान दूं, तो मैं कोई दूसरा काम नहीं कर सकता। सारा अवधान तो सजग होने में लग जाता है। अगर और कुछ करूं तो श्वास के प्रति बोधपूर्ण नहीं रह सकता हूँ?
अवधान से बोध यानि ध्यान से साक्षीत्व की ओर बढ़ना होगा. यह होगा। इसलिए आरंभ में सुबह या शाम को, या कभी भी, एक निश्चित समय चुन लो और घंटेभर यह प्रयोग करो। उस समय कोई दूसरा काम मत करो। प्रतिदिन घंटे भर सिर्फ इसका प्रयोग करो।
एक बार इससे परिचित हो गए, इसके साथ लयबद्ध हो गए, तो फिर समस्या नहीं रहेगी। तब सड़क पर चलते हुए भी बोधपूर्ण रह सकते हो। फिर समस्या नहीं रहेगी। जब सड़क पर चलते हुए भी बोधपूर्ण रह सकते हो।
बोध और अवधान में फर्क है। जब किसी चीज को अवधान देते हो तो वह एकांतिक है, अनन्य है। वह अवधान केवल एक के प्रति है, उस समय आपको अन्य सभी चीजों से अपना अवधान हटा लेना पड़ता है। इसलिए अवधान एक तनाव बन जाता है। अगर अपनी श्वास को अवधान देते हो, श्वास को देख रहे होते हो, तो साथ ही राह चलने या ड्राइविंग को अवधान नहीं दे सकते।
इसलिए ड्राइविंग करते समय इसका प्रयोग मत करना, क्योंकि दोनों को एक साथ अवधान नहीं दे सकते। अवधान का अर्थ ही है कि एक समय में एक चीज को ही दिया जा सकता है।
बोध बहुत भिन्न चीज है। वह एकांतिक नहीं है। बोध में अवधान देना नहीं है, अवधानपूर्ण होना है। ध्यान देना नहीं है, ध्यानपूर्ण होना है। यह मात्र सजग होना है, होशपूर्ण होना है। सजग तब होते हो जब सब कुछ के प्रति सजग होते हो।
अपनी श्वास के प्रति सजग हो और राह चलते राही के प्रति भी सजग हो। सडक पर कोई शोर मचा रहा है, रेलगाड़ी निकल रही है, ऊपर कोई वायुयान उड़ा जाता है, सब कुछ उस सजगता में, जाग में सम्मिलित है। बोध सर्वग्राही है, अवधान एकांतिक।
लेकिन आरंभ अवधान से करना है। इसलिए रोज निश्चित समय पर प्रयोग करो।
घंटेभर के लिए अपनी श्वास को अवधान दो, उसे देखा करो। धीरे- धीरे तुम्हारा अवधान बोध में बदल जाएगा। उसके बाद दूसरा सरल प्रयोग करो। उदाहरण के लिए जब चल रहे हो तो अवधानपूर्वक चलो और चलने और श्वास—क्रिया दोनों के प्रति होश रखो। दोनों क्रियाओं के बीच, चलने और श्वास लेने के बीच विरोध मत पैदा करो। दोनों के ही द्रष्टा बनो। और यह कठिन नहीं है।
उदाहरण के लिए देखो। यहां मैं एक चेहरे को अवधान दे सकता हूं। जब मैं एक चेहरे को देख रहा हूं तो अन्य सभी चेहरे मेरे लिए नहीं होगे। अगर एक ही चेहरे के प्रति मेरा अवधान है तो बाकी सब चेहरे खो गए, अवधान के बाहर हो गए। और अगर मैं उस चेहरे की सिर्फ नाक पर ही अवधान को केंद्रित करूं तो फिर पूरा चेहरा, बाकी चेहरा अवधान के दायरे से बाहर हो गया। इस तरह मैं अपने अवधान को संकुचित किए जाता हूं।
विपरीत भी संभव है। मैं पूरे चेहरे को अवधान देता हूं। तब आंख, नाक, सब उसमें सम्मिलित है। फिर मैं अपनी दृष्टि को और फैलाता हूं मैं अब आपको व्यक्ति की तरह नहीं, समूह की तरह देखता हूं तब सब समूह मेरे अवधान में सम्मिलित है। फिर सामने सड़क है और उसका शोरगुल है। अगर मैं आपको सड़क और उसके शोरगुल से भिन्न समझूं तो मैं सड़क और शोरगुल को अपने अवधान से बाहर करता हूं।
लेकिन मैं आपको और सडक दोनों को एक साथ भी देख सकता हूं। तब मैं दोनों के प्रति, आपके और सड़क के प्रति बोधपूर्ण हो सकता हूं। इस तरह मैं पूरे ब्रह्मांड के प्रति बोधपूर्ण हो सकता हूं।
यह बात आपकी दृष्टि पर, दृष्टि- क्षेत्र पर निर्भर है। वह बड़े से बड़ा हो सकता है। लेकिन पहले अवधान से शुरू करो और याद रखो कि आपको बोध को उपलब्ध होना है। इसलिए निश्चित समय रख लो। सुबह का समय अच्छा रहेगा, क्योंकि तब ताजा होते हो। उस समय ऊर्जा प्रबल रहती है, सब कुछ जाग रहा है। सबेरे ज्यादा जीवंत होते हो।
शरीर—शास्त्री कहते हैं कि सुबह में आप अधिक जीवंत ही नहीं होते, उस समय शरीर की ऊंचाई भी बढ़ जाती है। शाम की बजाए सुबह आपकी ऊंचाई भी अधिक होती है।
अगर छह फीट ऊंचे हो तो सुबह आधा इंच अधिक ऊंचे हो जाते हो। शाम होते—होते फिर छह फीट हो जाते हो। क्योंकि थकावट के कारण रीढ़ संकुचित हो जाती है। इसलिए सुबह के वक्त ताजा, युवा और जीवंत रहते हो।
इसे करो! ध्यान को अपने कार्यक्रम में अंतिम मत रखो, उसे प्रथम स्थान दो। जब लगे कि अब यह प्रयत्न न रहा, जब पूरे घंटेभर अवधानपूर्वक श्वास लेते रहे और उसे ही जानते रहे, जब अनायास श्वास के अवधान को हासिल कर लिया, जब आराम के साथ और किसी बल प्रयोग के बिना इस अवधान का आनंद लेने लगे, तभी समझना कि उपलब्धि हुई।
और तब उसमें और कुछ जोड़ो, जैसे कि चलने को जोड़ दो। अब श्वास के साथ चलने को भी याद रखो। और इसी तरह जोड़ते चले जाओ। कुछ समय के बाद अपनी श्वास—क्रिया के प्रति सतत सजग बने रहोगे—यहां तक कि नींद में भी सजग रहने लगोगे।
जब तक नींद में सजगता नहीं रहती तब तक गहराई को नहीं जान सकोगे। और ऐसी सजगता आती है, धीरे- धीरे आती है। इसके लिए धैर्य की जरूरत है और साथ ही सही ढंग से आरंभ करने की। इसे जान लो, क्योंकि मनुष्य का चालाक मन सदा गलत ढंग से आरंभ करने को कहता है।
तब दो – तीन दिन में ही इसे यह कहकर छोड़ दोगे कि यह असंभव प्रयास है। मन गलत ढंग से आरंभ करा देगा। इसलिए सदा ध्यान रखो कि सही ढंग से आरंभ किया जाए, क्योंकि सही शुरुआत का मतलब है कि आधा काम तो हो ही गया।
हम गलत ढंग से शुरू करते हैं। तुम भलीभांति जानते हो कि अवधान कठिन चीज है। यह इसलिए कठिन है कि बिलकुल सोए हुए हो। अगर किसी और जरूरी काम के साथ- साथ श्वास को अवधान देना शुरू किया तो सफल नहीं हो सकोगे। और अपने जरूरी काम को तो नहीं छोड़ोगे, श्वास को अवधान देना जरूर बंद कर दोगे। इसलिए अपने लिए अनावश्यक समस्याएं मत पैदा करो। चौबीस घंटे में थोड़ा सा समय तो निकाल ही सकते हो, चालीस मिनट से चल जाएगा. इसलिए प्रयोग करो।





