प्रखर अरोड़ा
क्या स्त्रियों में पर्याप्त आत्मचेतना होती है? वे अपना स्त्री होना भुला क्यों नहीं पाती? और इसके कारण क्या हैं? क्या इसकी जड़ें सामाजिक कारणों में हैं या सृष्टि ने ही उन्हें वैसा बनाया है, और इसके पीछे गहरे मनोवैज्ञानिक और एग्जिस्टेंशियल कारण हैं?
आप यह तो मानेंगे कि आत्मचेतना– और विशेषकर पहचान-समूह की आत्मचेतना जो सामाजिक समीकरणों से बनती है– कोई बहुत शुभ भावदशा नहीं होती। इसके मूल में उद्वेग होता है।
कॉस्मिक पर्सपेक्टिव में तो वह एक पाप है कि कोई मनुष्य स्वयं को किसी पहचान समूह– जाति, वर्ग, लैंगिक, समुदाय आदि– से जोड़कर देखता है क्यूंकि तब वो अपनी चेतना को अवरुद्ध कर रहा होता है।
मैं सफल महिलाओं के साक्षात्कार पढ़ता हूं (सफल यानी संसार ने सफलता के जो भौतिक मानदंड रचे हैं वो) तो यह पाता हूं कि वो उसमें यह कहना नहीं चूकती कि मैंने स्त्री होने के बावजूद यह मुकाम पाया! मैं चकित हुआ जब देखा कि अन्तरिक्ष जाकर भी वो अपना स्त्री होना नहीं भूली, जबकि अन्तरिक्ष में होने का अर्थ ही यही है कि पृथ्वी पर थोपे गए परिप्रेक्ष्यों को लाँघकर अस्तित्व में स्वयं को परखें, टटोलें। वहां आत्मचेतना का क्या प्रयोजन? और क्या स्वयं की भौतिक पहचान के प्रति वैसा अहर्निश आग्रह शोभा देता है?
प्रश्न यह भी कि क्या यह सदियों के दमन का प्रतिफल है और क्या उसके समाप्त होने पर वह पृथकता-बोध– जो प्रकारांतर से विशिष्टता-बोध को जन्म देता है– विलीन हो जावेगा? वैसा हो तो शुभ ही है क्यूंकि स्त्रियों को अब स्वयं को मनुष्य की तरह देखना आरम्भ कर देना चाहिए और इस धारा से काटने वाले हर विशेषण का प्रतिकार करना भी समीचीन है क्यूंकि वह एक वृहत्तर अस्मिता का प्रश्न होता है- मनुष्य होने की अस्मिता!
वंचित वर्ग के पहचान-समूहों– यथा दलित, अश्वेत, श्रमिक, कृषक, अल्पसंख्यक, स्त्री– के साथ समस्या यह है कि वो एक सामाजिक स्थिति को अस्तित्वगत प्रश्न समझने की गलती कर बैठते हैं और यह भूल जाते हैं कि अगर सच में ही उनके स्वप्नों का साम्य स्थापित हो गया तो इसी के साथ विशेषाधिकारों, संरक्षण, महिमामंडन का भी अंत हो जाएगा।
क्या वह उनके लिए एक वांछित अवस्था होगी? सच जानिए, विप्लव करने वाला हर जन यह नहीं चाहता कि विप्लव हो ही जावे, यूटोपिया धरती पर उतर ही आवे। उसको विप्लव में सुख है जो उसे प्रयोजन-भावना से भरता है, उसके उद्वेग को वाणी देता है।
किन्तु विप्लव उससे उसका विशिष्टता-बोध छीन ले, यह सचमुच ही उसकी आकांक्षा नहीं होगी। पर्सनल ग्रीवेंस के वर्णन का भी एक संतोष है, उसकी व्याख्या करने वाला सदैव ही समाधान नहीं चाहता। यही तो मनुज के मन के विरोधाभास हैं।
इसीलिए मेरी कामना है कि स्त्री को सम्मान के साथ सारे अधिकार मिलें, उसकी कामनाएं पूरी हों, उसके ओढ़ने-पहनने, घूमने-फिरने पर रोक-टोक ना हो (इसलिए नहीं कि ओढ़ने-पहनने, घूमने-फिरने जैसे भौतिक उद्यमों का कोई बड़ा महत्व है, बल्कि इसलिए कि उनको पाकर वो जानें कि इससे कहीं महत्वपूर्ण प्रश्न मनुष्य के सम्मुख होते हैं) और उसे एक बार भी यह संकेत ना मिले कि वह पुरुष से– सामाजिक अधिकारों की दृष्टि से– किसी तरह भिन्न है, हीन होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता!
तभी स्त्री भ्रामक आत्मचेतना से मुक्त होगी, उसकी ग्रंथियां खुलेंगी, वह स्वयं को मनुष्य मानेगी– एक ऐसी चेतना जिसे सृष्टि ने किसी अगम्य प्रयोजन से रचा है किन्तु वह प्रयोजन क्या है यह किसी को मालूम नहीं! यह भौतिक कुंठाओं के दायरे से निकलकर आध्यात्मिक जिज्ञासाओं की ओर जाना होगा, जो कि हर मनुष्य का पहला दायित्व है, और स्त्री स्त्री बाद में है मनुष्य पहले है।
स्त्री-स्वतंत्रता का एक अर्थ स्त्री का स्वयं से स्वतंत्र होना भी है!





