शशिकांत गुप्ते
प्रख्यात शायर गालिब ने कहा है।
सिर्फ ज़हर ही मौत नहीं देता
कुछ लोगों की बातें ही काफी हैं
गालिब का उक्त कथन का स्मरण होने का कारण है।
इनदिनों Hate speech हेट स्पीच का प्रचलन खुले आम हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने हेट स्पीच पर बहुत ही सख्त टिप्पणी की है। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद भी हेट स्पीच देने वालों पर कारवाही होगी या नहीं यह विवादास्पद प्रश्न है?
इनदिनों UnderWORLD मतलब अपराध लोक की भाषा under politics अर्थात राजनीति के लोक भी बोलने लगे हैं।
अपराध लोक में सुपारी शब्द का प्रयोग contract शर्तनामा के रूप में प्रयोग होता है?
हेट स्पीच से गालिब के उक्त कथन की पुष्ठि हो जाती है।
संस्कारवान लोग,अर्थात जिन लोगों में धर्म की प्रति आस्था है,वे लोग ही संत कबीर साहब के निम्न दोहे के भावार्थ पर अमल करतें हैं।
ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोए,
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए
कबीर साहब का कार्यकाल लगभग सात सौ वर्ष पुराना है।
सात सौ वर्ष पूर्व भी यथास्थितिवादियों ने संत कबीर साहब को प्रताड़ित किया था। कबीरसाहब ने ईश्वर के प्रति अपनी निष्ठा का प्रमाण देते हुए,आत्म विश्वास के साथ कहा था।
जाको राखे साइयां मार सके न कोय
बाल न बांका करि सके जो जग बैरी होय
संत कबीर साहब में पाखड़ के विरुद्ध में निर्भीकता और निष्पक्षता के साथ कहने का साहस था।
कबीर साहब के द्वारा सात सौ वर्ष पूर्व कही गई साखी के रूप में रचना आज शब्दशः सत्य प्रमाणित हो रही है।
कबीरसाहब ने कहा है।
संतो देखत जग बौराना
साँच कहीं तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।
नेमी देखा धरमी देखा, प्रात करै असनाना
आतम मारि पखानहि पूजै, उनमें कछु नहिं ज्ञाना।।
आसन, मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना।
टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना।
साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना।।
हिन्दू कहै मोहि राम पियारा, तुर्क कहै रहिमाना।
आपस में दोउ लरि लरि मूए, मर्म न काहू जाना।।
कहै कबीर सुनो हो संतो, ई सब भर्म भुलाना।
कबीर साहब के साखी की कुछ ही पंक्तियां उद्धृत की है।
कबीर साहब ने धारा प्रवाह पाखंड के विरुद्ध कहा है।
कबीर साहब के साहसिक कथन पर आज की व्यवस्था के द्वार पता नहीं कौन सी कानूनी धाराएं लग सकती थी?
इनदिनों ऐसे मुद्दों पर लिखना बोलना मतलब काटने वाली मधुमक्खियों के छत्ते पर कंकर मारने जैसा है।
शुरुआत गालिब साहब से की है।
अंत भी गालिब साहब के कथन से ही करते हैं।
घमंड किस बात का करना गालिब
एक रात ऐसी भी आएगी जिसके बाद सवेरा ही नहीं होगा
शशिकांत गुप्ते इंदौर





