प्रखर अरोड़ा
नाज़ियों के यहूदी विरोधी नीतियों के चलते 1933 में आइंस्टीन को बर्लिन छोड़कर बेल्जियम होते हुए इंग्लैंड आना पड़ा था।

उसी वर्ष प्रिंसटन विश्वविद्यालय के एक पुराने आमंत्रण को स्वीकार कर वे अमेरिका आगये। 1933 से1955 में अपनी मृत्यु तक वे प्रिंसटन के इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज में रेज़िडेंट स्कॉलर रहे।
अप्रैल 1955 में छिहत्तर वर्ष के आइंस्टीन पेट मे भयानक दर्द की शिकायत से प्रिंसटन के अस्पताल में थे।
डॉक्टरों का अनुमान था कि उनकी एओर्टा (एक प्रमुख धमनी जिससे पेट के निकट शरीर मे रक्क्त जाता है) में एन्यूरिज़्म (सूजन, धमनी का किसी जगह कुछ कुछ गुब्बारे की तरह फूल जाना)है जिसके चलते उदर में पीड़ा हो रही है।
अस्पताल में आइंस्टीन चुप बैठे अपने दर्द को सेंक नहीं रहे थे। अठारह अप्रैल को जब उनकी मृत्यु हुई तो अस्पताल में उनकी खाट के निकट रखी मेज पर उनके लिखे नोट बिखरे थे।
आइंस्टीन उन दिनों भी सापेक्षता और क्वांटम सिद्धांत को जोड़ने वाले अपने ‘थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग’ पर काम कर रहे थे।
नर्स के अनुसार, प्राण पखेरू उड़ने के पहले आइंस्टीन ने कुछ गहरी साँसें लेकर जर्मन में कुछ शब्द कहे थे। नर्स ने मृत्यु की खबर ऊपर पँहुचाई।
प्रिंसटन ने फौरन एक संवाददाता सम्मेलन बुला कर उस अप्रतिम प्रतिभा के अब नहीं रहने की घोषणा की। और आइंस्टीन की देह शव-परीक्षण के लिए प्रिंसटन के पैथोलोजिस्ट थॉमस हार्वे के पास पँहुचाई गई।
मृत्यु का कारण स्पष्ट दिख रहा था – एओर्टा के सूजन का फटना। उसकी पुष्टि कर के हार्वे ने सोचा, इस अद्वितीय प्रतिभाशाली व्यक्ति के मस्तिष्क को देखने समझने का यही मौका है और उसने चुप चाप आइंस्टीन का भेजा निकाल कर अपने पास फोर्मलिन या वैसे ही किसी परिरक्षी (प्रिज़र्वेटिव) में रख लिया। अगले दिन शव आइंस्टीन के परिवार को सुपुर्द कर दिया गया।
आइंस्टीन के वारिस और उनके शुभेच्छुओं ने उसी दिन, बिना कोई प्रचार किये, जैसी मृतक की इच्छा थी, शवदाह किये और अस्थियों को जहाँ आइंस्टीन चाहते थे बिखेर दिए।
अगले दिन न्यूयॉर्क टाइम्स के मुखपृष्ठ पर उन्हें देखने को मिला कि आइंस्टीन का भेजा तो हार्वे ने निकाल कर रख लिया था। मृतक के पुत्र हैन्स अल्बर्ट और उनकी वसीयत के एक्सेक्यूटर डॉ ऑटो नाथन प्रिंसटन पँहुचे।
थॉमस हार्वे का काम पूरी तरह अनधिकृत और निंदनीय था लेकिन उसकी दलील थी कि आइंस्टीन जैसे व्यक्ति के मस्तिष्क को बिना देखे समझे जला देना विज्ञान के प्रति अन्याय है।
हैन्स और ऑटो मान गए बस यह शर्त रखी कि इसे पूरी तरह गोपनीय रखा जाए और इसका कोई सामान्य प्रकाशन कभी न हो क्योंकि उससे मृतक की इच्छा का अपमान होगा।
वही हुआ और दुनिया आइंस्टीन के भेजे की बात भूल गयी। उनकी मृत्यु के पचीस साल बाद एक पत्रकार ने थॉमस हार्वे का पता लगाया। पूछने पर हार्वे ने अनेक शीशियाँ दिखाईं जिनमे आइंस्टीन के मस्तिष्क के टुकड़े तैर रहे थे।
हार्वे ने भेजे के 240 भाग किये थे और हर भाग के स्लाइड बनाकर दुनियाभर में फैले विख्यात न्यूरोलॉजिस्ट के पास भेजे थे। बचे भागों को परिरक्षी में डालकर उसने अपने पास रख लिए थे। प्रिंसटन से सेवानिवृत्त होने पर वह उन बोतलों को अपने साथ लेता गया था।
चौरासी की उम्र में उसकी मृत्यु हुई और तबतक हार्वे न जान सका कि विशेषज्ञों ने आइंस्टीन के मस्तिष्क में कोई विशेष बात देखी या नहीं।
1999 में मकास्टर विश्वविद्यालय ने बताया कि आइंस्टीन का मस्तिष्क कुल मिलाकर औसत मानव मस्तिष्क से कुछ छोटा था किंतु उसके कुछ अंग बड़े और सुविकसित थे।
इसके दस वर्ष बाद कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले, ने बताया कि उनके मस्तिष्क में न्यूरोग्लिया (या ग्लियल कोशिकाएं) न्यूरॉन की अपेक्षा अधिक थी और अधिक सम्बद्ध भी।
इससे लगता है कि उनकी संज्ञानात्मक क्षमता बहुत अधिक रही होगी और शायद इसी के चलते वे वैसी रचनात्मक छलांगें लगा पाते थे।
(स्रोत: लिटहब में छपा A History of the World through Body Parts)





