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आत्मा का निवास स्थल महाचेतन मन का चौथा तल

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 डॉ. विकास मानव

हमारे माइंड की तीनों स्टेज – कांसियस, अन-कांसियस और सब-कांसियस की पहचान क्या है? हम इनको कैसे अनुभव करें? इन तीनों का आत्मा से क्या संबंध है? 

      हमारे मन के चार तल हैं। चेतन मन (कांसियस माइंड), अचेतन मन (अन-कांसियस माइंड), अव-चेतन मन (सब-कांसियस माइंड) और अति-चेतन या महा-चेतन मन (सुपर -कांसियस माइंड)। 

       मन का पहला तल है चेतन मन, जहां विचार चल रहे होते हैं। दूसरा तल है अचेतन मन, जहां पर सपने चल रहे होते हैं। तीसरा तल है अव-चेतन मन, जो सपनों के पार है और चौथा तल है महा-चेतन मन जो अंतिम तल है, जहां पर आत्मा वास करती है।

*इसे इस तरह समझें :*

    जैसे कि हमारे घर के मटके में पानी भरा हुआ है, यह है चेतन मन। मटके में पानी आया है कुए से, तो कुए का पानी है अचेतन मन। कुए में पानी आया है जमीन से, तो  जमीन का पानी हुआ अव-चेतन मन और जमीन में पानी आया है समुद्र से! अतः समुद्र का पानी हुआ महा-चेतन।

     हमारा सारा जीवन मन के पहले तल चेतन मन पर ही बितता रहता है। विचारों में और कल्पनाओं में ही गुजरता रहता है। हम विचार करते हैं बातचीत करते हैं और दैनिक जीवन के काम करते रहते हैं।

दूसरा तल है अचेतन मन का जो रात नींद आने पर जागता है और हमें सपनों में ले जाता है, लेकिन जब वह जागता है तब हम सो जाते हैं, होश में नहीं रहते हैं। यानि हम दिनभर विचारों में उलझे रहते हैं और होश नहीं रख पाते हैं, साक्षी नहीं हो पाते हैं और रात को हम सपनों में खो जाते हैं और साक्षी नहीं रह पाते हैं। इसलिए हम अचेतन मन के तल पर जा नहीं पाते हैं और हमें अचेतन मन का अनुभव नहीं हो पाता है। 

     कभी-कभी हम दिन में जागते हुए अचेतन मन के तल पर प्रवेश कर जाते हैं। जब हमारा प्रेमी हमारे पास होता है और उसकी आंखों में झांकने पर हम दुनियादारी के सारे काम भूलकर वर्तमान में आ जाते हैं और उपस्थित हो जाते हैं। यानि कि हम साक्षी हो जाते हैं। हमारा दिल धड़क रहा होता है। उस समय हमारे चेतन मन के तल पर कोई विचार नहीं होते हैं इसलिए चेतन मन निष्क्रिय हो जाता है और हम अचेतन के तल पर आ खड़े होते हैं। प्रेमिका की आंखों में झांकते समय हमें जिस प्रेम की अनुभूति होती है वह चेतन मन से अचेतन मन में प्रवेश करने की अनुभूति है। 

      जब हम किसी प्रकार का कोई नशा कर लेते हैं तब भी हम दुनियादारी भूलकर अपने में लौट आते हैं और अचेतन मन के तल पर आ खड़े होते हैं। नशे में हमारा शरीर शिथिल होकर नींद में जाने लगता है तो हमारा चेतन मन भी सोने लगता है। चेतन मन के सोते ही अचेतन जागने लगता है और हम अपने शरीर के साक्षी हो जाते हैं और अपने को अचेतन मन के तल पर खड़ा हुआ पाते हैं। नींद में अचेतन मन सपने दिखाता है और नशे में अचेतन मन भीतर दबे हुए भावों को प्रकट करने लगता है। जो बातें संकोचवश चेतन मन नहीं कह पाता है वे सारी बातें अचेतन नशे में कह देता है। 

    जब हमारी जान पर बन आती है। जैसे कि अभी-अभी हमरा एक्सीडेंट होते-होते बचा हो। उस समय हमें अपने दिल की धड़कनें सुनाई देने लगती है। शरीर में कंपकंपी छूट जाती है और हमारे सिर में सन्नाटा बजने लगता है। हम अपने शरीर में घट रही इन घटनाओं के साक्षी हो जाते हैं और अचेतन मन के तल पर आ खड़े होते हैं। 

     यानि जब हम साक्षी होंगे तब हम अचेतन मन के तल पर होंगे या जब हम अचेतन मन के तल पर होंगे तब हम साक्षी होंगे। दोनों घटनाएं एक साथ होंगी। अर्थात साक्षी में प्रवेश करेंगे तो अचेतन मन के तल पर प्रवेश हो जाएगा और अचेतन मन के तल पर प्रवेश करेंगे को साक्षी में प्रवेश हो जाएगा।

      मन का तीसरा तल है अव-चेतन मन। अव-चेतन जो अचेतन से भी गहरा है। जब तक हम सपने देखते हैं तब तक हम दूसरे अचेतन मन के तल पर होते हैं। जब नींद और भी गहरी हो जाती है तब सपने विदा हो जाते हैं और हम तीसरे अव-चेतन मन के तल पर प्रवेश कर जाते हैं। तब गहरी नींद में हमारे शरीर का तापमान कम हो जाता है और गर्मी के मौसम में भी ठंड लगने लगती है। इस बिना सपने वाली गहरी नींद में अव-चेतन मन से हमें ऊर्जा मिलती है और सुबह हम ताजा उठते हैं।

      यदि गहरी नींद नहीं आती है और हमारा अव-चेतन मन में प्रवेश नहीं होता है तो हम दिनभर उनींदे और थके-थके से रहते हैं। दिन में काम करने पर शरीर जब पूरी तरह से थक जाता है तभी हमारा अव-चेतन मन में प्रवेश होता है और हमें उर्जा मिलती है। यदि हम काम नहीं करते हैं तो थकते नहीं हैं। थकते नहीं हैं तो हम गहरी नींद में नहीं जा पाते हैं और हमें अव-चेतन से उर्जा नहीं मिलती है। अतः हम तनाव और थकान अनुभव करते रहते हैं। 

      रात को अक्सर दुर्घटनाएं अव-चेतन मन के तल पर प्रवेश करने के कारण ही होती है। सारी दुनिया में अधिकतर दुर्घटनाएं आधी रात के बाद ही ज्यादा होती है। रात-भर जागकर वाहन चलाने और थकान के कारण चालक का जागते हुए अव-चेतन मन के तल पर प्रवेश हो जाता है और अव-चेतन मन के तल पर प्रवेश होते ही चेतन मन सो जाता है और शरीर गाड़ी चला रहा होता है! यानि मन सो गया और शरीर जाग रहा है!! अतः आंखें खुली होने के बाद भी दिखाई देना बंद हो जाता है और दुर्घटना हो जाती है। 

मन के चौथे तल महा-चेतन के विषय में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। उसमें हमारा प्रवेश नहीं होता है। जब तक हम साक्षी होकर दूसरे अचेतन मन के तल पर प्रवेश नहीं करते हैं तब तक हमें तीसरे अव-चेतन का अनुभव नहीं होगा और जब तक अव-चेतन का अनुभव नहीं होगा तब तक चौथे तल महा-चेतन की झलकें नहीं मिलेंगी। हां, कभी-कभी हम महा-चेतन के निकट जरूर पहुंच जाते हैं। 

       हमने महसूस किया है कि जब हमारे घर में बिटिया का विवाह था, तब हम दिन और रात काम कर रहे थे। दुल्हन की विदाई तक हम इतने थक चुके थे कि उठकर पानी पीना भी दुश्वार हो रहा था। बैठे-बैठे ही आंखें बंद होने लगी थी। उस रात जब हम सोये थे तो हम गहरी नींद में मन के तीसरे तल अव-चेतन मन में प्रवेश कर गये थे। तब स्वप्न नहीं आए थे। तब हल्का सा प्रकाश हमारे शरीर में फैला हुआ हमें महसूस हुआ था और जागने के बाद भी प्रकाश के साथ ही बहुत ताजगी अनुभव हुई थी।

       वह महा-चेतन या कहें कि आत्मा का प्रकाश था। हमने वैसी ताजगी कभी भी अनुभव नहीं की है। 

हम चेतन मन के तल पर जी रहे होते हैं इसलिए प्रेम में, ध्यान में या कि खतरे के क्षण में हमें दूसरे तल अचेतन की झलकें मिलती रहती है। यदि हम चेतन मन के साक्षी हो जाते हैं और सतत एक घंटे तक दो विचारों के बीच निर्विचार में ठहर जाते हैं तो मन के दूसरे तल अचेतन में प्रवेश कर जाते हैं और हमें तीसरे अव-चेतन मन की झलकें मिलने लगती है।

      जब हम सतत साक्षी को साधने लगते हैं तो धीरे-धीरे हमारा अव-चेतन मन में प्रवेश हो जाता है और प्रकाश के रुप में महा-चेतन का तल हमें अपना अहसास करवाने लगता है। 

      जब साक्षी चौबीस घंटे हाजिर हो जाता है तो चेतन मन से विचार विलिन हो जाते हैं। अचेतन से सपने विदा हो जाते हैं। अव-चेतन हमें उर्जा से भर देता है और महा-चेतन में प्रवेश हो जाता है। महा-चेतन में प्रवेश होते ही बुद्धत्व या कहें कि समाधि की घटना घट जाती है। 

       मन का दूसरा छोर आत्मा है। नदी का एक किनारा चेतन मन है तो दूसरा किनारा आत्मा है। एक किनारे से नदी पार कर दूसरे किनारे पहुंचते हैं तो हम मन से आत्मा तक पहुंच जाते हैं। नदी के दूसरे किनारे तक पहुंचने पर पहला किनारा छूट जाता है। यानि आत्मा तक पहुंचने पर मन छूट जाता है और साक्षी चौथे महा-चेतन के, आत्मा के तल पर अपने को खड़ा हुआ पाता है। 

    अभी मन का पहला तल चेतन मन साक्षी को अपने में उलझाकर उसका उपयोग कर रहा है। आत्मा के तल पर आकर साक्षी दूसरे से संवादित होने के लिए पहले तल चेतन मन का उपयोग करता है।

Ramswaroop Mantri

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