शशिकांत गुप्ते इंदौर
आधीच मर्कट तशांतहि मद्य प्याला। झाला तशांत मग वृश्र्चिकदंश त्याला। झाली तयास तदनंतर भूतबाधा। चेष्टा वदूं मग किती कपिच्या अगाधा।
मराठी भाषा में लिखे इस श्लोक का अर्थ होता है,पहले ही वानर मतलब बंदर,फिर बंदर ने मदिरा का सेवन कर लिया,तत्पश्यात बंदर को बिच्छू ने भी काट लिया और ऐसी स्थिति में बंदर को भूत बाधा और हो गई। ऐसे बंदर की मानसिक स्थिति क्या हो सकती है? यह अलग से कुछ कहने सुनने का सवाल उपस्थित नहीं होता है?
आज हमारी व्यवस्था की स्थिति ठीक उपर्युक्त बंदर जैसी ही है।
अति सर्वत्र वर्जयेत् इस सूक्ति को ध्यान में रखना चाहिए।
अति का अंत सुनिश्चित है।
बंदर तो एक प्रतीक है। वास्तव में सामाजिक,राजनैतिक,धार्मिक,और सांस्कृतिक हर क्षेत्र में स्थिति अति हो गई है ।
हर क्षेत्र में व्याप्त विकृतियों को दूर करने लिए जो भी प्रयास किए जा रहें है वे सभी प्रयास त्रुटि पूर्ण है।
त्रुटि पूर्ण प्रयास मतलब बंदर के हाथ में उस्तरा आ गया है।
ऐसे त्रुटि पूर्ण प्रयासों का परिणाम सिर्फ विज्ञापनों में ही सफल दर्शाया जाता है। वास्तव में जो परिणाम होता है,वह सन 1958 में प्रदर्शित फिल्म मधुमति के इस गीत का स्मरण करवाता है। इस गीत को लिखा है गीतकार का शैलेंद्रजी ने।
यह जनता आक्रंदन है।
दैय्या रे, दैय्या रे
चढ़ गयो पापी बिछुआ
चढ़ गयो पापी बिछुआ
हाय हाय रे मर गयी
कोई उतारो बिछुआ
व्यवस्था का त्रुटि पूर्ण प्रयास।
ओ मंतर फेरूँ, कोमल काया
छोड़ के जारे छू
जनता जो महसूस करती है।
जा रे, जा रे, जा रे
होये होये होये
और भी चढ़ गयो
न गयो पापी बिछआ
कैसी ये आग लगा गयो, पापी बिछुआ
हो सारे बदन पे छा गयो, पापी बिछुआ
निम्न पंक्ति एकदम यथार्थ बयां करती है।
हाय रे मंतर झूठा, वैद्य भी झूठा
ये अक्षम लोग अपनी नाकामयाबी को छिपाने के लिए, फेक न्यूज और विज्ञापनों पर अवलम्बित होते हैं
नादान लोग फेकन्यूज को और विज्ञापनों दर्शाई उपलब्धियों को सच मन लेते हैं,और ठगी के शिकार होते हैं।
वास्तविक प्रयास अर्थात जनता का आक्रांदन,आक्रोश में परिवर्तित होना ही चाहिए।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





