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जलियाँवालाँ बाग नरसंहार: खतरे आज भी हैं

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रजनीश भारती

ब्रिटिश साम्राज्य ने 13 अप्रैल सन् 1919 को जलियाँवालाँ बाग नरसंहार में हजारों निर्दोष लोगों की हत्या करवाई। इसके पीछे अँग्रेजों की क्या मंशा थी और इसकी पृष्ठभूमि क्या थी? मौजूदा शोषक वर्ग के चरित्र को समझने के लिए इसे जानना जरूरी है।

पूँजीवादी व्यवस्था में मालिक लोग मुनाफे के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं, यह प्रतिस्पर्धा गला काट प्रतिस्पर्धा में बदल जाती है। लेकिन गला तो वे मजदूर वर्ग का ही काटते हैं। बहुसंख्यक नौजवानों को बेरोजगार बनाते हैं ताकि सस्ते मजदूर मिल सकें जिससे पूँजीपति वर्ग का मुनाफा बढ़ सके।

इस व्यवस्था में जो काम करता है उसे उतनी ही मजदूरी दी जाती है जिससे वह और उसके बच्चे रूखा-सूखा खाकर पेट भर सकें ताकि वह मजदूर अगले दिन फिर काम पर आ सके और उसके बूढ़े होने पर उसके बच्चे मजदूरी करने के लिए तैयार हो सकें। इस मजदूरी के बाद जो बचत होती है उसे पूरा का पूरा मालिक वर्ग हड़प लेता है। यानी जो काम करता है उसे कुछ नहीं मिलता और जो नहीं करता वही मालिक वर्ग ही सारा अतिरिक्त मूल्य हड़प लेता है। इस कारण मेहनतकश वर्ग के पास पैसे नहीं रह जाते कि वे बाजार में खरीददारी कर सकें। इस से पूँजीवादी व्यवस्था बार-बार भयानक मंदी में फँस जाया करती है। बाजार में माल ठसाठस भरा रहता है, उसके मुकाबले खरीददार बहुत कम होते हैं। तब इस मंदी से निपटने के लिए सस्ती जमीन, सस्ता कच्चा माल, सस्ती श्रमशक्ति, प्रतियोगिताविहीन बाजार के लिए दूसरे देशों पर कब्जा दखल करने के लिए युद्ध करते हैं।

अनियोजित उत्पादन और असमान विकास पूँजीवाद की मुख्य विशेषता होती है। इसमें नयी महाशक्ति के रूप में दूसरे देश भी उभरने लगते हैं। इससे शक्ति संतुलन बदलता है। नये उभरते साम्राज्यवादी देशों को भी बाजार चाहिए होता है। तब विश्वबाजार के पुनर्बँटवारे के लिए विश्वयुद्ध अवश्यंभावी हो जाता है। प्रथम विश्वयुद्ध के पीछे यही मुख्य कारण था।

इस विश्वयुद्ध के दौरान 1915 में गाँधीजी को अँग्रेजों ने “कैसरे हिन्द” की उपाधि दिया और गाँधी जी सार्जेंट मेजर की वर्दी पहन कर ऊपर से “कैसर-ए-हिन्द” का तमगा गले में लटका कर पूरे देश में घूम-घूम कर भारतीय नौजवानों को अँग्रेजों की सेना में यह भुलावा देकर भर्ती करवा रहे थे कि “विश्वयुद्ध समाप्त होने पर अँग्रेज हमारे देश को आजाद करके चले जायेंगे।”

मगर हुआ इसका उल्टा, इस विश्वयुद्ध में 94000 भारतीय जवान मारे गये थे इतनी कुर्बानियों के बावजूद अंग्रेजी हुकूमत ने विश्वयुद्ध जीतते ही 300% मँहगाई बढ़ा दिया। लगान दोगुना, तिगुना बढ़ा दिया और लगान वसूलने के लिए क्रूरता की हद पार करके किसानों को प्रताड़ित करने लगे। इसके खिलाफ जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे। विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने जिस रौलेट एक्ट को पारित किया था, उसने औपनिवेशिक प्रशासन को अपनी इच्छा से प्रेस को सेंसर करने, बिना वॉरंट लोगों को गिरफ्तार करने और उन्हें बिना सबूत के हिरासत में लेने का अधिकार दे दिया था। उस हिरासत के खिलाफ किसी को न वकील करने का अधिकार था, न अपील, न दलील।

इस कठोर कानून के बावजूद जनता सड़क पर उतर कर संघर्ष कर रही थी। इस दौरान डा. सैफुद्दीन किचलू और डा. सत्यपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। इसका विरोध पूरे देश में हुआ। बैशाखी पर्व पर अमृत सर में भारी भीड़ इकट्ठा हुई थी। वहाँ जलिया वालाँ बाग में रौलट एक्ट के खिलाफ एक सभा हो रही थी। इस बाग के चारों तरफ ऊँचे मकान थे। एकतरफ आने-जाने के लिए सँकरा रास्ता था। जनरल रेजीनाल्ड डायर अपने सिपाहियों के साथ सभा को अचानक घेर लिया। जो एक मात्र सँकरा रास्ता था उस पर तोप लगा दिया और सिपाहियों को गोली चलाने का आदेश दे दिया। डायर ने 1600 राउण्ड गोलियाँ चलवाकर हजारों निर्दोष लोगों को मार डाला। कुछ लोग अपनी जान बचाने के लिए कुएँ में कूद गये थे। उस कुएँ से डेढ़ सौ से अधिक लाशें मिली थीं।

जिस वक्त गाँधीजी कैसरे हिन्द की उपाधि गले में टाँग कर आजादी के नाम पर भारतीय नौजवानों को अँग्रेजों की सेना में भर्ती करवाकर उन्हें विश्वयुद्ध में खूनखराबा करने के लिए उकसा रहे थे। उसी वक्त मजदूर वर्ग के नेता लेनिन ने बगैर एक बूँद भी खून बहाए रूस की अत्याचारी जारशाही हुकूमत का तख्ता पलट दिया और वहाँ मजदूरों का राज कायम कर दिया। जबकि गाँधीजी ने 94000 भारतीय नौजवानों को विश्वयुद्ध में कटवा दिया मगर क्या मिला? मँहगाई, रोलेट ऐक्ट और जलियाँवालाँ बाग नरसंहार।

अक्टूबर क्रान्ति की तोपों की गड़गड़ाहट से पूरी दुनिया का शोषकवर्ग काँप उठा था। ब्रिटिश साम्राज्य ने सोचा था कि जलियाँवालाँ बाग नरसंहार से भारत की मेहनतकश जनता डर जाएगी और आजादी की लड़ाई नहीं लड़ेंगी मगर जनता ने लड़ाई बन्द करने की बजाय तेज कर दिया था।
शहीद ऊधम सिंह जलियांवाला बाग नरसंहार के दौरान मौजूद थे, उनके पैर में गोली लगी थी। नरसंहार की घटना का मुख्य जिम्मेदार तत्कालीन गवर्नर जनरल माइकल ओ डायर को उधम सिंह ने 21 साल बाद इंग्लैंड जाकर भरी सभा में गोली मारा था। इस तरह उधमसिंह ने जलियाँवाला बाग नरसंहार का बदला लिया।

इसके अलावा जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद कई बार जनता सड़क पर उतर कर अँग्रेजी हुकूमत की नाक में दम कर दिया था, मगर हर बार गाँधी जैसे समझौतावादी नेताओं ने समझौता करके आन्दोलन वापस लेने का काम किया है।

एक सही नेतृत्व मिला होता तो आज भारत की जनता असली आज़ादी पा चुकी होती। भारत का शोषकवर्ग आज भी डर रहा है कि कहीं भारत में भी रूस जैसी क्रान्ति न हो जाए। इसीलिए रोलेट ऐक्ट से भी खतरनाक कई कानून लागू करके जनता के जनवादी अधिकारों को छीन रहा है साथ ही साथ जाति धर्म के नाम पर जनता को आपस में लड़ा रहा है।

अमृतसर में होने वाली जनसभाओं और जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना के प्रत्यक्ष गवाह पंजाबी कवि नानक सिंह ने लिखा है कि उस दौर में ऐसी एकता थी कि हिन्दू, मुसलमान, सिख एक ही गिलास पानी पी रहे थे और एक ही थाली में खाना खा रहे थे। वह इस नरसंहार के बाद, अंतिम संस्कार के जुलूसों का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि कैसे हिंदू, मुस्लिम और सिख कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे। उन्होंने अपनी कविता ‘खूनी वैसाखी’ में उल्लेख किया है कि कैसे हिंदू, मुस्लिम और सिख एक साथ मिलकर एक ही त्योहार मना रहे थे-

“पंच वजे अप्रैल दी तेहरवीं नूं,
लोकीं बाग़ वल होए रवान चले।
दिलां विच इनसाफ़ दी आस रख के,
सारे सिख हिन्दू मुसलमान चले।
विरले आदमी शहिर विच रहे बाकी,
सब बाल ते बिरध जवान चले।”

वे बताते हैं कि हिन्दू, सिख मुसलमान सब एक ही साथ मिलकर त्यौहार मना रहे थे। इस तहजीब को खत्म करने की कोशिश शोषकवर्ग तब भी कर रहा था और आज भी। दरअसल 1947 में बोतल बदली थी शराब तो अब भी वही है। बोतल बदलने से जनता में जो भ्रम पैदा हुआ था वह धीरे-धीरे टूट रहा है। लोग धीरे-धीरे महसूस कर रहे हैं कि अंग्रेजों के वारिश सत्ता में आज तक बने हुए हैं, इसीलिए इनके खिलाफ लड़ाई अभी जारी है। अत: जलियाँवाला बाग नरसंहार जैसे खतरे आज भी बने हुए हैं। —- इंकलाब जिन्दाबाद!

Ramswaroop Mantri

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