
रमाशंकर सिंह,पूर्व मंत्री मध्यप्रदेश
संसद माने दोनों सदन लोकसभा राज्यसभा और राष्ट्रपति , यही संविधान के अनुसार संसद का ढाँचा है। राष्ट्रपति के बग़ैर संसद पूर्ण नहीं है।
किसी एक सदन के बग़ैर भी पूरी नहीं है। कोई भी क़ानून संसद को ही पास करना पड़ता है यानी दोनों सदनों को।
अब नये संसद भवन के उद्घाटन का निमंत्रण पत्र लोकसभा की ओर से गया है , राज्यसभा और लोकसभा दोनों के महासचिवों की ओर से संयुक्त रूप से नहीं।
तो इसका मतलब स्पष्ट है कि उद्घाटन कार्यक्रम में राज्यसभा के सभापति के नाते उपराष्ट्रपति भी मौजूद न होंगें और हुये भी तो प्रोटोकॉल में राष्ट्रपति के बाद नंबर दो होने पर उन्हें मुख्य अतिथि होना चाहिये जब कि नंबर तीन पर प्रधानमंत्री का प्रोटोकॉल का है।
यानी सिर्फ़ प्रधानमंत्री को मुख्य अतिथि बनाने के लिये न सिर्फ़ राष्ट्रपति बल्कि उपराष्ट्रपति को भी इस कार्यक्रम से दूर रखा जा रहा है। यह संसद को छोटा , विकृत और विकलांग बनाने की बुरी और निंदनीय हरकत हुई है !
इमारतों पर लगी उद्घाटन पट्टिकाओं का कोई महत्व नहीं होता ! वे इतिहास का हिस्सा तभी बनती हैं जब सर्वमान्य हों। मैंने कई तीसमारखॉंओं की पट्टिकाओं को टूटते और फिर दोबारा न लगते हुये देखा है
यह तय मानिये कि संसद भवन के उद्घाटन का यह विकृत कार्यक्रम संसदीय इतिहास में अच्छे शब्दों में बयान नहीं होगा





