~पवन कुमार
वेदों के मत में मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र मनोबल है, मनोबल की सबसे श्रेष्ठ स्थिति शिव (शुभ) संकल्प है, इन दोनों का सबसे बड़ा शत्रु भाग्यवाद है और भाग्यवाद का सबसे बड़ा पोषक एवं संरक्षक हमारा आधुनिक ज्योतिषशास्त्र है।
इसमें छौंक, छिपकली, गिरगिट, गोह, सूकर, साँप, संन्यासी, विधवा आदि के दर्शन से भिन्न-भिन्न अंगों के स्फुरण से, स्वर से और तिथि, नक्षत्र, वार आदि से उत्पन्न कई सहस्र भीषण कुयोगों का भयावह वर्णन है। उनमें से कुछ आगे लिखे हैं। इन्होंने हमारे मनोबल की हत्या कर दी है।
आज न तो किसी पहलवान को गुरुवार को दक्षिण जाने का, न किसी वेद- वेदान्ताचार्य को भद्रा भरणी में विवाहादि करने का साहस है। मनुष्य का सबसे बड़ा बल मनोबल है। उसके अभाव में धन, अन्न, शरीर, विद्या, शस्त्र, सेना, देव आदि के सारे बल निरर्थक हो जाते हैं।हमारे पूर्वजों ने उसी बल से चीन, तिब्बत, जापान, लंका, श्यामदेश, ब्रह्मदेश, वियतनाम, जावा, सुमाता, इण्डोनेशिया आदि में सम्मान प्राप्त किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मनोबल से ही नूतन अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न एवं विशाल मुगल सेना में प्रवेश किया।
उन्होंने जो किया वह शरीर बल और शस्तबल से कभी भी संभव नहीं था। श्री शिवाजी और रणजीत सिंह आदि वीरों ने थोड़ी-सी सेना द्वारा शत्रु की विशाल सेनाओं पर अनेक बार जो विजय प्राप्त को वे मनोबल के अभाव में असंभव थीं। शस्त्रास्त्रबल से विहीन लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी, श्री सुभाष, सावरकर, रासविहारी, चन्द्रशेखर और भगत सिंह आदि वीरों ने समस्त भूमण्डल में विख्यात और शस्त्रास्त्रबल से सुसम्पन्न अंगरेजों को भारत से भगा दिया।
यह मनोबल का ही प्रभाव था। सिकन्दर, गौरी, गजनवी, तैमूर, नादिर शाह, खिलजी, लोदी, तुगलक, मुगल, पुर्तगीज और अंगरेज आदि वीर ऊंचे पर्वतों को लाँघकर, समुद्रों और रेगिस्तानों को पारकर बहुत दूर से थोड़ी सेना लेकर आये और भारत सरीखे सर्वसाधन सम्पन्न, बोर, विशाल देश पर सहस्रों वर्षों तक राज करते रहे।
उन्होंने हमारे अगणित सिर काटे, मन्दिर तोड़े, प्रतिष्ठा लूटो और धन लूटा यह मनोबल का ही प्रभाव था। विश्व के इतिहास में मनोबल द्वारा शान्ति और विजय की प्राप्ति को तथा मनोबल के अभाव में पराजय और दुर्दशा की कई सौ कथाएँ हैं। भारतीय योगी मन को क्लिष्ट वृत्तियों का निरोध कर मनोबल से ही अनेक सिद्धियाँ प्राप्त करते थे। वे ज्योतिषियों से यह नहीं पूछते थे कि हमारे भाग्य में सिद्धियाँ लिखी हैं या नहीं। इसीलिए योगेश्वर कृष्ण ने गीता में कहा है कि मैं इन्द्रियों में मन हूँ.
“इन्द्रियाणां मनश्चास्मि।” उन्होंने अर्जुन से कहा था कि नपुंसक मत बनो, मन की दुर्बलता का परित्याग कर खड़े हो जाओ, अपनी बुद्धि को निश्चयात्मिका बनाओ, मोहरूपी दलदल से बाहर आओ, ज्ञान को अज्ञान से आच्छादित मत होने दो, अपना उद्धार स्वयं करो और अपने को ईश्वर का अंश समझो।
मत्स्यपुराण २४३।२७ और विष्णुधर्मोत्तर पुराण २।१६३ में विस्तार से बताया गया है कि मन को तुष्टि, मन का उत्साह और मन की जय सबसे बड़ी विजय है तथा पाराशर संहिता का कथन है कि सारे शुभ शकुन एवं मुहूर्तादि एक ओर हैं तथा मन की शुद्धि और उत्साह एक ओर है। मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का मुख्य कारण है, मन की हार हार हैं और मन की जीत जीत है।
मनसस्तुष्टिरेवल परमं जयलक्षणम्।
एकतः सर्वलिंगानि मन उत्साह एकतः॥
निमित्तशकुनादिभ्यः श्रेष्ठो हि मनसो जयः। तस्माद् यियासतां नृणां फलसिद्धिर्मनोजयात्॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
मन के हारे हार है मन के जीते जीत॥
राजनीति के महान् आचार्य श्री विष्णुशर्मा ने लिखा है कि मूढ़ के लिए प्रतिदिन शोक और भय के सहस्रों स्थान हैं। वह पृथ्वी के हर अन्न और पान में शंकालु रहता है। उसे कोई भी स्थान सुरक्षित नहीं प्रतीत होता और उसका जीवन दूभर हो जाता है। वह छोटा सा कार्य प्रारम्भ करके भी व्याकुल हो जाता है पर शूरों और पण्डितों की स्थिति इसके ठीक विपरीत होतो है।
वे बड़े-बड़े कार्यों का आरम्भ करने पर भी निराकुल रहते हैं।
शंकाभिः सर्वमाक्रान्तमन्नं पानं च भूतले।
निवासः कुत्र कर्तव्यो जीवितव्यं कथं नु वा॥
आरभन्ते ऽल्पमेवाज्ञाः कामं व्यग्रा भवन्ति च।
महारंभेऽपि सुधियस्तिष्ठन्ति च निराकुलाः॥
शोकस्थानसहस्त्राणि भयस्थानशतानि च।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्॥
विक्रमाजतराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।
उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः॥
अल्प मनोबल वाले मनुष्यों के लिए छोटी-सी भी घटना कितनी भयावह हो जाती है तथा वे कैसे-कैसे भीषण सपने और शकुन देखने लगते हैं, इसकी भागवत की एक कथा पठनीय है। लिखा है कि कालिया नाग से लड़ने के लिए श्रीकृष्ण एक ऊंचे कदम्बवृक्ष पर चढ़ कर कालीदह में कूद पड़े।
ब्रजवासी यद्यपि उनके पराक्रम से सुपरिचित थे और बलरामजी को हंसते देख रहे थे फिर भी भयभीत हो गये। उन्हें पृथ्वी, आकाश तथा शरीरों में तीनों प्रकार के भयंकर उत्पात दिखाई देने लगे और ऐसा प्रतीत होने लगा कि कोई भीषण घटना घटने वाली है। कृष्ण को मरा जानकर कुछ लोग आत्महत्या के लिए यमुना तट पर आ गये किन्तु सैकड़ों अपशकुनों का फल यह हुआ कि नाग भाग गया और यमुना का जल अमृत सदृश हो गया.
अथ व्रजे महोत्पातास्त्रिविधा अतिदारुणाः।
उत्पेतुर्भुवि दिव्यात्मान्यासन्नभयशंसिनः॥
सकल सुहत्पुलो द्वीपमध्येर्जगाम सः।
तदैव सामृतजला यमुना विषाऽभवत्॥
नीतिविदों का कथन है कि ऐसे भीरु और भविष्य वक्ताओं के सम्पर्क में रहने से शूरों का मन भी कुछ दिनों में बलहीन हो जाता है अतः इनका त्याग हो श्रेयस्कर है।
हीयते हि मतिस्तात होनैः सह समागमात्।
श्रीमद्भागवत (११/२३) में एक योगी की शिक्षा है कि हमारे सुख-दुःख के कारण देव, ग्रह और विभिन्न काल आदि नहीं है बल्कि वह मन है जो संसार चक्र को चला रहा है। मन हो तोन प्रकार की वृत्तियों उत्पन्न कर तीन प्रकार के कर्म करता है और शुभाशुभ गतियाँ दिलाता है। दान, धर्म, यम, नियम, अध्ययन, सत्कर्म और शौचादि व्रतों का पालन योग है किन्तु मनोनिग्रह हो इन सब का अन्तिम फल है और वही परम योग है। जिसका मन प्रशान्त और उत्साहपूर्ण हैं उसको दानादि के पालन की आवश्यकता नहीं है किन्तु जिसका मन संयम और उत्साह से हीन होने के कारण विनाशोन्मुख है उसे दान, यम, नियम आदि से कुछ नहीं मिलता।
देवरूपी इन्द्रियाँ सदा मन के वश में रहती हैं किन्तु मन उनके वश में नहीं रहता। वह बलवान देव है और जो उसे वस में कर लेता है वह मनुष्य देवों का देव है। अतः मन को जोतना और पवित, निर्भय एवं बली बनाना आवश्यक है।
नायं जनो मे सुखदुःखहेतुर्न देवतात्मग्रहकर्मकालाः।
मनः परं कारणमामनन्ति संसारचक्रं परिवर्तयेद् यत्॥
मनो गुणान् वै सृजते बलीयस्ततश्च कर्माणि विलक्षणानि।
शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानि तेभ्यः सवर्णाः सृतयो भवन्ति॥
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च श्रुतानि कर्माणि च सद्वतानि।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताः परो हि योगो मनसः समाधिः॥
समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं दानादिभिः किं वद तस्य कृत्यम्।
असंयतं यस्य मनो विनश्यद् दानादिभिश्चेदपरं किमेभिः॥
मनोवशेऽन्ये ह्यभवन् स्म देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति।
भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान् युंन्याद्वशे तं स हि देवदेवः॥
यजुर्वेद का कथन है कि मन देवबल से युत है, स्वयं देव है, ज्योतियों को ज्योति है, प्रज्ञान और अमृत स्वरूप है। तथा धृति रूप है। उसमें सारा भूत, वर्तमान और भविष्य प्रतिष्ठित है, उसमें सबके मन ओत-प्रोत है, रथ को नाभि में अरों की भाँति उसमें सारे वेद (ज्ञान) स्थित हैं और मनोबल के बिना कोई कार्य नहीं किया जा सकता।
जैसे अच्छा सारथी अश्वों को ठीक चलाता है वैसे ही संस्कृत मन मनुष्य को महान बना देता है। मन एक महान् ज्योति है। वह सदा बलवान, वेगवान् और शिवसंकल्पवान् रहे।
यज्जाग्रतो दूरमुपैति दैवं दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकम्। यस्मिनृचः सामयजूंषि प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यूस्मंश्चित्तमोतं प्रजानां यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्जयोतिरमृतं प्रजासु। येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्। यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते। सुषारधिरश्वानिव यन्मनुष्यान्त्रेनीयते। हृप्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥
अथर्ववेद (७।५०।८) का कथन है कि कृत और विजय हमारे दायें-बायें हाथों में हैं। हम गौ, अश्व और हिरण्य के नेता धनाय हैं। अथर्ववेद २।१५।४ में लिखा है कि हे मनुष्यों जैसे आकाश पृथ्वी, दिन-रात, सूर्य-चन्द्र और ब्राह्मण क्षत्रिय न हताश होते हैं न किसी से डरते हैं उसी प्रकार तुम न हताश हो, न डरो।
अथर्ववेद १९।१५।५ में यह प्रार्थना है कि हे परमात्मा! हम आकाश और पृथ्वी से आगे से पीछे से, मिल और अमिल से, पश्चिम और पूर्व से ज्ञात से, अज्ञात से, दिन और रात्रि से तथा किसी भी प्राणी से भयभीत न हो। हमारे लिए सब पदार्थ और सब दिशाएँ मित्र हो जायें।
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।
गोजिद् भूयासमश्वजिद्धनंजयो हिरण्यजित्॥
यथा द्यौश्च पृथिवी च यथाहश्च रात्रिश्च यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च ,
यथा ब्रह्म च क्षच न विभीतो न रिष्यतः, एवा मे प्राण मा बिभेः।।
अभयं नः करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावापृथिवी उभे।
अभयं पश्चादमयं पुरस्तादुत्तरादधरादभयं नो अस्तु॥
अभयं मित्रादभयममिवादभयं ज्ञातादभयं परोक्षाद्भयं नक्तमभयं दिवा नः।
सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु॥
भगवान श्रीकृष्ण ने गोता (१६।१) में दैवी सम्पति में प्रथम स्थान अभय को दिया है और वेद में बार-बार यह प्रार्थना है कि हम, हमारे पशु और परिजन सर्वत, सर्वदा अभय रहें तथा हमारे मनोबल का हास न हो। बड़ा मनोबल कुमार्गी भी हो सकता है इसलिए वेदों में बार-बार यह प्रार्थना भी है कि हमारे मन में सदा शिव संकल्प उठें और शान्ति-साम्राज्य की स्थापना हो।
यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु।।
शं नः कुरु प्रजाभ्यो अभयं नः पशुभ्यः॥
तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।
द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवीशान्तिः सामाशान्तिरेधि॥
किन्तु ज्योतिष ने इसके विपरीत भय को विशाल सेना खड़ी कर हमारे मनोबल को समाप्त कर दिया है। उसने भद्रा को अभद्रा, भरणी को हरणी तथा मंगल को अमंगल बना दिया है और अशुभ कालों में पापकर्मों का आदेश देकर संकल्प को अशिव कर दिया है। (चेतना विकास मिशन).





