अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

भगवान जगन्नाथ के दो मुसलमान भक्त:सालबेग के मंदिर पर रुके बिना रथ नहीं बढ़ता, आफताब रथयात्रा के लिए सुप्रीम कोर्ट तक गया

Share

पुरी

9 दिन मौसी के यहां रहने के बाद भगवान जगन्नाथ भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अपने घर यानी पुरी के जगन्नाथ मंदिर लौट आए। तीनों के रथ बुधवार, 28 जून को दोपहर करीब 11:30 बजे गुंडिचा मंदिर से बाहुड़ा यानी वापसी की यात्रा पर निकले।

गुंडिचा मंदिर में सुबह 9.30 बजे रथों की पूजा की गई, इसके बाद 11:30 बजे रथ जगन्नाथ मंदिर के लिए निकले और 6 घंटे बाद 5:30 बजे द्वार पर पहुंचे।

गुंडिचा मंदिर में सुबह 9.30 बजे रथों की पूजा की गई, इसके बाद 11:30 बजे रथ जगन्नाथ मंदिर के लिए निकले और 6 घंटे बाद 5:30 बजे द्वार पर पहुंचे।

दो घंटे में एक किमी का सफर करने के बाद दोपहर 1:40 बजे अचानक भगवान जगन्नाथ का रथ एक मंदिर के सामने रुक गया। मंदिर में सामने नीले रंग का बोर्ड लगा है, जिस पर उड़िया और अंग्रेजी में लिखा है- सालबेग टेंपल, पुरी।

मंदिर से भगवान जगन्नाथ के लिए प्रसाद आया। उन्हें भोग चढ़ाया गया। इसके बाद ही यात्रा आगे बढ़ी। हमने यात्रा में शामिल लोगों से पूछा- ‘यहां क्या हो रहा है, रथ क्यों रोका है? जवाब मिला, ‘ये भगवान जगन्नाथ के भक्त सालबेग का मंदिर है। यहां से प्रसाद खाए बिना भगवान आगे नहीं जाते। 400 साल से ऐसा हो रहा है।’ सुनकर हैरानी हुई, भक्त का मंदिर बना है और भगवान उसका प्रसाद खाने के लिए रुकते हैं।

आगे की कहानी और हैरान करने वाली थी। भक्त सालबेग हिंदू नहीं, मुस्लिम थे। भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने वृंदावन से आए थे। पुरी के लोगों को उनकी कहानी मुंह जुबानी याद है। सालबेग के बारे में सुनते वक्त एक और नाम आया आफताब हुसैन।

सालबेग 400 साल पहले हुए थे, आफताब मौजूदा दौर के हैं। उम्र 23 साल। भुवनेश्वर में पढ़ाई करते है। आफताब मुस्लिम हैं, लेकिन जगन्नाथ की भक्ति में डूबे रहते हैं। 2020 में कोरोना की वजह से यात्रा रोकी गई, तो सुप्रीम कोर्ट चले गए। कहा कि यात्रा रुकी तो ये अन्याय होगा।

भगवान जगन्नाथ के दोनों मुस्लिम भक्तों के बारे में जानने हम पहले सालबेग के मंदिर और फिर आफताब के घर पहुंचे। पहले भक्त सालबेग की कहानी…

सालबेग मंदिर में अंदर दाखिल होते ही सामने एक कमरा दिखता है। यहां दीवार पर भगवान जगन्नाथ की फोटो लगी है। नीचे छोटा सीमेंट से बना स्ट्रक्चर है। इस पर तिलक लगा था, फूल चढ़े थे। देखने में ये जगह किसी हिंदू देवी-देवता के स्थान की तरह है।

तभी पीछे से मंदिर के प्रमुख सेवक विश्वनाथ की आवाज आई। बोले- ‘पहले यहां भक्त सालबेग की छोटी सी समाधि थी। 2017 में सरकार ने मंदिर बनवा दिया।

सालबेग के लिए रुकी थी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा…
विश्वनाथ बताते हैं, ‘पुरी के हर व्यक्ति को ये कहानी पता है। सालबेग के भजन और कविताएं पुरी में खूब गाई जाती हैं। सालबेग मुसलमान पिता और ब्राह्मण मां के बेटे हैं। बचपन से जगन्नाथ के भक्त। एक बार दर्शन के लिए पुरी आए थे। तब लोग पैदल यात्रा करते थे। चलते-चलते वे बीमार हो गए।’

‘रथयात्रा का समय था। सालबेग ने जगन्नाथ को पुकारा। कहा- अब आगे नहीं बढ़ पाऊंगा। प्रभु मुझे यहीं दर्शन दो। उस वक्त भगवान जगन्नाथ मौसी के मंदिर से अपने मंदिर जा रहे थे। गुंडिचा मंदिर से जगन्नाथ मंदिर वापसी की परंपरा को बाहुड़ा कहते हैं।’

‘कहा जाता है बलभद्र और सुभद्रा के रथ तो चलते रहे, लेकिन जगन्नाथ का रथ वहीं रुक गया। उसे हाथियों से खींचने की कोशिश की गई, पर नहीं खिंचा। भक्त सालबेग ने दर्शन किए, तब जाकर रथ चला।’

विश्वनाथ उस छोटे चबूतरेनुमा मंदिर की तरफ इशारा कर कहते हैं, ‘इस जगह सालबेग को जगन्नाथ के दर्शन हुए थे और यहीं सालबेग ने प्राण त्यागे थे। इसीलिए यहां उनकी समाधि बना दी गई थी। पहले यही समाधि थी।’

सालबेग के पिता औरंगजेब के सैनिक थे, ब्राह्मण लड़की को अगवा कर निकाह किया
भक्त सालबेग की कहानी तो मंदिर में आने के पहले कई लोगों से सुन ली थी। पर सालबेग की मां ब्राह्मण थीं, इस बारे में किसी को बहुत नहीं पता था। इस बारे में विश्वनाथ से पूछा। वे बताते हैं, ‘उस वक्त भारत में मुगलों का राज था। मुगल शासक औरंगजेब की सेना के साथ लालबेग नाम के सिपाही उत्कल प्रदेश यानी ओडिशा पर हमला करने आए थे।’

‘इस दौरान लालबेग पुरी के एक गांव दंडमुकुंदपुर से लौट रहे थे। तभी उनकी नजर नदी में नहा रही एक ब्राह्मण लड़की पर पड़ी। लड़की का नाम ललिता था। लालबेग ने उन्हें जबरन घोड़े पर बैठा लिया और साथ ले गए। बाद में दोनों का एक बेटा हुआ, जिसका नाम रखा गया सालबेग।’

ये कहानी कितनी सच है, इसे जानने के लिए हमने कई किताबें भी खंगालीं। रथयात्रा की कॉमेंटेटर और राइटर नम्रता चड्ढा की किताब ‘जय जगन्नाथ’ में भी इसका जिक्र है। उड़िया भाषा में एक और किताब ‘भक्त कबि सालाबेग रचनासंभारा’ में भी ये कहानी दर्ज है। इसके लेखक डॉ. तुलसी ओझा और सुनील कुमार रथ हैं।

अब दूसरे भक्त आफताब हुसैन की कहानी…
पुरी से 120 किलोमीटर दूर हम पहुंचे एक गांव इट्टामाटी। बारिश और जगन्नाथ रथयात्रा की भीड़ ने हमारे सफर को और लंबा कर दिया। दो-ढाई घंटे का सफर 4 घंटे में पूरा हुआ। आफताब हुसैन इसी गांव में रहते हैं। हम उनके घर में दाखिल हुए, तो आफताब की मां राशिदा बेगम ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

वे हमें आफताब के कमरे में ले गईं। हमने उनसे आफताब की जगन्नाथ भक्ति के बारे में पूछा, तो कहने लगीं, ‘बचपन में बालू से मैं कई बार गणेश बना देती थी। उस पर फूल डालकर सजाती थी। ये सब पूजा के लिए नहीं, बल्कि खेल-खेल में करती थी। हम हिंदुओं के बीच पले-बढ़े हैं। मेरे अब्बू तो रामायण पढ़ते थे।’

घर में भगवान जगन्नाथ का छोटा सा मंदिर बना है। इसमें चमेली और बेलपत्र की माला पहने भगवान जगन्नाथ और साथ में उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा विराजमान हैं। साथ में मां दुर्गा और लड्डू गोपाल भी हैं।

आफताब के घर में बना मंदिर, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियां रखी है। आफताब के न रहने पर उनकी मां इनका ध्यान रखती हैं।

आफताब के घर में बना मंदिर, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियां रखी है। आफताब के न रहने पर उनकी मां इनका ध्यान रखती हैं।

राशिदा बेगम ने बताया कि ‘बेटा आफताब अब भुवनेश्नर में रहकर PCS की तैयारी करता है। इसलिए मंदिर में रोज माला-फूल चढ़ाना मेरा ही काम है।’ राशिदा हंसते हुए कहती हैं,’ आफताब तो जगन्नाथ का ही हो गया। मेरे बेटे को जो पसंद, वो मुझे भी पसंद। मेरा जगन्नाथ तो आफताब है।’

मैंने उनकी बात रिकॉर्ड करनी चाही तो राशिदा बोलीं, ‘ना-ना, माइक नहीं। जगन्नाथ का भक्त आफताब है, आप उससे ही बात करें।’ तब तक आफताब भी कमरे में आ चुके थे।

जगन्नाथ जगत के नाथ और जगत में तो मुस्लिम, क्रिश्चियन सब रहते हैं…
आफताब ने जय जगन्नाथ कहने के बाद बात शुरू की। हमारा पहला सवाल था, ‘जगन्नाथ तो हिंदुओं के भगवान हैं, उनके मंदिर में भी गैर हिंदुओं के जाने की मनाही है, फिर आप उनके भक्त कैसे बने? जवाब मिला, ‘पहली बात जगन्नाथ तो जगत के नाथ हैं और जगत में सिर्फ हिंदू तो नहीं रहते। रही बात मंदिर की, तो ये एक ही ऐसे भगवान हैं, जो भक्तों से मिलने अपने मंदिर से बाहर निकलते हैं। रथयात्रा का मतलब यही तो है।’

कोरोना की वजह से यात्रा रोकी गई, तो इसके खिलाफ पिटीशन डालते वक्त मन में क्या था? आफताब कहते हैं, ‘दो बातें थीं, पहली कि जगन्नाथजी ने अपनी मां समान गुंडिचा देवी से वादा किया है कि वे हर साल 9 दिन के लिए उनके घर जरूर आएंगे।’

‘दूसरी कि रथयात्रा के वक्त देश-विदेश से भक्त आते हैं। यात्रा रुकी तो उनका क्या होगा? पहली याचिका खारिज हो गई। तब रिव्यू पिटीशन डाली। कोर्ट ने रथयात्रा की इजाजत दे दी, पर लोगों के शामिल होने पर रोक बनी रही।’

जगन्नाथ चुंबक की तरह सबको खींच लेते हैं, मैं तो सामान्य इंसान हूं…
आफताब कहते हैं, ‘ओडिशा हमारे लिए पवित्र स्थान है। हम गर्व करते हैं कि हम महाप्रभु के क्षेत्र में जन्मे हैं। ओडिशा के महाप्रभु को अगर हम नहीं जानेंगे, तो कौन जानेगा। महाप्रभु के क्षेत्र का अन्न-जल खाएंगे और उन्हीं को नहीं जानेंगे, तो ये तो मिट्टी से गद्दारी हो जाएगी न। महाप्रभु चुंबक की तरह सबको अपनी तरफ खींच लेते हैं।’

आफताब अपने हाथों को भगवान जगन्नाथ की तरह फैलाकर कहते हैं, ‘आपने तो देखा ही होगा। महाप्रभु कैसे बैठे हैं, हाथ फैलाए कि आओ, चले आओ मेरी तरफ। वे नहीं कहते, मुझे हाथ जोड़कर प्रणाम करो। वे कहते हैं कि आओ मुझे समेट लो।’

नाना रामायण और गीता का पाठ करते थे, मां जगन्नाथ को फूल चढ़ाती हैं…
हमने आफताब से पूछा- आपने भगवान जगन्नाथ को कब जाना? आफताब कहते हैं, ‘’देखिए, उन्हें जानना तो मुमकिन नहीं। चतुरानन ब्रह्मा, पंचानन शिव, षडानन कार्तिक, सप्तानन अग्नि, दशानन रावण यानी चार सिर वाले ब्रह्मा, पांच सिर वाले शिव, 16 सिर वाले कार्तिक, सात सिर वाली अग्नि और दस सिर वाला रावण जिन्हें नहीं जान पाए, उन्हें मैं क्या जानूंगा। बस जो ज्ञान उन्होंने हमें दिया, उसी से उन्हें समझा है।’

आफताब की मां ने बताया था कि उनके अब्बू रामायण पढ़ते थे। हमने आफताब से इस बारे में पूछा। वे कहते हैं, ‘ मेरे नाना मुत्तालब खान रामायण और गीता के विद्वान थे। हमारे परिवार में कभी धर्म को लेकर कोई द्वंद्व नहीं था। किसी के मन में कोई धर्म का कांटा नहीं था। हमारे ही परिवार में नहीं, बल्कि यहां के और भी घरों में ऐसा है।’

‘गांव में एक जगह होती है, जहां सभी भागवत और रामायण पर चर्चा करते हैं, तर्क करते हैं। मेरे नाना उसमें हिस्सा लेते थे। परिवार जैसा होता है, वैसे ही हम बनते हैं। मैं जगन्नाथ से ऊपर मां-बाप को मानता हूं। अगर मेरी मां मुझे रोकती-टोकती तो मैं जगन्नाथ को कैसे जान पता। उन्हें कैसे पाता। मैं अब भुवनेश्वर में रहता हूं। वहीं पढ़ाई करता हूं। मेरे पीछे मेरी मां ही जगन्नाथ को फूल-माला चढ़ाती हैं।’

नाना मुत्तालब खान ने गांव में मंदिर बनवाया
आफताब ने हमसे गांव के एक मंदिर चलने के लिए कहा। मंदिर उनके घर से 200 मीटर दूर है। इशारा कर उन्होंने बताया- ये त्रिदेव का मंदिर है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश। इसे मेरे नाना ने बनवाया था। पहले ये इस जगह से 100 मीटर दूर था। रास्ता बनाने के लिए यहां लाना पड़ा। मंदिर के साथ त्रिदेव की मूर्ति लानी ही थी। तब मूर्ति किसी से हिल ही नहीं रही थी। गांव के पुजारी ने कहा- इसके वारिस को बुलाओ। नाना तब तक चल बसे थे। मेरे बड़े मामू आए, तब जाकर मूर्ति वहां से हिली।’

बचपन में कागज से बने रथों से यात्रा निकालते थे, फिर कारीगर से रथ बनवाए
जगन्नाथ रथ यात्रा का समय है, आप पुरी नहीं गए? जवाब मिला, ‘मैं भुवनेश्नर से घर इसीलिए आया हूं। हम भी रथयात्रा निकालते हैं।’ बात करते-करते वे हमें रथ तक ले गए। लाल-पीले-हरे रंग के कपड़ों और बांस से बने रथ। रथ में भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और बलभद्र विराजमान हैं।

हमने पूछा- क्या 9 दिन के सारे कर्मकांड आप भी करते हैं? जवाब मिला, ‘वैसे तो नहीं, जैसे पुरी में होते हैं, पर करते हैं। 56 भोग नहीं खिला सकते, जो होता है वह खिलाते हैं।’ रथयात्रा कब से निकालनी शुरू की? ‘बचपन में मैं कागज के रथ बनाकर गांव के दूसरे बच्चों के साथ खेल-खेल में रथयात्रा निकालता था। 2016 से मैंने गांव के कारीगर से रथ बनवाकर यात्रा निकालनी शुरू की।’

सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ाई, जगन्नाथ अष्टावक्र सबसे पहले वहीं गाया…
आफताब के जूनियर और उनके गांव में ही रहने वाले रोहन बताते हैं, ‘मैं सरस्वती शिशु मंदिर में था। आफताब मुझसे सीनियर थे। एक दिन मैंने देखा कि आफताब बड़े आराम से जगन्नाथ अष्टावक्र पढ़ रहे हैं। मुझे हैरानी हुई। फिर आफताब से मेरी बातचीत होने लगी। पता चला कि आफताब तो जगन्नाथ के बारे में उतना जानते हैं, जितना कोई हिंदू भी नहीं जानता होगा।’

आफताब से हमने पूछा, आपको शिशु मंदिर में दाखिला आसानी से मिल गया, क्योंकि उसे तो हिंदू विचारधारा का स्कूल माना जाता है। आपके मां-बाप तैयार हो गए थे दाखिले के लिए? आफताब हंसते हुए कहते हैं, ‘ओडिशा में ऐसा नहीं है कि मैं मुसलमान हूं, तो इस स्कूल में नहीं पढ़ सकता। न स्कूल को दिक्कत थी, न मेरे मां-बाप को। मैंने केजी से लेकर 10वीं तक वहां पढ़ाई की। मैं कराग्रे वसते लक्ष्मी भी पढ़ता हूं। जगन्नाथ अष्टावक्र भी कहता हूं।’

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें