अग्नि आलोक
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*झूठ के पांव नहीं होते?*

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी को अठारवी आदि मध्य के कवि गिरधर कवि की एक रचना का स्मरण हुआ।
बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ।
जो बनि आवै सहज में, ताही में चित्त देइ।।
साही में चित्त देइ, बात जोई बनि आवै।
दुर्जन हँसे न कोय, चित्त में खता न पावै।।
कह गिरधर कविराय, यह करू मन परतीती।
आगे को सुख समुझि, होय बीती सो बीती।।

मैने सीतारामजी से पूछा आज आप 18 वी सदी में क्यों पहुंच गए?
सीतारामजी ने कहा इन दिनों
पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय यह सूक्ति चरितार्थ होते स्पष्ट दिखाई दे रही है।
सपूत कभी भी यह नहीं कहता कि, मेरे पुरखों ने कुछ नहीं किया,ना ही वह ऐसा कहने कि,
गुस्ताख़ी कभी करेगा की पूर्व जन्म के पापों के कारण भारत में जन्म लिया है?
सपूत होगा तो पुरुखो के बलिदान के आगे नतमस्तक होगा,उनकी गौरव गाथा का स्मरण करेगा।
पुरुखों के द्वारा अथक श्रम से निर्मित और अर्जित संपत्तियों को सहज कर रखेगा,पुरुखों की कमाई में वृद्धि करेगा। कपूत पुरुखों के द्वारा संजोई सम्पत्ति का विक्रय करेगा और कहेगा,पुरुखों ने कुछ किया ही नहीं।
कपूत अपनी अक्षमताओं को छिपाने के लिए छद्म उपलब्धियों को विज्ञापनों में ही दर्शाएगा।
आमजन की बुनियादी समस्याओं पर अव्यवहारिक जवाब मिलेगा।जैसे महंगाई के सवाल पर प्याज, लहसुन नहीं खाती हूं। रोजगार के सवाल पर पकौड़े बेचना, ईंधन के लिए नाली से गैस प्राप्त करना।
पहलवान युवतियों के साथ होने वाले अमानवीय कृत्य पर मौन दर्शक बनाना, हर एक ज्वलंत समस्याओं पर स्मृति मलिन होना।
उपर्युक्त सभी सवालों पर गोलमाल जवाब देकर अपनी नाकामियों को छिपाना का असफल प्रयास किया जाएगा?
इस मुद्दे पर शायर शहाब जाफ़री के निम्न शेर में जो सवाल है, यही तो यथार्थ है।
तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ लुटा
मुझे रहज़नों से गिला नहीं तिरी रहबरी का सवाल है

रहबर का अर्थ होता है,मार्ग दर्शक। यदि स्वयं मार्ग दर्शक ही पथभ्रष्ट हो जाए तो,अनुसरण करने वालो की स्थिति हम तो डूबे हैं सनम तुम को भी ले डूबेंगे इस कहावत की तरह ही तो होगी।
यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे पुरुखों निरंतर संघर्ष कर विदेशी हुकूमत से अपने देश को स्वतंत्रता प्राप्त करवाई है।
आज भी देश के सपूतों में वह जज्बा कायम है जो हमारे पुरुखों में था।
शायर अनीस अंसारी का यह शेर मौजू है।
मैं ने आँखों में जला रखा है आज़ादी का तेल
मत अंधेरों से डरा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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