~ ज्योतिषाचार्य पवन कुमार
भारत के किस मनुष्य ने कब, किस सिद्धान्त का अविष्कार किया यह ज्ञात नहीं है क्योंकि ग्रन्थ में अपना नाम न देने की भारतीय परम्परा बहुत पुरानी है परन्तु संस्कृत और अन्य भाषाओं के अनेक शब्दों का साम्य यह सिद्ध कर देता है कि यह भारत की ही देन है।
*मासों के नामों और संख्या का निरीक्षण :*
इस समय विश्व के प्रायः हर देश में माससंख्या बारह है परन्तु बारह ही क्यों, इसका उत्तर केवल हिन्दू के पास है। बारह का उत्तर वही दे पायेगा जिसका वर्ष सौर (सूर्यसम्बन्धी) और मास चान्द्र होगा क्योंकि एक सौरवर्ष में चन्द्रमा बारह बार पूर्ण होता है अथवा अमावास्या बारह बार आती है।
मुसलमानों का सूर्य से कोई नाता नहीं हैं। उनके मास चान्द्र हैं। इसीलिए वे हर ऋतुओं में आते रहते हैं। मुहर्रम कभी जाड़े में, कभी गर्मी में और कभी वर्षा में पड़ता है। इसके विपरीत अधिक मास की व्यवस्था के कारण आर्यमास सर्वदा एक ऋतु में पड़ते हैं।
इंगलिश लोगों का वर्ष तो सौर है पर मासों का चन्द्रमा से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसलिए मास बारह ही क्यों, इसका उत्तर उनके पास भी नहीं है और उनके यहाँ मासों को बारह संख्या संशोधन के बाद की है। पहले दस ही मास थे। उन्हें बीच में अनेक बार सुधार करना पड़ा है।
ईसवी सन् का मूल रोमन संवत् है। यूनान के पहले ३६० दिनों का ओलिम्पियद् संवत् चलता था। olympian का अर्थ है विशिष्ट या महत्त्वपूर्ण वह रोमनगर की प्रतिष्ठा के दिन से चला। उसमें १० मास थे वर्ष मार्च से प्रारंभ होकर दशाम्बर में समाप्त होता था।
March शब्द का अर्थ है प्रस्थान करना या प्रारंभ करना। यह मास हमारे चैत्र में आता है अर्थात् इनका वर्षारंभ पहले हमारे साथ होता था। अन्तिम चार मासों के नामों का अन्तिम शब्द अम्बर है। यह संस्कृत का है। संस्कृत में आकाश को अम्बर कहते हैं और भारत के मास किसी मनुष्य से नहीं अपितु आकाश से सम्बन्धित हैं।
हमारे प्रथम मास का नाम चैत्र इसलिए है कि उसका आरंभ होते ही सायंकाल में सूर्यास्त के समय पूर्वक्षितिज में अम्बर में चित्रशनक्षत्र का उदय हो जाता है और वह अम्बर में रात भर दिखाई देता है पुनः सूर्योदयकाल में नीचे चला जाता है और प्रत्येक चैत्र पूर्णिमा में पूर्णचन्द्र चित्रा में आ जाता है।
इसी प्रकार बारहों मास अम्बर से सम्बन्धित हैं । क्राइस्ट भारत आये थे और इस सिद्धान्त से परिचित थे। इसीलिए इंगलिश मासों के साथ अम्बर (आकाश) शब्द लगा है। इंगलिश में Septem, Sept. और Septi शब्दों का अर्थ है सप्तम या सात यह संस्कृत के सप्तम और सप्त से लिया गया है।
इसमें अम्बर जोड़ने से सेप्टाम्बर या सप्ताम्बर बन जाता है और यह मास सदा हमारे सातवें मास आश्विन में आता है। इस गणना में भारतीय पूर्णिमान्त मास का ही महत्त्व है; अमान्त का नहीं इंगलिश में आठ तारों वाली वीणा को Qctachord, आठ के समूह को Octad और Oet को आठ कहते हैं।
यह आक्ट शब्द संस्कृत के अष्ट से बना है। इनका अष्टाम्बर या आक्टूबर मास सर्वदा हमारे आठवें मास कार्तिक में आता है।
November में तो सीधे-सीधे नवम अम्बर लिखा है। इंगलिश में नव-नव वर्षों पर होने वाली क्रिया की नवेनियल Novennial कहते हैं। यह मास सदा हमारे नवममास अगहन में पड़ता है। अंग्रेजी में Decennary का अर्थ है दशक, Deccennial का अर्थ है दस वर्ष में होने वाला और December का अर्थ है दशक, अम्बर (मास)।
यहाँ दश और दशम शब्द स्पष्ट हैं। इंगलिश के Decigram, Decillion, Decimal और Decimet आदि शब्द भी ध्यान देगे योग्य हैं। इनमें सारे ढेसी दस से सम्बन्धित हैं। इंगलिश के जुलाई-अगस्त मास जूलियस सीजर और आगस्टस से सम्बन्धित हैं। रोमन सम्राट् जूलियस सीजर ने ३६५-२५ दिनों का सौरवर्ष चलाया।
उसके पूर्व यूनानी चान्द्रवर्ष और चान्द्रमास मानते थे। उनके छ मास ३० दिनों के और छ २९ दिनों के थे तथा वर्ष ३५४ दिनों का था। बाद में सोलन ने अधिमास पद्धति चलायी। ईजिप्ट के लोग ३६० दिनों में सौरवर्ष पूरा करके उसमें ५ दिन मिला देते थे। पारसियों की भी यही पद्धति है।
रोमनसंवत् में छठी शताब्दी में डायोनिसियस ने पुनः संशोधन किया परन्तु २७ /५५ पल का अन्तर तब भी पड़ता रहा। वह १७३९ में ११ दिनों का हो गया। उस समय पोपग्रेगरी की आज्ञा से ३ सप्ताम्बर को १४ सप्ताम्बर माना गया और चौथे वर्ष फरवरी २९ दिनों की कर दी गयी।
वर्ष का प्रारम्भ २५ मार्च से न कर प्रथम जनवरी से कर दिया गया। इस आदेश को इटली, डेनमार्क और हालैण्ड ने उसी समय मान लिया पर जर्मनी और स्विट्जरलैण्ड ने १७५९ में इंग्लैण्ड ने १८०९ में, प्रशिया ने १८३५ में, आयरलैण्ड ने १८३६ में और रूस ने १८५९ में प्रचलित किया।
ईसवी सन् की गणना क्राइस्ट के जन्म के तीन वर्ष बाद से की जाती है। जूलियस सीजर ने ई०पू० ४६ में वर्षारंभ को ६७ दिन आगे कर दिया था। पहले वर्षारंभ २५ मार्च को अर्थात् उस समय होता था जब दिनरात समान होते हैं। वैदिक वर्षारंभ, वसन्तारंभ और देवयानारंभ यही है।
जनवरी से वर्षारंभ का अर्थ है, उत्तरायण के पास वर्षारंभ करना। पहले फरवरी अन्तिम मास था। इसी से तिथि उसी में बढ़ाई जाती है। इसमें भारत से कुछ अवश्य लिया गया है। (चेतना विकास मिशन).





