अग्नि आलोक
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*वैदिक दर्शन : यौनाग्नि का नियंत्रण कठिन, स्वस्थ संभोग मोक्षपथ*

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       डॉ. विकास मानव

    काम (Sex) ‘शक्ति के रूप में’ उपस्थ स्थान लिंग के मूल में सोता है। इसे जगाना, उत्तेजित करना सरल है, किन्तु नियंत्रण में रखना कठिन है। यही कारण है जिसकी कुण्डली जागृत होती है अथवा जिसको आत्मबोध प्राप्त होता है, वह प्रथमत: और भी अधिक कामुक हो जाता है। अब यूँ कामुक होकर बह या तो पतन के गर्त में गिरेगा या ऊर्ध्वमुखी बनकर उन्नति के शिखर पर चढ़ेगा।

       मैथुन क्रिया के मार्ग से उत्थान एवं पतन, स्वर्ग एवं नरक, हर्ष एवं विषाद के दोनों तरह के मार्ग उपलब्ध हैं। निर्बल का अधोगमन तथा सबल का ऊर्ध्वगमन होता है।

मनुष्य की हृदयभूमि में मोहरूपी बीज से उत्पन्न हुआ एक वृक्ष है, जिसका नाम काम है।

  हदिकामद्रुमाश्चित्रो मोहसञ्चयसम्भवः।

    (महा. शान्ति, २५४/१)

 स्वयं यह वृक्ष प्रकट एवं लुप्त होता रहता है। फल इसके स्वादिष्ट हैं किन्तु प्रभाव विषैला है। जीव स्वाद के लिये इस वृक्ष के फल को खाता तथा तज्जन्य रोग (दुःख) से कराहता रहता है। जो फल के खाने की इच्छा का शमन करता हुआ, फल को देखता, सूंधता, स्पर्श करता मात्र है, वह दुःख से बच जाता है। 

    एवं यो वेद कामस्य केवलस्य निवर्तनम्। बन्धं वै कामशास्त्रस्य स दुःखान्यतिवर्तते॥

   (महा. शांति २५४/८)

      इस प्रकार जो कामनाओं के निवृत्त करने का उपाय करता है तथा कामशास्त्र को भोगविषयक बन्धन प्रद दुःखपूर्ण समझता है, वह सम्पूर्ण दुःखों को लाँघ जाता है।

     स्त्री और पुरुष तत्व अति सूक्ष्म है। इस स्वल्प सम्बन्ध के होने से वे पस्पर भार्या एवं पति कहलाते हैं। रति (सम्भोग करना) इन का साधारण धर्म है। 

   भार्यापत्योर्हि सम्बन्धः स्त्रीपुंसो: स्वल्प एव तु। 

रति साधारणो धर्म इति चाह स पार्थिवः॥

     (महा. अनु. ४५/९) 

इस बात को राजा सुकेतु ने कहा था। -ब्रह्मचारी भीष्म कहते हैं कि इस संसार में नरों को दूषित कर देना नारियों का स्वभाव है। इसलिये विवेकवान् विद्वान् स्त्रियों में आसक्त नहीं होते। 

   स्वभावश्चैव नारीणां नराणामिह दूषणम्।

अत्यर्थं न प्रसज्जन्ते प्रमदासु विपश्चितः।।

 (महा. अनु. ४८/३८)

      स्त्री को दारा कहते हैं। क्योंकि दा ददाति तथा रा राति अर्थात् वह पुरुष को प्रचुर सुख देती है अथवा पुरुष जिसे बहुत सुख देता है। अथवा, दारयाति शृणाति हिनस्ति वा जो पुरुष का दारण हिंसन करती है वा पुरुष जिसका दारण सम्पीडन करता है। सामन्यत: स्त्रियां सदा पुरुषों में आसक्ति रखती हैं तथा पुरुष भी नारियों में संसक्त होते हैं। 

   सज्जन्ति पुरुषे नार्यः सोऽर्थश्च पुष्कलःI

     (महा. अनु. ४३/१५)

नारद जी ने पञ्चचूडा अप्सरा से सामान्य यानी आम स्त्रियों के स्वभाव का वर्णन करने के लिये कहा था. वह वर्णन इस प्रकार है :

 १-कुलीना रूपवत्यश्च नाथवत्यश्च योषितः। 

मर्यादासु न तिष्ठन्ति स दोषः स्त्रीषु नारद।।

     हे नारद,  कुलीन युवती रूपवती है तो सनाथ (पतिवती) होने पर भी मर्यादा के भीतर नहीं रहती। यह स्त्रियों का दोष है। 

२- न स्त्रीभ्यः किञ्चिदन्यद् वै पापीयस्तरमस्ति वै।

 स्त्रियो हि मूलं दोषाणां तथा त्वमपि वेत्थ ह।।

     स्त्रियों से बढ़कर पापी अन्य कोई नहीं हैं। स्त्रियाँ सभी पापों की मूल हैं। इस बात को आप भी अच्छी तरह जानते हैं।

३- समाज्ञातानृद्धिमतः प्रतिरूयान् वशे स्थितान्। 

पतीननन्तरमासाद्य नालं नार्यः प्रतीक्षितुम्॥

     यदि स्त्रियों को दूसरे अपरिचितों से मिलने का अवसर मिल जाय तो वे अपने वश में रहने वाले समृद्ध एवं रूपवान् पति की प्रतीक्षा (परवाह) नहीं करती हैं। 

४- असद्धर्मस्त्वयं स्त्रीणामस्माकं भवति प्रभो। 

पापीयसो नरान् यद् वै लज्जां त्यक्त्वा भजामहे।।

    प्रभो ! हम स्त्रियों में यह सबसे बड़ा दोष है कि हम पापी से भी पापी पुरुषों को भी लाज छोड़ कर सम्भोगार्थ स्वीकार करती हैं। 

५- स्त्रियं हि यः प्रार्थयते सन्निकर्ष च गच्छति।

 ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेच्छन्ति योषितः।।

   जो पुरुष किसी स्त्री को चाहता है, उसके पास पहुँचता है तथा थोड़ी उस की सेवा कर देता है, वह स्त्री उसी को चाहने लगती है-वरती है-भोग के लिये चुनती है। 

६- अनर्थित्वान् मनुष्याणां भयात् परिजनस्य च। 

मर्यादायाममर्यादाः स्त्रियस्तिष्ठान्ति भर्तृषु॥

     स्त्री को चाहने वाला जब कोई पुरुष नहीं मिलता तथा परिजनों का भय रहता है तभी अमर्यादाप्रिय स्त्रियाँ अपने पति के पास टिकती हैं। 

७.नासां कश्चिदगम्योऽस्ति नासां वयसि निश्चयः।

 विरूपं रूपवन्तं वा पुमानित्येव भुञ्जते।।

     इन स्त्रियों के लिये कोई भी ऐसा पुरुष नहीं हैं, जो अगम्य हो। इन का किसी अवस्था विशेष वाले पुरुष पर निश्चय नहीं रहता। कोई रूपवान् हो या कुरूप हो, मात्र पुरुष होना ही पर्याप्त है। स्त्रियाँ हर जाति वय कुल कर्म वाले पुरुष का भोग करती हैं।

८. न भयान् नाप्यनुक्रोशात् नार्थ हेतोः कथंचन। 

न ज्ञातिकुलसम्बन्धात् स्त्रियास्तिष्ठन्ति भर्तृषु॥

     स्त्रियाँ न तो भय से, न दया से, न धन के लोभ से, न जाति कुल के सम्बन्ध से अपने पतियों के पास टिकती हैं।

 ९- यौवने वर्तमानानां भृष्टाभरणवाससाम्।

 नारीणां स्वैरवृत्तीनां स्पृहयन्ति कुलखियः॥

    जो यौवन सम्पन्न हैं, अच्छे आभूषण एवं वस्त्र धारण करती हैं, ऐसी स्वेच्छाचारिणी स्त्रियों के चरित्र को देख कर कुलवती स्त्रियाँ भी वैसा होने की इच्छा एवं चेष्टा करती हैं। 

१०- याश्च शश्वद् बहुमता रक्ष्यन्ते दयिताः स्त्रियः। 

अपि ताः सम्प्रसज्जन्ते कुब्जान्धजडवामनैः।।

      जो स्त्रियाँ बहुत सम्मानित हैं तथा परिसेवित हैं, जिनकी सदैव रक्षा की जाती है, वे भी घर में आने जाने वाले कूबड़े, अन्धे, मूर्ख, बौने लोगों से फँसजाती- अनुरक्त रहती हैं। 

११-पंगुष्वथ च देवर्षे ये चान्ये कुत्सिताः नराः। 

स्त्रीणामगम्यो लोकेऽस्मिन् नास्ति कश्चिन्महामुने।।

    हे महामुनि देवर्षि नारद । जो पंगु (चलने में असमर्थ) एवं अत्यन्त घृणित मनुष्य हैं उनमें भी स्त्रियों की असक्ति हो जाती है। इस लोक में स्त्रियों के लिये कोई भी अगम्य नहीं है।

 १२- यदि पुंसा गतिर्ब्रह्मन् कथंचिन्नोपपद्यते। 

अप्यन्योन्यं प्रवर्तन्ते न हि तिष्ठन्ति भर्तृषु॥

    हे ब्रह्मन् । यदि स्त्रियों को पुरुषों की प्राप्ति किसी भी प्रकार से सम्भव न हो और पति भी पास में न रह रहे हों तो वे आपस में ही कृत्रिम उपायों से सहमैथुन में प्रवृत्त होती हैं।

 १३- अलाभात् पुरुषाणां हि भयात् परिजनस्य च।

 बधबन्धीयाच्चापि स्वयं गुप्ता भवन्ति ताः॥

   पुरुषों के न मिलने से घर के परिजनों के भय से तथा बध, बन्धन के भय से वे सुरक्षित रहती हैं। 

१४-चलस्वभावा दुःसेव्या दुर्ग्राहा भावतस्तथा।

 प्राज्ञस्य पुरुषस्येह यथा वाचस्तथा स्त्रियः॥

   स्त्रियों का स्वभाव चञ्चल होता है, उनका सेवन भी कठिन है, वे पकड़ में नहीं आतीं। उन के भाव (अभिप्राय) वैसे ही समझ में नहीं आते जैसे विद्वान् पुरुषों की वाणी ।

 १५-नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः। 

नान्तकः सर्वभूतानां न पुसां वामलोचना॥

    आग कभी ईधन से तृप्त नहीं होती। समुद्र कभी नदियों के जल) से तृप्त नहीं होता। मृत्यु समस्त प्राणियों को खाते रहने से कभी तृप्त नहीं होती। इसी प्रकार वामलोचनाएँ- सुन्दर यौवनवती स्त्रियाँ पुरुषों से कभी तृप्त नहीं होतीं।

 १६- इदमन्यच्च देवर्षे रहस्यं सर्वयोषिताम्।

 दृष्टैव पुरुषं ह्यघं योनिः प्रक्लिद्यते स्त्रियाः॥

    हे देवर्षि । सभी रमणियों के सम्बन्ध में यह एक दूसरों रहस्यमय बात है कि मनोरम पापी पुरुष को देखते ही स्त्री की योनि गीली हो जाती है-स्त्री सम्भोग के लिये उद्यत हो जाती है। 

१७- कामानामपि दातारं कर्तारं मनसां प्रियम्। 

रक्षितारं न मृष्यन्ति स्वभर्तारमलं स्त्रियः।।

    सम्पूर्ण इच्छाओं को पूरा करने वाला तथा मन को प्रसन्न रखने वाला पति भी यदि स्त्री की रक्षा (भरण पोषण) में तत्पर रहने वाला हो तो, वे अपने पति के अंकुश में नहीं रहतीं।

 १८- न कामभोगान् विपुलान् नालंकारान् न संश्रयान् तथैव बहु मन्यन्ते यथा रत्यामनुग्रहम् ॥

    स्त्रियाँ न तो कामोपभोग की बहुत सामग्री को न सुन्दर आभूषणों को, न अच्छे घरों को, उतना महत्व देती है, जितना कि रति के लिये किये गये प्रस्ताव को। अर्थात् स्त्री के लिये सम्भोग का निमन्त्रण देना अधिक महत्वपूर्ण होता है, न कि प्रचुर भोग्य पदार्थ.

 १९- अन्तकः पवनो मृत्युः पातालं वडवामुखम्। 

सुरधारा विषं सर्पो वह्निरित्येकतः स्त्रियः।।

   यमराज, वायु, मृत्यु, पाताल, वडवानल (कृत्या), क्षुरे की धार, विष, सर्प, अग्नि- ये सब विनाश के कारक एक और तथा इन सब के बराबर अकेली स्त्रियाँ दूसरी ओर हैं। अर्थात् स्त्री भयंकरतम है। 

२०- यतश्च भूतानि महान्ति पञ्च यतश्च लोका विहिता विधाता।

 यतः पुमांसः प्रमदाश्च निर्मिता स्तदेव दोषाः प्रमदासु नारद॥

     हे नारद । जहाँ से पाँच भूत उत्पन्न हुए हैं, जहाँ से विधाता ने सम्पूर्ण भुवनों को रचा है, जहाँ से स्त्री पुरुष रचे गये हैं, स्त्रियों में वे दोष वहीं से आये हैं। अर्थात् सब कुछ प्रकृतिजन्य है, इसलिये स्त्रियों के दोष प्राकृतिक हैं, कृत्रिम नहीं। स्त्रियाँ मायावती होती हैं.

   *स्वस्थ संभोग है मोक्ष का मार्ग :*

         रात्रि से रति की उत्पत्ति है, दिवस से काम की उत्पत्ति.  दिन (काम) और रात्रि (रति) के युग्म शाश्वत हैं। दिन और रात्रि परस्पर पति पत्नी हैं। यह जोड़ा चिरन्तन है।

    जैसे कभी दिन बड़ा और रात्रि छोटी तथा कभी दिन छोटा और रात्रि बड़ी होती है, वैसे ही कभी पति बड़ा, पत्नी छोटी तथा कभी पति छोटा पत्नी बड़ी होती है।

      जैसे रात दिन वर्ष में दो बार बराबर होते हैं, वैसे ही पति पत्नी दो अवसरों : हर्ष और शोक उपस्थित होने पर बराबर होते हैं। रति काम महोत्सव का नाम जीवन है।

      बायां हाथ रति है, दायाँ हाथ काम है। बायाँ पैर रति है, दायाँ पैर काम है. चलते समय एक पैर आगे होता है एक पैर पीछे होता है, एक हाथ आगे और दूसरा हाथ पीछे होता है।

       ऐसे ही दैनिक कार्य कलापों में पुरुष वा स्त्री में से एक आगे एवं एक पीछे रहेगा. एक बड़ा है, एक छोटा.

    निष्क्रिय अवस्था में खड़े रहने पर दोनों पैर या दोनों हाथ बराबर रहते हैं, आगे पीछे नहीं होते। इसी प्रकार स्त्री पुरुष की बराबरी जीवन की स्थिरता शान्ति व मृत्यु है।

   बायाँ नेत्र स्त्री है, दायां नेत्र पुरुष है। बायाँ कान स्त्री है, दायाँ कान पुरुष है। ये दोनों बराबर है, किन्तु अलग अलग रहते हैं।

       ऐसे ही स्त्री पुरुष बराबर है किन्तु यह बराबरी अलग अलग रहने पर ही है। एक साथ होने पर बराबरी का प्रश्न ही नहीं। दोनों में एक दूसरे से बड़ा होने की दौड़ प्रारंभ होती है तो दाम्पत्य जीवन में संघर्ष एवं अशांति स्वाभाविक एवं अनिवार्य है।

       बायाँ नासाछिद्र स्त्री है, दायाँ नासाछिद्र पुरुष. दोनों छिद्र पास पास होते हैं और अन्दर की ओर मिले होते हैं। ऐसे ही स्त्री पुरुष का जोड़ा एक साथ सटे हुए शरीर वाले तथा अन्दर से मिले हुए मन वाले होने से से शोभा को प्राप्त होते हैं।

    अर्थात : नाक सम्मान, श्वसन संस्थान, जीवन का प्राण मार्ग ‘पति पत्नी का जोड़’ है. यही सामाजिक सम्मान, धर्म संस्थान, जीवन की गति है।

       नीचे का ओष्ठ स्त्री, ऊपर का ओष्ठ पुरुष है। मौन में ये दोनों ओठ सटे रहते हैं तथा बोलते समय खुले (अलग) होते हैं। ऐसे ही स्त्री-पुरुष सम्भोगावस्था में सटे (मिले हुए) होते हैं. स्त्री नीचे तथा पुरुष ऊपर होता है, कभी स्त्री ऊपर, पुरुष नीचे. सम्भोगेतर अवस्था में दोनों अलग अलग रहते हैं।

     कार्य क्षेत्र में पुरुष आगे आगे (ऊपर) तथा स्त्री उसको अनुगामिनी बन कर पीछे-पीछे (नीचे) होती है।

      प्रत्येक शरीर में हो रहे इस रतिकाम महोत्सव को जो देखता है, वह ब्रह्मज्ञानी है।

 शरीर के आधा भाग स्त्रीसंज्ञक है तथा आधा भाग पुरुषसंज्ञक.

    बामङ्ग वा वाम पार्श्व स्त्रो दक्षिणांग वा दक्षिण पार्श्व पुरुष.

    परमात्मा का आधा शरीर स्त्री का और आधा शरीर पुरुष का है। परमात्मा इस लिये आधा पुरुष है तथा आधा स्त्री। इस कारण उसका नाम अर्धनारीश्वर है।

     अर्धनारीश्वर ही शिव (शान्त) है। जो अर्धनारीश्वर नहीं है वह अशिव (अशान्त) है।

    स्त्री की गति पुरुष के लिये है तथा पुरुष की गति स्त्री को पाने के लिये है। जब दोनों एक दूसरे को प्राप्त कर लेते हैं तो उन की गति समाप्त हो जाती है। गति का समाप्त होना हो शिवत्व है।

     शिवत्व= कल्याण, शान्ति, तृप्ति, मुक्ति.

     कामुक स्त्री और उसके बेसुध होने तक उसकी योनि में अपना लिंग सक्रिय रखने वाला पुरुष जब परस्पर संस्लिष्ट होने के बाद स्खलित, क्षरित होते हैं तो उनकी एक-दूसरे को पाने, भोगने, खुद में समा लेने की गति का अन्त हो जाता है।

   इस प्रकार एक दूसरे से तृप्त होने से वे शान्त (निष्क्रिय) हो जाते हैं। स्त्री पुरुष का ऐसा जोड़ा परस्पर तृप्ति पाकर संसर्गोपरान्त शान्त हो जाता है। इसलिये ऐसा युग्म शिव है।

   नरनारी रूप परमात्मा निश्चय ही स्तुत्य है। नारीनरशरीराय स्त्रीपुंसाय नमोऽस्तु ते.

Ramswaroop Mantri

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