कुमार चैतन्य
पृथ्वी की एक तस्वीर शनि ग्रह के पास से कैसिनी स्पेसक्राफ्ट ने ली थी. मजे की बात यह है कि नासा ने एडवांस में यह घोषणा की थी कि फलां तारीख को शनि ग्रह के पास से पृथ्वी की सेल्फी ली जाएगी।
तो हो सकता है कि यह सुदूर अंतरिक्ष से खींची गई पहली ऐसी तस्वीर है, जिसे लेते वक्त 1 अरब 44 करोड़ किलोमीटर दूर मौजूद कुछ लोग एक्चुअल में अंतरिक्ष की ओर निहार कर सेल्फी पोज दे रहे हों।
. पर बहरहाल, इस तस्वीर में एक पिक्सल अंतरिक्ष के लगभग 85 हजार किलोमीटर एरिया को रिप्रेजेंट करता है। अर्थात, पृथ्वी की हैसियत इस तस्वीर में एक पिक्सल मात्र की भी नहीं है। थोड़ा और दूर चले जाइए, तो सूर्य स्वयं इतना बौना हो जाए कि मुड़कर देखने पर रोशनी का एक जीर्ण धब्बा मात्र लगे, पृथ्वी और पृथ्वीवासियों की तो हैसियत ही क्या।
सुदूर किसी आकाशगंगा में चले जाइए तो आसमान में हमारे तारामंडल का ही वजूद समाप्त होता प्रतीत होगा।
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सुदूर ब्रह्मांड से देखने पर पृथ्वी भले ही रोशनी का एक जीर्ण धब्बा प्रतीत होती हो, पर इस जीर्ण नीले-सफेद धब्बे की अहमियत हम इंसानों के लिए कुछ और ही है।
काल्पनिक ईश्वरों, काल्पनिक मूल्यों, काल्पनिक सीमारेखाओं के लिए आत्मोसर्ग को तैयार, दूसरी सभ्यताओं को जमीदोंज कर रक्तकाण्ड रचने वाले, 4-5 वर्ष में लोकप्रियता के आधार पर अपना नायक चुन कर उसके कदमों में बुद्धि-विवेक अर्पित कर देने वाले, वैज्ञानिकों-बुद्धिजीवियों को दरकिनार कर बाबाओं, विदूषकों और युद्धनायकों को सर पर बैठाने वाले इसी दुनिया में तो पाए जाते हैं।
. यही वो अजीबोग़रीब दुनिया है जहाँ एक प्रजाति अपने संसाधनों का सबसे बड़ा हिस्सा इसलिए खर्च करती है ताकि अपनी ही प्रजाति के जीवों से खुद की जान-माल-असबाब की रक्षा कर सके।
यही तो वो दुनिया है जहां सुरक्षा के नाम पर परम विध्वंसक अस्त्रशस्त्रों का निर्माण कर अपने ही हाथों अपना सर्वनाश करने में सक्षम जीव रहते हैं।
चंद्रयान भेज कर तकनीक पर गर्व कराते वैज्ञानिक हों, या विकास को मुंह चिढ़ाते गटर में उतरे मजदूर…आरामदेह महलों में सोते सेठ हों या सड़क पर दो रोटी ढूंढती मासूम निगाहें… सीमा पर ठंड में ठिठुरता जवान हो या उस जवान की घर पर प्रतीक्षा करती उसकी विवाहिता हो… अपने सपनों की उड़ान पूरी करता युवा हो अथवा, बुढापे में अपनों द्वारा बेघर कर दिए गए बुजुर्ग हों…. राजा हो या रंक, मूर्ख हो अथवा विद्वान, साम्राज्यों की मलिकाएँ हों अथवा सड़क पर गिद्धों से जिस्म और आबरू बचाती अबलाएं – सब के सब इस दुनिया पर पाए जाते हैं।
चाहें नायक हो या खलनायक, शोषित हो या शोषक, प्राण लेने वाला हो अथवा प्राण बचाने वाला, पापी हो अथवा धर्मात्मा – सब इसी रौशनी के धूमिल धब्बे पर ही तो पाए जाते हैं।
कवियों की कविता हो, शायरों की ग़ज़ल, स्कूल में छुट्टियों के दी गयी एप्लीकेशन, बिज़नेस प्रपोज़ल्स, प्रेमियों की विरह में लिखे गए गीत हो या नफरत को ईंधन देकर सैकड़ों रक्तकांडों को प्रायोजित करने वाली आसमानी किताबें .. सब की सब इसी धरती पर लिखी गयी हैं।
. कौन भुला सकेगा इतिहास के उन काले पन्नों को, जिन्हें कुछ लोगों ने मासूमों के रक्त से रंग दिया था, ताकि वे इस रौशनी के जीर्ण धब्बे की कुछ गज ज़मीन पर अपने मजहब का परचम लहरा पाएं।
. याद करिए इतिहास के उन स्याह पन्नों को, जब इन्सानों को चौराहें पर सरेआम फूंक दिया गया, ताकि ईश्वरीय वाणी होने का दावा करती उनकी बड़बोली किताबों पर कोई उँगली न उठा पाए।
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अपनी अदूरदर्शिता, अज्ञान और आत्मश्लाघा में अपने और सहजीवों के अस्तित्व के लिए खतरा बन चुके मनुष्यों की मदद को ब्रह्मांड के इन अंधेरों से कोई देवदूत या मसीहा आ जावे – इसकी उम्मीद कम ही दिखती है।
इस तस्वीर को देख कर संसार के प्रत्येक मनुष्य को विराट ब्रह्मांड में अपनी हैसियत को तौलना अवश्य चाहिए।
. खैर जो भी है, यह जो रौशनी का मामूली धब्बा है, इसे गौर से देखिए…. यही समस्त संसार में एकलौता ज्ञात स्थान है, जहां परमाणुओं के ढेर हंसते हैं, खेलते-कूदते हैं, गुनगुनाते भी हैं, प्रेम करना, फेसबुक चलाना सीख पाए हैं। हमें फिलहाल नहीं पता कि पदार्थ में यह प्राण किसने फूंका है।
जिसने भी फूंका हो, संसार में एकमात्र ज्ञात पदार्थ का यह खूबसूरत संयोजन सर्वथा संरक्षण योग्य है।
. जब तक देह में प्राण है, इस रौशनी के धब्बे की रक्षा करिए, प्रेम करिए, संरक्षण कीजिये।
Earth is a tiny fragile place… Only known place in Cosmos to harbour life.
It must be cherished.!!





