शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी आज दार्शनिक मानसिकता में लीन है। आज मिलते ही दार्शनिक चर्चा शुरू करते हुए संतो के द्वारा दिए गए उपदेश सुनाने लगे।
एक दार्शनिक ने कहा है,सुख किसी को कभी भी मिलता नहीं हैं। सुखा मान लेना चाहिए।
हर हाल में सुख मानना समझदारी है। जीवन और दुःख दोनो समानांतर चलते हैं।
संत गुरु नानकजी की इस सूक्ति का स्मरण होता है नानक दुखिया सब संसारा
संत रामदासजी ने मना चे श्लोक नाम से जीवन को शुद्ध रूप से जीने का उपदेशक काव्य लिखा हैं। मराठी भाषा में लिखे इस काव्य की निम्न पंक्तियों में संत रामदास कहते हैं
जगी सर्व सुखी असा कोण आहे, विचारी मना तुच शोधूनी पाहे
अर्थात सम्पूर्ण जगत में सभी तरह से सुखी हो,ऐसा कोई एक व्यक्ति ढूंढ के दिखाओ।
मैने सीतारामजी से कहा आज अपने अंदर के व्यंग्यकार को छोड़ दार्शनिक बन गए हो।
इनदिनों अमृतकाल की बयार अच्छे दिनों के विशेषण से विभूषित होकर सर्वत्र महक रही है।
देश में सर्वत्र धार्मिक बाबाओं के मुखारबिंद से कथा,प्रवचन,का प्रवाह हो रहा है।
धार्मिक स्थानों पर आस्थावान लोगों की तादाद बेतहाशा बढ़ रही है।
क्या ये सारे लोग सुखी नहीं है?
जब जनता में धार्मिकता जागती है, तब आस्था कहती है,सड़कों पर पड़े गड्ढों को मत देखो?
प्रगति कहती है,महंगाई को नजरंदाज करों? विकास कहता है,बेरोजगार के मुद्दे को भूल जाओ?
धार्मिकता के समानांतर देश में एक कलुषित धारा भी बह रही है।
इस धारा में बहने वाले लोग कानून व्यवस्था की तमाम धाराओं का उलंघन करने में अपना सुख मानते हैं।
इनदिनों एक यह धारा देश की युवा पीढ़ी को रास आ रही है,इस धारा ने मादक पदार्थों की बाढ़ ला दी है।
युवापीढ़ी के साथ मादक पदार्थों का सेवन करने वालों के लिए
मादक पदार्थों की उपलब्धता तो यत्र,यत्र सर्वत्र सहजता से उपलब्ध है।
मादक पदार्थों के सेवन पश्चात
सेवन करने वाले की मानसिकता में जो सुसूर पैदा होता है, वह छद्म गुरुर पैदा करता हैं। यही गुरुर हिंसक वारदात करने के लिए उन्हें उकसाता है।
सच में त्रेता युग में रामचंद्र जी ने सीताजी से कलयुग में लोगों के आचरण के संबध में जो भी कहा वह
अक्षरशः सत्य हो रहा है।
सीतारामजी ने मुझसे से कहा मैने तो प्रवचन की सिर्फ भूमिका बनाई थी,आपने तो पूरा प्रवचन ही दे डाला।
चलो वार्ता को यहीं समाप्त करते हैं।
कनक (सोना) कनक(धतुरा) ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय।।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





