
कनक तिवारी
कोलंबस ने अमेरिका को ढूंढ़ा। उसका वहां के मूल निवासियों (जिन्हें इतिहास ने उत्तर अमेरिकी इंडियन या लोकप्रिय नाम रेड इंडियन दिया) से खूनी संघर्ष 400 वर्षों तक चला। रेड इंडियन संस्कृति, जीवन और इतिहास अब गुमनाम हैं। कोलंबस ने 2.50 लाख आदिवासियों को हैती में जबरिया गुलाम बनाया। एक प्रजाति की संख्या तो घटकर बमुश्किल 500 रह गई थी। इन मूल वंशों को तबाह करने कई बार यूरोपियों ने चिकनपाॅक्स, मीज़ल्स और बड़ी माता जैसी बीमारियां उनमें नीयतन फैलाईं। यूरोपीय सभ्यता की हैवानियत का चेहरा खूरेंजी से रंगा हुआ है। कुदरत के साथ रहने वाले आदिवासियों के लिए ये थोपी गईं बीमारियां लाइलाज थीं। कुछ प्रजातियों के करीब 80 फी सदी लोग इन बीमारियों से मर ही गए।
उन्नीसवीं सदी में गोरी चमड़ी के हमलावर अमेरिकियों ने रेड इंडियन्स को मजबूर किया वे जंगलों और पहाड़ों की ओर चले जाएं। समझौते और संधियां हुईं। लेकिन (जैसी आज के अमेरिका की भी आदत है) किसी न किसी बहाने से समझौते सरकारों द्वारा ही तोडे़ गए। उन्नीसवीं सदी के अंत में बचे खुचे मूल निवासियों को “सभ्य “? बनाने का शिगूफा छेड़ा गया। बच्चों को स्कूलों में तालीम तो दी गई , लेकिन कानून बनाकर उन्हें उनकी मादरी जुबान और पुश्तैनी जातीय आदतों से महरूम कर दिया गया। युद्ध में लगातार हार, तथाकथित शहरी सभ्यों के सांस्कृतिक दबाव, आरक्षित जगहों पर की गई बसाहट, सांस्कृतिक उलटफेर , मूल आदिवासी गोलियों का सफाया, सरकारी नीतियों में बार बार बदलाव, कमतर समझ कर मूल निवासियों को गुलाम बनाने की हविश, कुपोषण, गरीबी, शराबखोरी, हृदयरोग और मधुमेह जैसी बीमारियों ने तथाकथित सभ्यों का सहायक बनकर रेड इंडियन्स को तबाह कर दिया।
आस्ट्रेलिया के मूल आदिवासियों की सामूहिक हत्याएं अंगरेजों ने कीं। अंगरेजों ने आदिवासियों को पुश्तैनी रहाइशों से बाहर बेदखल किया गया। उन्हें गोलियां मारी गईं और उनकी ज़हरखुरानी की गई। उन्हें गुमनाम इलाकों में खदेड़ा गया। बीसवीं सदी की शुरुआत में कई आदिवासी प्रजातियों का तो जड़ से ही नाश हो गया। प्रोफेसर कोलिन टैट्ज़ ने ‘जेनोसाइड इन आस्ट्रेलिया‘ नामक अपनी पुस्तक में इस भयावह अत्याचार का विषद वर्णन किया है। आदिवासी प्रजातियां दुनिया में अपने वन-जीवन में संस्कृति और सभ्यता के रखरखाव तथा बेहतरी की ओर मुखातिब थीं। वैश्वीकरण ने बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में पूरी दुनिया को आर्थिक विकास की नई समझ दे दी। जुल्म पहले से ही आदिवासियों पर ढाए जाते रहे। उन्हें सभ्य लोग ‘जंगली जानवर‘, ‘जहरीले नाग‘, ‘अमानुष,‘ ‘इंसानियत पर कलंक‘, ‘नफरत के लायक और ‘पब्लिक न्यूसेंस‘ जैसे शब्दों से रेखांकित करते थे। दुनिया के सभ्य मुल्कों में आदिवासियों को बचाने के लिए कई सुरक्षात्मक कानून भी बनाए गए, लेकिन वह बरायनाम रहे। भूगोल और कानून के हथियारों से तथाकथित सभ्य मनुष्यों ने मूल संस्कृतियों का निर्ममतापूर्वक कत्लेआम किया है।
दक्षिण अमेरिका में आदिवासियों पर सामूहिक अत्याचार की अनुगूंजें उतनी वाचाल नहीं हैं। ब्राजील में करीब चालीस आदिवासी प्रजातियां हैं। बोलिविया, पराग्वे, इक्वेडोर और कोलंबिया में आदिवासियों की संख्या बहुत नहीं है। पेरू में करीब पंद्रह आदिवासी प्रजातियां हैं। पेरू के तेल भंडार करीब 75 प्रतिशत घने जंगलों के इलाकों में हैं। बड़ी तेल उत्पादक कंपनियों को सरकारें न्यौता देती रही हैं। आदिवासी समुदाय में आक्रोश और शोषण का भय गहराता रहा है। पापुआ न्यू गिनी में मूल निवासियों में अपने अधिकारों को लेकर जागृति और चेतना है। पापुआ न्यू गिनी में भूमि का मालिकाना हक आदिवासी समुदाय का होता है। समुदाय के अपेक्षाकृत गरीब और मजलूम लोगों में सुरक्षा की भावना है क्योंकि पूंजी और फसल का उत्पादन और वितरण समता के सिद्धांत के आधार पर करने की कोशिश की जाती रही है। उनका मानना है कि मनुष्य धरती समेत पूरी कुदरत का न्यासी है। मनुष्य धरती का मालिक है-यह तो आधुनिक पश्चिमी सभ्यता की पूंजीवादी समझ है। उसकी बुनियाद रोमन कानून से उपजती है। यही तो भारत में आदिवासी इलाकों में और विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाकर किया जा रहा हैै।
विश्व बैंक और तमाम अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का विकासशील देशों पर दबाव है। अमेरिका और यूरोप अपनी खनिज संपदाओं का उत्खनन नहीं कर रहे हैं। अमेरिका ने सद्दाम हुसैन पर झूठे आरोप लगाकर अरब मुल्कों के तेल उत्पादन पर अपना व्यापारिक शिकंजा कसा। हिन्दुस्तान उसके लिए फकत ग्राहक देश ही है। अमेरिका अपनी खारिज दवाइयां नए रैपर लगाकर बेचता है। आतंकवादी और आतंक पीड़ित देशों, दोनों को चोरी और साहूकारी से अपने हथियार बेचता है। विदेश नीति में दलाली, समझौता, संघर्ष और गुप्तचरी, सबके लिए स्पेस रखता है। चीन से संघर्ष करना चाहता है और गलबहियां भी। दक्षिण पूर्व एशिया यूरोप और दक्षिण अमेरिका वगैरह में अपने कुछ पिट्ठू देश भी पालता है।
भारत उसके लिए सौंदर्य का भी बाजार है। कुछ साल पहले लगातार भारत की युवतियां विश्व सुंदरियां बनती रहीं। गोरों ने भारत के कुशल इंजीनियरों, डाॅक्टरों और प्रबंधन विशेषज्ञों को अपने यहां बेहतर नौकरियां देने के लालच और अवसर दिए। धीरे धीरे उनमें यूरो- अमेरिकी संस्कृति के अक्स इंजेक्ट भी करते रहे। कम्युनिस्ट दुनिया के टूटने के बाद अमेरिका लोकतंत्रीय देशों का अधिनायकवादी नेता है। भारत की मौजूदा शासन-नीति अमेरिकी विचार की पिछलग्गू है। दुनिया और भारत के सभी शोषक चाहते हैं भारत की खनिज, वन और मानव कौशल्य की पूरी आदिवासी दौलत लूट ली जाए।
रेड इंडियन्स में कुछ लोग हिंसक भी थे। उनमें लड़ने का ज़्यादा माद्दा भी था। यही काम धनुर्धर माओरियों ने भी किया। आधुनिक सभ्यता का शोषक पूंजीवादी विचार भारतीय राजनयिकों के जेहन में पैठ गया है। दौलत की लूटखसोट के अधिकारों पर बंधन नहीं है बल्कि सरकारी कानूनों का बढ़ावा है। मुनाफाखोरी, जमाखोरी और कालाबाजारी की रोकथाम करने वाले कानूनों को लाइसेंस परमिट राज की औरस संतानें कहकर दाखिल दफ्तर कर दिया गया है। लिहाज़ा महंगाई और मुद्रा स्फीति उफान पर हैं। उन्हें रोकने के प्रयत्न अपनी पश्चिमी, आधुनिक, औद्योगिक, मशीनी दृष्टि के चलते सरकारें कर ही नहीं सकतीं। बस्तर इसी आधुनिक विकास-दृष्टि का दंश झेल रहा है। बस्तर एक प्रतीक है। अमेरिका के मौजूदा गोरे चेहरे के पीछे जो काले इरादे हैं उन्हें इतिहास पढ़ने से कोताही करेगा। तो याद रहे बस्तर में भी रेड इंडियन्स का इतिहास दोहराए जाने की कोशिशें हो रही हैं।





