~ डॉ. विकास मानव
*प्राइज और कॉस्ट :*
आप जो क़ीमत किसी रिश्ते के लिए चुकाते हैं, उसे समझना बहुत ज़रूरी है क्योंकि बस कुछ लोग ही आपकी ज़िंदगी में सही COST के साथ आते हैं जिनकी वैल्यू समझना आवश्यक होता है.
एमबीए की किताब में बेसिक सा वैल्यू-प्रिंसिपल पढ़ा था : किसी भी चीज़ की COST और PRICE में अंतर होता है. दोनों एकदम अलग चीज़ें हैं.
एक उपभोक्ता/ग्राहक या consumer के नज़रिए से देखें तो PRICE वो है जो आप किसी वस्तु के लिए एक बार शुरुआत में देते हैं, और COST वो है जो आप उस पर खर्च करते रहते हैं जब तक कि आप उस वस्तु का इस्तेमाल करते हैं.
मतलब PRICE तो सिर्फ़ उस वस्तु का दाम भर है जो आप उसे खरीदते वक़्त देते हैं, लेकिन बाद में उसकी मरम्मत, पार्ट्स वग़ैरह पे जो आप खर्च करते हैं, उसे PRICE में जोड़ दें तो आपको वो वस्तु इस्तेमाल करने के दौरान जितने की पड़ती है उसे COST कहेंगे.
इसीलिए किसी भी चीज़ को लेते समय सिर्फ़ उसके PRICE को ही नहीं बल्कि COST को भी ध्यान में रखना चाहिए. हम कम PRICE वाली चीज ले लेते हैं, जबकि उसके पीछे की महँगी COST का आकलन नहीं करते.
होना इसके उलट चाहिए. वो चीज़ ढूंढें जिसका ओवरऑल COST कम हो. भले ही उसकी PRICE ज़्यादा ही क्यूँ न हो.
ठीक यही सिद्धांत हर रिलेशन में भी एप्लाय होता है. भले ही चाहे आपके दोस्त हों या कोई और रिलेशन. अक्सर हम सस्ते रिश्तों से काम चलाना सीख लेते हैं और ताउम्र उनकी मरम्मत पर अपनी मानसिक शांति को खर्चते रहते हैं.
क्यूँ नहीं हम बहुत सारे सस्ते और हल्के लोगों के बजाय कुछ महँगे या अच्छे लोगों से जुड़ते : भले ही उनसे जुड़ने में वक़्त लगे और ऐसे लोग कम ही क्यूँ न हों. कम से कम उनके साथ एक मानसिक शांति और सुक़ून तो मिलता है, जो बेहद ज़रूरी है.
शायद, कहीं न कहीं मैं इस सिद्धांत से बहुत प्रभावित रहा हूँ. इसीलिए बहुत कम लोगों से जुड़ पाता हूँ. बहुत कम दोस्त बना पाता हूँ.
अपने काम और प्रोफेशनल में भी बनावटी और हल्के लोगों से सिर्फ़ उतना ही जुड़ पाता हूँ जितना कि काम के लिए ज़रूरी है.
जो लोग अपने अल्फाज़ और ज़बान की अहमियत नहीं समझते, उनसे जुड़ नहीं पाता और वो हो नहीं पाता जो मैं नहीं हूँ.
यही अपेक्षा मैं आप सभी से करता हूँ. चाहता हूँ कि वहाँ जुड़िए जहाँ दिल पूरी तरह से लगे, दोस्त उन्हें बनाइए जिनकी PRICE भले ही ज़्यादा लगे, लेकिन लंबे समय में ओवरऑल COST कम हो.
इतनी सी बात समझ आ गई, तो समझिए ज़िंदगी को समझ लिया.
*दिमाग़, दिल, और प्रेम :*
ज़िंदगी मुश्किल जितनी है, उससे भी ज़्यादा चौंकाती भी है. यही तो मज़ा है ज़िंदगी का कि अक्सर वो ही चला जाता है जो आपके वश में है. फ़िर भी आप न चाहते हुए उस पर वश नहीं रख पाते अपना. ज़िंदगी इसी ख़ूबसूरती का तो नाम है.
कितने ही लोग ज़िंदगी भर अपने मन में एक सूरत उकेरते हैं, कि उनके ख़्वाबों का इंसान कैसा होगा या होगी. हर एक की कुछ सोच होती है कुछ ख़्याल होते हैं. सोच में बनने वाली सूरत भी लोग उसी के हिसाब से बनाते हैं. उसी एक सोच के अनुरूप वाले इंसान की प्रतीक्षा में रहते हैं.
लेकिन फ़िर भी ज़्यादातर लोग ऐसे इंसानों के साथ मन से बंधकर बह जाते हैं, जो उनकी सोच के सरीखा नहीं होता. फ़िर भी जाने क्यूँ उनके एहसास के साथ जुड़ जाते हैं.
कभी सोचकर देखिए : एहसास होगा कि सच में ऐसा ही होता है. बहुत से लोग ऐसे इंसान के साथ प्रेम में पड़ते हैं जो उनकी सोच की तरह हो या न हो उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता. सब कुछ एहसासों का ही खेल सावित होता है.
जब प्रेम होता है तो दिमाग़ काम नहीं ही करता है. हलांकि ये सारा ख़ाका दिमाग़ ने ही खींचा होता है, लेकिन जब प्रेम में पड़ने की बात आती है तो दिल दिमाग़ पर हावी होकर अपना काम कर ही जाता है.
फ़िर दिल को फ़र्क़ भी नहीं पड़ता कि दिमाग़ को प्रेमी कैसा चाहिए था, या प्रेयसी कैसी चाहिए थी. दिल को तो बस एहसास समझ आते हैं और एक कम्फर्ट समझ आता है. बाक़ी दिमाग़ के बनाए चित्र को तो वो कंसीडर करता भी नहीं है.
ऐसा ही होता है प्रेम. आप चाहें या न चाहें आपको वहीं पर जोड़ देता है जहाँ आप सोच भी न सकते हों. भले ही दिमाग़ की बनाई गई परिभाषा में वो इंसान फ़िट होता हो या न होता हो.
प्रेम बस हो जाता है. किस से होता है, क्यों होता है, कब होता है : मायने रखता भी नहीं है.
इसलिए हो सके तो उस इंसान के साथ बने रहिए. प्रेम होना और उसके साथ बने रहना : ये दोनों बहुत कम को नसीब होता है.





