नीलम ज्योति
भोजन से निवृत्त होकर आसनस्थ हुई हूँ। विचार कर रही हूँ- भगवान् को भी भोजन कराना चाहिये। भगवान् को भोजन में क्या चाहिये?
जीव के पास क्या है, जो भगवान् को सद्यः दे?
भोजन में जीव प्रमुखतः दो-दो वस्तुएँ लेता है। ये वस्तुएँ हैं दाल-भात / रोटी- सब्जी / सत्तू- चटनी/चाय- नमकीन।
अर्थात् एक सरस एक नौरस। जीव का मन और बुद्धि भगवान् का प्रिय भोज्य है। मन सरस है, बुद्धि शुष्क है। भगवान् अपनी भूख मिटाने के लिये जीव से यही दो चाहते हैं।
कृष्ण स्वयं कहते हैं :
“मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धि निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥”
(गीता १२।८)
धनधान्यादि का अर्जन करने वाले अर्जुन नाम के जीव से भगवान् कहते हैं- हे जीव। तू अपना मन मुझमें लगा, अपनी बुद्धि भी मुझमें लगा। ऐसा करने पर जो परिणाम होगा उसके विषय में भगवान कहते हैं- हे जीव।
ऐसा करने से तू मुझमें निवास करेगा। अर्थात् मैं तुझे अपनी मन-बुद्धि दे दूंगा तू मुझ सा हो जायेगा। इसमें कोई सन्देह नहीं। यह सत्य वाक् है।
मन = दाल।
बुद्धि=भात।
मन=रसदार सब्जी।
बुद्धि= रोटी।
अतः मैं अपना मन बुद्धि ईश को देकर आश्वास्त हो रही हूँ।
भगवान् का प्रिय बनना है तो ऐसा करना होगा।
गीता के अध्याय 12 के श्लोक संख्या 14 में भगवान् कहते हैं :
“मय्यर्पितमनोबुद्धिः यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।” (चेतना विकास मिशन).





