अग्नि आलोक
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 अमृत *काल*?

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शशिकांत गुप्ते इंदौर

समाजवादी विचारक,चिंतक,गांधीजी के आदर्श विचारों को आमली जामा पहनाना ने वाले,स्वतंत्रता सैनानी, डॉ.राम मनोहर लोहियाजी ने संसद को देश की सबसे बड़ी पंचायत कहा था।
लोहियाजी की नेहरूजी से बहुत ही तीखी बहस होती थी।
नेहरूजी को तो सदन में नोकर भी कहा गया। यह सब भारतीय संस्कार और संस्कृति को बरकरार रखते हुए,शालीन,और मर्यादित भाषा में होता था।
लोहियाजी ने कहा है,मेरे सबसे बड़े राजनैतिक विरोधी नेहरूजी ही हैं, मेरे सबसे अच्छे मित्र भी नेहरूजी ही है।
लोहियाजी से पूछा यदि आप बीमार हो जाओगे तो आपका इलाज कौन करवाएगा?
लोहियाजी ने कहा था नेहरूजी ही करवाएंगे।
संसद भवन लोकतंत्र का पवित्र मंदिर है। यह मंदिर विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का गौरव है।
आज क्या हो गया है।
नया भवन,इतना अपवित्र कैसे हो गया? कहा गई संस्कार और संस्कृति की सीख,जो सुबह दी जाती है?
क्या गणवेश बदलने से पाठ्यक्रम में भी बदलाव आ जाता है?
कहां लोप हो गई,राष्ट्रवादी मानसिकता? क्या कोई भी व्यक्ति किसी भी मंदिर में, आराधना स्थल,इबाददगाह,या गुरुद्वारे में अपशब्द बोल सकता है,या बोलता है?
अपने पवित्र संसद की गरिमामय परंपरा है,एक बार तात्कालिक जनसंघ के संसद अटल बिहारी वाजपेयीजी ने एक बहस के दौरान अपने चौदह मिनिट लोहियाजी को ही दिए थे।
आचार्य कृपलानी ने भी अपना समय लोहियाजी को दिया था।
यह आदर्शरूपी आपसी समन्वय था।
जब मधुलिमयेजी युवावस्था में प्रथम बार संसद में गए,उन्होंने बहुत ही प्रखरता के साथ, सदन में तात्कालिक व्यवस्था का विरोध किया था।
लिमायेजी के वक्तव्य से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री नेहरूजी, लिमयेजी के घर गए। प्रधानमंत्री को अपने घर देखकर लिमयेजी को आश्चर्य हुआ।
नेहरूजी ने कहा मै चाय पीने आया हूं। यह कहते हुए,नेहरूजी ने लिमयेजी से कहा आप बहुत अच्छा बोलते हो, बस मेरा यह निवेदन है कि,आप जो भी मुद्दे प्रस्तुत करो,वे तथ्य के साथ प्रस्तुत किए करो।
लिमयेजी अपनी पुस्तक में लिखा है कि,नेहरूजी की उपदेशक सलाह के बाद मैने सदन में हमेशा
जो भी वक्तव्य दिया वह पूर्ण तथ्य के साथ।
लोकतंत्र के इस पवित्र मंदिर के ऐसे अनेक उदाहरण है।
उपर्युक्त उदाहरणों का याद करने का अभिप्राय लोकतंत्र के मंदिर की गौरवमय,आदर्शरूपी परंपरा का स्मरण करना है।
आज तो सखेद आश्चर्य होता है,एक और अमृतकाल का ढिंढोरा पीटा जा रहा है दूसरी ओर पवित्र मंदिर में शाब्दिक गरल का वमन कर पवित्र मंदिर को कलुषित किया जा रहा है।
जब कोई शख्स विषाक्त शब्दों में गरल का वमन कर रहा था,तब कुछ सदस्य मुस्कुरा रहे थे,मानो,वे विषाक्त गरल के वमन का समर्थन कर रहे थे?
इन दिनों आहत होना भी एक फैशन हो गया है।
किसी को आहत करना क्या गौरव की बात है?
भारतीय संस्कार,संस्कृति,
भारतीय आदर्श जैसे शब्दों का अपने मुखारबिंद से सिर्फ उच्चारण करना,यह ढकोसला मात्र है। जबएक इन शब्दों को अपने आचरण में नहीं लाएंगे, तबतक हम सिर्फ उक्त शब्दों का कृत्रिम आवरण ओढ़े रहेंगे।
हमारी कथनी करनी में अंतर बरकरार रहेगा?
उक्त संदर्भ में शायर फैजल अमीन फ़ैज़ की एक ग़ज़ल के कुछ आशयार मोजू हैं।
ज़हर पर ज़हर चल नहीं सकता
साँप, बिच्छू को निगल नहीं सकता
तजरबा लाख कीजिए इस पर
फिर भी पत्थर पिघल नहीं सकता
ग़ैर की टाँग खींच कर भाई
कोई आगे निकल नहीं सकता

Ramswaroop Mantri

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