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*इस्लाम : जानिए धर्म और राज्य का अंतर्संबंध*

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         ~पुष्पा गुप्ता 

क़ुरान के मुताबिक़ अल्लाह , जिसके अलावे और जिसके जैसा कोई दूसरा अल्लाह नहीं है (ला इलाह इल अल्लाह ), अपने द्वारा निर्मित पूरी  कायनात का सर्वोच्च  स्वामी है और उस पर असीमित संप्रभुता (unlimited sovereignty) रखता है।

     अल्लाह अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ जिसे चाहे हुकूमत दे सकता है , और जब जिससे चाहे हुकूमत वापस ले सकता है । इसका मतलब यह है कि इस्लाम में राज्य पहले से ही मौजूद है जिसके नागरिकों के लिए पैगंबर मुहम्मद की मार्फ़त भेजे गए दैवीय आदेशों का पालन बाध्यकारी है।

    चूँकि मुहम्मद, इस्लाम के आख़िरी पैगंबर (seal of prophet ) हैं , इस लिए यह तयशुदा बात है कि पैगंबर मुहम्मद के बाद इस्लामी राज्य में क़ानूनसाजी (legislation ) का काम ख़त्म हो गया था और उनके उत्तराधिकारी ख़लीफ़ा रशीदुन (rightly guided caliphs ) के पास सिर्फ़ कार्यपालिका और न्यायपालिका के ही अधिकार थे।

 पहले चार रशीदुन ख़लीफ़ा अबू बक्र , उमर , उस्मान और अली के बाद उमैया वंश के ख़लीफ़ाओं को रशीदुन ख़लीफ़ाओं जैसी इज़्ज़त हासिल नहीं है और उनकी हुकूमत के दौर को  मुलूकियत  (kingdom) बता कर निंदनीय माना गया है। 

     उमैयों के बाद ख़िलाफ़त पैगंबर मुहम्मद के चाचा अब्दुल मुत्तलिब के पुत्र अल  अब्बास के वंशजों को प्राप्त हुई। पैगंबर के नज़दीकी रक्त संबंधी  होने के  कारण अब्बासी ख़लीफ़ाओं को इस्लामी दुनिया में विशेष आदर प्राप्त हुआ।

     ख़लीफ़ा रशीदुन की हुकूमत अरब कबीलाई और मक्का के ताजिरों की  समन्वित रवायतों पर आधारित थी जिसमें फ़ारसी साम्राज्य के पुराने , ज़्यादा सभ्य और सुव्यवस्थित रवायतों और तौर तरीक़ों को नज़रंदाज़ करने की प्रवृत्ति हावी थी, मगर अब्बासी हुकूमत का परिचय जब फ़ारस की राजनीति शास्त्र की किताब “ मिरर आफ प्रिंसेज “ जिसका उन्होंने अरबी अनुवाद करवाया था , से हुआ , तो उनके इस्लामी राज्य के उसूल और तौर तरीक़ों में काफ़ी बदलाव हुआ ।यह किताब इस बात पर ज़ोर देती थी कि चूँकि शासक अल्लाह द्वारा नियुक्त किए जाते हैं , इस लिए वे सिर्फ़ अल्लाह के प्रति जबाब देह हैं । इस किताब में यह सिद्धान्त निर्विवादित रूप से प्रतिपादित किया गया था कि किसी भी हालत में राजाज्ञा का उल्लंघन क्षम्य नहीं हो सकता।

      मिरर आफ प्रिंसेज के ये सिद्धान्त तत्कालीन सामन्तवादी  समाज की हुकूमत की स्थिरता के लिए ज़रूरी था किन्तु इनका टकराव शरीयत (क़ुरान और हदीसों पर आधारित इस्लामी क़ानून ) के साथ होना भी अवश्यंभावी था ।इस लिए उलेमा के लिए अक्सर  ख़लीफ़ा के विरुद्ध शरीयत के उलंघन का आरोप मढ़ कर उन्हें बल पूर्वक पद से हटा देना आसान हो गया था जिसके लिए उन्हें क़ुरान की हिदायत “किसी मनुष्य के  ऐसे हुक्म का पालन मत करो जो कि अल्लाह के खिलाफ हो :” से मदद मिलती थी । 

पैगंबर मुहम्मद ने अपने अनुयायियों को कभी मजहब और दुनिया को अलग अलग बरतने का उपदेश नहीं दिया था। इसके उलट ईसा मसीह ने अपने अनुयायियों को साफ़ साफ़ हिदायत दी थी कि वे सम्राट का हिस्सा सम्राट को और ईश्वर का हिस्सा ईश्वर को समर्पित करें (Render unto Caesar the things that are Caesar’s and to God the things that are God’s )।

      इस हिदायत का अर्थ स्पष्ट है कि ईसाइयत में  मजहब को  दुनिया से अलग समझा और माना गया जब कि इस्लाम में दुनिया और मज़हब अलग नहीं है। इसलाम और ईसाइयत के दरम्यान यह एक महत्वपूर्ण और बुनियादी फ़र्क़ है।

      इस्लाम सिर्फ़ मज़हब न हो कर दुनियाबी निजी जिंदगी ,सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था तय करने वाली  एक मुकम्मल संहिता भी है जिसे “दीन ए इस्लाम “ के नाम से जाना समझा जाता  है। ”दीन ए इस्लाम “ वह मुकम्मल व्यवस्था है जो अल्लाह की हिदायतों की किताब पवित्र क़ुरान और पैगंबर मुहम्मद की सुन्नत और हदीसों से अनुशासित होता है।

     इसीलिए मुस्लिम समाज शुरू से ही इस उलझन से बाबस्ता रहा है कि वह हुकूमत और सियासत को मजहब से कितना और कैसे अलग रखे।

     राजनीतिक मामलों को धार्मिक / आध्यात्मिक मामलों से पृथक न समझने  की इस बुनियादी अवधारणा की वजह से इस्लाम के अन्दर समय समय पर पैदा हुए विभिन्न धार्मिक आन्दोलनों का मुस्लिम समाज की राजनीति पर  गहरा असर पड़ता रहा है ।इसी कारण समय समय पर पैदा हुए विभिन्न इस्लामी धार्मिक आन्दोलनों  के प्रणेता स्वाभाविक रूप से अपनी विचार धारा के लिए राज्य के संरक्षण की अपेक्षा रखते थे तथा मुस्लिम हुक्मरान भी अपनी हुकूमत की वैधता और जन स्वीकार्यता के लिए इस्लाम के किसी न किसी आन्दोलन के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने के लिए विवश रहते थे।

 राज्य के समर्थन या विरोध के कारण अक्सर इस्लाम के अंदर वैचारिक आंदोलन खड़ा करने वाले उलेमा को अपने विरोधी उलेमा के हुकूमत पर असर के हिसाब से उत्पीडन और कभी कभी खूंरेजी का शिकार होना पड़ता था।

      जून -जुलाई 657 ई में हजरत अली और मुआविया की जंग के बाद इस्लाम में इल्म अल कलाम नाम का एक नया धार्मिक आन्दोलन शुरू हुआ जिसका  मक़सद इस्लाम की रूढ़ियों को तर्क संगत सिद्ध करना था  ।इस आन्दोलन के केन्द्र में यह विवाद था कि मनुष्य की   स्वतंत्र इच्छा (free will ) होती है या नहीं।

      उलेमा (Islamic scholars ) का एक वर्ग जिसे जबरिय्या कहते थे , यह मानता था कि मनुष्य अपने निर्णय और कर्म के लिए स्वतंत्र नहीं है अपितु उसके सभी कार्य ईश्वरीय इच्छा के अधीन हैं। इसके विपरीत एक दूसरा वर्ग जिसे कादरिया कहते थे , यह मानता था कि कुछ भी पूर्व निर्धारित नहीं होता और मनुष्य अपने निर्णय और कर्म के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है तथा अपने कार्यों के लिए वह खुद ज़िम्मेदार भी है।

      अब्बासी खलीफा अल मामून (813-33ई ) ने बग़दाद में बैतुल हिकमा (house of wisdom ) की स्थापना की जहां यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिकों की किताबों का अरबी भाषा में अनुवाद किया गया । यूनानी दर्शन का इस्लामी फ़िक्र पर गहरा असर पड़ा। अब्बासी खलीफाओं की मातहती में नवीं सदी के पहले आधे हिस्से में यूनानी दार्शनिकों से प्रभावित  युक्तिवाद (rationalism and logic ) पर बल देने वाला मोअतजली आन्दोलन पैदा हुआ जिसे अगर खुल कर आगे बढ़ने का मौक़ा मिला होता तो शायद आज इस्लामी दुनिया की तारीख़ अलग होती।

     मगर अब्बासी ख़लीफ़ा अल मुतवक्किल  (847-61) ) ने मोअतजली आन्दोलन को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया। उसके डर से बहुत से मोअतजली उलेमा इस आन्दोलन से पीछे हट गए और सुन्नी रूढ़िवाद के समर्थक बन गए।

      मुस्लिम समाज में मजहब और दुनिया को अलग अलग न बरत पाने की उक्त धर्मशास्त्रीय बाध्यता ,राजा के निरंकुश सर्वाधिकार तथा शरीयत के अन्तर्विरोध और युक्तिवाद आधारित इच्छा स्वातंत्र्य (free will ) तथा दैवीय नियतिवाद के दार्शनिक द्वन्द्व के कारण मुस्लिम समाज आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अपना समायोजन कर पाने में अत्यंत कठिनाई का अनुभव करता रहा है।

Ramswaroop Mantri

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