शशिकांत गुप्ते
चुनाव में टिकट वितरण हो गया। मतदान और परिणाम तारीख भी तय हो गई। अब इंतजार है। कौन बनाएगा सरकार?
(अमृत काल में बहुमत के बाद भी सरकार बनाना संभव नहीं है
अच्छे दिनों में यह नई फैशनबल राजनीति विकसित हुई है।)
बहरहाल पहले तो टिकिट मिलने वालों को अपने परिवार में रूठे हुएं अपनों को मानना पड़ेगा। कुछ बागी होंगे? कुछ बंद कमरे की बैठक में आपसी सूझबूझ की चर्चा में तय मान + से भी मान जाएंगे?
कुछ गया राम का रोल अदा करेंगे।
गया राम के साथ हम किसी से कम नही कहते हुए आया राम क्यों प्रतिस्पर्धा नहीं करेंगे?
काश ये बागी होने वाले अपने दल के गलत नीतियों के विरुद्ध में बागी होते?
अपनी सत्ता के कारण बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी,और किसानों की समस्याओं के लिए बागी होते? तो समझ में आता की राजनेताओं में लोकतंत्र के प्रति सजगता है?
विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में राजनीति करने वालों में लोकतंत्र के प्रति आस्था होती तो,गुट बनाकर अपनी ही सत्ता को धराशाही करने के लिए पर्यटक बनाकर विभिन्न पर्यटन स्थलों की सैर नहीं करते?
पर्यटक बनने वालों से ज्यादा आश्चर्य होता है?
जो,विलासिता पूर्ण पर्यटन की सुविधा मुहैया करवाते हैं?
आश्चर्य होने का कारण बार बार राष्ट्रवादी, संस्कृति,संस्कार,नैतिकता,और भ्रष्टाचार विहीन राजनीति का स्मरण होता है।
मै यह लेख लिख ही रहा था,उसी समय संयोग से मेरे मित्र सीतारामजी का मेरे घर आगमन हुआ।
सीतारामजी ने मेरे लिखा हुआ पढ़ कर मुझे सलाह दी,इतना घुमाफिरा कर लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है।
यह कहते हुए सीतारामजी ने मुझे सलाह दी,आप तो प्रसिद्ध शायर जावेद अख्तर की निम्न नज़्म लिख दो,इस नज़्म में जो भी आप कहना चाहते हो वह सभी बिंदु समाहित है।
जो बात कहते डरते हैं सब, तू वह बात लिख
इतनी अंधेरी थी न कभी पहले रात लिख
जिनसे क़सीदे लिखे थे, वह फेंक दे क़लम
फिर खून-ए-दिल से सच्चे क़लम की सिफ़ात लिख
जो रोज़नामों में कहीं पाती नहीं जगह
जो रोज़ हर जगह की है, वह वारदात लिख
जितने भी तंग दायरे हैं सारे तोड़ दे
अब आ खुली फ़िज़ाओं में अब कायनात लिख
जो वाक़ियात हो गए उनका तो ज़िक्र है
लेकिन जो होने चाहिए वह वाक़ियात लिख
इस बाग़ में जो देखनी है तुझ को फिर बहार
तू डाल-डाल से सदा, तू पात-पात लिख
सीतारामजी द्वारा पूरी नज़्म सुनने के बाद मै ने सोचा अब कुछ लिखने की जरूरत ही नहीं है।
यहीं पूर्ण विराम है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





