~ पुष्पा गुप्ता
प्रकृति पूजा के बाद संसार में सबसे पहली पूजा-उपासना मानी जाती है ! दूसरे देशों में भी , दूसरी संस्कृतियों में भी ,मानवशास्त्रियों ने संसार की प्राचीन-संस्कृतियों में मातृपूजा की परंपरा का अध्ययन किया है। ईश्वर की उपासना के प्राचीनतम रूपों में से एक।
पश्चिम-एशिया,मध्यएशिया,इटली आदि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में मातृदेवी की आकृतियां प्राप्त हुई हैं। फ्रांस की मातृदेवी वीनस है। मिस्र में नूह ,आइसिस,ईरान की आनाइसिस, ईसाकी परंपरा में मरियम, चीन की मातृशक्ति >कुन। बहुत विस्तार है.
भारत के लोकजीवन में देवीपूजा के इतिहास पर आचार्य कुबेरनाथ राय ने लोकतत्त्विक समीक्षा-पद्धति से देवी-पूजा को केन्द्र में रख कर तीन महत्त्वपूर्ण शोध निबन्ध लिखे थे , जो श्री गुलजारीलाल नन्दा के मानव धर्म मिशन के पत्र ‘नवजीवन पथ’ में प्रकाशित हुए थे।
कुबेर नाथ राय ने देवीपूजा के विकास को पाँच सोपानों में देखा है :
१ – गणों और कबीलों की स्थानीय मातृकायें।
२ – एक आदिम मातृका
३- मातृका का दार्शनिक -रूपान्तर
४ त्रिपुरसुन्दरी
५- आधुनिक मनोविज्ञान द्वारा उद्घाटित मातृका के मूलगत संस्कार – बिंब ,जो लोकचित्त का नियमन कर रहे हैं.
उन्होंने विंध्याचल के परिवेश का अध्ययन किया और बतलाया है कि, “पर्वत पर स्थित अष्टभुजा का मन्दिर आभीरकुल की देवी है। [ यशोदागर्भ-संभवा के रूप में सप्तशती में इसका उल्लेख है ]
कालीखोह का मन्दिर निषाद-कुल का है ,जहां आज भी पुरोहित निषाद ही है , ब्राह्मण नहीं।
वे कहते हैं कि विन्ध्यारण्य किसी जमाने में महिषारण्य था । आदिम निषादों ने ही जंगली महिेष को पालतू बनाया और उसका दूध दुहा था । उनका कथन है कि आदिम-निषाद ने कहीं महिष को मित्रभाव से देखा है तो कहीं शत्रुभाव में उसे असुर-रूप में ।
चंडी मूलत: शिकार की देवी है । उनकी मान्यता है कि महिषासुर-मर्दिनी की परिकल्पना इसी आदिम-निषाद की देन है। उन्होंने महाराष्ट्र के कुछ गड़रिये-कबीलों में देवीपूजा का उदाहरण दिया है , जिसमें मातृकाएं महिष की पत्नियां हैं। जैसे जोगुबाई का पति है > म्हतो बा। यह महिष-देवता है।
भारत मे देवीपूजा का बहुत प्राचीन इतिहास है ! लोकपरंपरा में भी और वेद-परंपरा में भी । अनेक अध्येताओं ने देवीपूजा के इतिहास में समाज के विकास के सोपानों की पहचान की है। श्री देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने अंग्रेजी में एक पुस्तक लिखी थी, लोकायत! उसमें एक निबंध का शीर्षक है, गौरी। उन्होंने लोकपरंपरा में देवीपूजा का क्रमविकास सभ्यता के तीन चरणों प्रस्तुत किया है :
1-मृगया -जीवी ,
2-गोचारण ,और
3-कृषिजीवी।
उनका मत है कि,
1-चंडी की परिकल्पना मृगया -जीवी संस्कृति की परिकल्पना है ।
2- महिषासुरमर्दिनी की परिकल्पना गोपसंस्कृति की परिकल्पना है ।
3-महीमाता और अन्नपूर्णा कृषि से संबंधित है।
देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की मान्यता है कि कबीला-मनोभूमि में नारी-सत्ता या मातृसत्ता का प्राधान्य होता है। वे कहते हैं कि गौरी कृषि की देवी हैं। शस्यपार्वती। वे मानते हैं कि नारी-देवता या देवियां अपने मूल-रूप में कबीलों की देन हैं। उन्होंने बीली ,मग्गा, डोम. गदवा, ओक्काल, गोल्ला , हाड़ी, हल्लीकर, हेलवा, इडिगा आदि देवियों के नाम भी उद्धृत किये हैं।
लोकदेवता के क्रम विकास के स्तर
एक स्तर वह है कि जब लोकदेवता गोत्र और परिवार तक ही सीमित है तो, दूसरे स्तर पर वह कबीले का देवता है ! एक जाति-विशेष तक सीमित है. दूसरी स्थिति में वह अन्य कबीले ,दूसरी जाति में भी मान्य हो जाता है. ग्राम स्तर पर जनपद स्तर पर मान्य हो जाता है ! तीसरी स्थिति में वह अन्तर्जनपदीय और अन्तर-प्रदेशीय स्तर पर पँहुच जाता है.
उसके बाद चौथे स्तर पर वह देवता पूरे राष्ट्र में मान्य हो जाता है ! विष्णु राम , कृष्ण , शिव शक्ति , गणेश ,हनुमान इसी स्थिति पर हैं , जबकि शास्त्र की व्याख्या होने लगती है.
यह ध्यान रखने वाली बात है कि ये देवता शास्त्र से नहीं , लोक से आये हैं. भारत के लोकजीवन में इनकी मान्यता इतनी गहराई में है कि, कोई भी ऐसा प्रदेश नहीं , जहाँ के लोकजीवन में , लोकगीतों और गाथाओं में उनका अहर्निश गान न होता हो. शास्त्र और लोक की यह निरन्तर प्रक्रिया है.





