पुष्पा गुप्ता
उसके मरने के बाद की सारी औपचारिकताओं में
शामिल होने वालों की संख्या अच्छी-ख़ासी थीI
शोकसभा में उसे कतई पसन्द नहीं करने वालों ने
उसकी ऐसी-ऐसी अच्छाइयाँ गिनाईं
जो शायद कम ही थीं उसमें
और वह ख़ुद भी सुनती अपनी इन अच्छाइयों के बारे में
तो आश्चर्य से ठगी रह जातीI
उस शोकसभा में सभी वक्ताओं ने कहा कि
वे उसे कितना ‘मिस’ करेंगे!
जो उसे बदमिज़ाज मानते थे
उन्होंने उसकी सहृदयता के संस्मरण सुनायेI
उसे मूर्ख मानने वालों ने उसे बुद्धिमान बताया
और जिन लोगों के लिए वह उतनी ही
उपयोगी थी जितनी रोज़मर्रा के जीवन में
बरती जाने वाली कोई चीज़
या ज़रूरत पड़ने पर निकाले जाने वाला
घर के कबाड़ या भण्डार घर का कोई पुराना औज़ार,
उन्होंने रुँधे गले से बताया कि वह उनके हृदय के
कितने निकट थी!
जिन्होंने उससे कुछ नहीं सीखा,
या जिन्हें सिखा पाने की उसकी औक़ात ही नहीं थी,
या जो उसे बहुत कम जानते थे,
उन्होंने भी विस्तार से बताया कि उन्होंने
उससे कितना कुछ सीखा
और यह कि वे उसे कभी नहीं भूल सकेंगेI
इसतरह शोकसभा सम्पन्न हुई बेहद सादगी के साथI
सिर्फ़ एक पोर्ट्रेट , कुछ फूल, कुछ मालाओं
और चाय-समोसे का ही ख़र्च लगा,
सभाकक्ष मुफ़्त मिल गया थाI
फिर तीन दिनों तक फेसबुक पर आभासी मित्रगण बताते रहे
कि उससे उन्होंने कितनी प्रेरणा ली और कितने विचार
और शोक और प्यार के इमोजी बनाते रहेI
महीनों बाद खिचड़ी दाढ़ी वाला एक अधबूढ़ा आदमी
उस बस्ती में आया जहाँ वह रहती थीI
वह उसके बंद कमरे पर पहुँचा
जिसका ताला भी अब जंग खा चुका थाI
ताला तोड़कर जाले और धूल और
काग़ज़-किताबों और तमाम बेतरतीबी के बीच
जगह बनाकर
पुरानी बेंत की कुर्सी पर देर तक बैठा रहा
वह आदमी जिसे वहाँ पहले कभी देखा नहीं था किसी नेI
पड़ोसियों को बताया कि वह मृतका का
बचपन का मित्र है जिसे उसके निधन की ख़बर
अब जाकर मिल पायीI
बगल की एक सहृदय पड़ोसन उसे
चाय-नाश्ता भी दे गयीI
देरतक वह आदमी काग़ज़-किताबों को
उलटता-पलटता रहा और धूल झाड़कर
उन्हें पढ़ने की कोशिश करता रहाI
फिर उसे कपड़ों की आलमारी से
चमड़े की जिल्द वाली एक मोटी डायरी मिली
जिसे वह देर तक उलटता-पलटता रहाI
पूरी डायरी का हर इंदराज अधूरा था,
कुछ लोगों और घटनाओं के अमूर्त इम्प्रेशन,
कुछ अधूरी कविताएँ
कुछ दूसरों की कविता-पंक्तियाँ,
यहाँ तक कि कुछ अधूरे वाक्य भीI
कुछ अधूरे रेखांकन किन्हीं व्यक्तियों और
किन्हीं दृश्यों के
और बहुत सारे पन्नों पर
बहुत सारी आड़ी-तिरछी रेखाएँI
उस आदमी ने डायरी के एक-एक पन्ने की
अपने मोबाइल में तस्वीर ले लीI
अपने शेष जीवन वह पूर्ववत् यात्रारत रहा
और अक्सर अपने मोबाइल पर
डायरी के उन पन्नों को पढ़ता हुआ
उन तमाम बेहद सहृदय, बेहद संवेदनशील
लोगों के जीवन के बारे में सोचता रहा
जो अधूरी ज़िन्दगी जीने,
अधूरा प्यार करने, अधूरी यात्रा करने
और हर काम को अधूरा छोड़ देने के आदी रहे
या शायद अभिशप्त रहे इसके लिएI
हालाँकि वह डायरी अधूरेपन के एक जीवन का
यथार्थवादी महाख्यान थी
लेकिन जिन बातों को उसमें कहा नहीं गया था
उनमें कल्पना, फंतासी, जादू से भरी,
या निहायत सीधे-सादे ढंग से बयान की जाने लायक
कई कथाएँ-उपकथाएँ छिपी हुई थींI
सोचा जाये तो
अधूरे ढंग से जी गयी ज़िन्दगियाँ भी
किसी न किसी रूप में
काम आ ही जाती हैंI
वैसे यह भी सोचने की बात है कि
हर ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अधूरापन तो होता ही है
जहाँ से कुछ और नया करने की राहें
फूटती हैं
बाद के लोगों के लिए,
हालाँकि सही बात तो यही है कि
हर शुरू किये गये काम को
उसके अंजाम तक पहुँचाने की
हर मुमकिन कोशिश ज़रूर की जानी चाहिएI





