8 मार्च : विश्व महिला दिवस पर विशेष
कुमार सिद्धार्थ
सुबह की पहली किरण जब धरती को सहलाती है, तो वह केवल उजाला ही नहीं लाती वह उन अनगिनत स्त्रियों की मौन आस्था भी साथ लाती है, जो अपने श्रम, संवेदना और धैर्य से प्रकृति को फिर से जीवन दे रही हैं। देश के परिदृश्य में देखें तो पाएंगे कि वे बुंदेलखंड की प्यास से फटी धरती पर सूखे तालाबों में पानी की स्मृतियाँ लौटा रही हैं; तो झारखंड और छत्तीसगढ़ के जंगलों में वे बीजों को ऐसे सहेजती हैं जैसे माँ अपने शिशु को; और उत्तराखंड की पहाड़ियों पर वे पेड़ों की रखवाली करती हुई मानो भविष्य की पहरेदार बन जाती हैं। ये स्त्रियाँ पर्यावरण को नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता को बचा रही हैं।
इसी व्यापक सोच और जीवनानुभव से जन्मी इस चेतना को दुनिया “इकोफेमिनिज़्म” कहती है यानी पर्यावरण नारीवाद, एक ऐसा नजरिया जो प्रकृति और स्त्री की मुक्ति को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानता है। यह विचार बताता है कि जैसे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन होता है, वैसे ही समाज में महिलाओं के श्रम और अधिकारों का भी शोषण होता है। जब जलस्रोत सूखते हैं, जंगल कटते हैं या भूमि बंजर होती है, तो सबसे पहले इसका असर महिलाओं पर पड़ता है उन्हें पानी के लिए दूर तक चलना पड़ता है, ईंधन और चारे के लिए अधिक श्रम करना पड़ता है। यही अनुभव उन्हें पर्यावरण संरक्षण का स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता बना देता है, क्योंकि उनके लिए प्रकृति कोई संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार, सहचर और भविष्य की आशा है।
यह विचार किसी सिद्धांत की उपज नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संचित जीवनानुभव की देन है। भारतीय ग्रामीण और आदिवासी समाज में यह भावना सदियों से रची-बसी है, जहाँ धरती को माँ और प्रकृति को पालनहार माना जाता है। यही कारण है कि जब महिलाएँ पर्यावरण संरक्षण की पहल करती हैं, तो वह केवल हरित अभियान नहीं रहता वह सामाजिक परिवर्तन की एक शांत किंतु सशक्त प्रक्रिया बन जाता है। जो महिलाएँ कभी निर्णयों की चौखट से दूर रखी जाती थीं, वही आज ग्रामसभाओं में योजनाएँ बना रही हैं, सामुदायिक बैठकों में दिशा तय कर रही हैं और अपने गाँव के भविष्य की रूपरेखा स्वयं लिख रही हैं।
ग्रामीण जीवन में महिलाएँ पानी लाने, चारा जुटाने, लकड़ी इकट्ठा करने और खेती करने जैसे कार्यों के कारण प्रकृति से प्रत्यक्ष जुड़ी रहती हैं। पर्यावरण चिंतक डॉ. वंदना शिवा ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि आधुनिक विकास मॉडल ने प्रकृति और स्त्री दोनों को “संसाधन” मानकर उनका उपयोग किया, जबकि पारंपरिक समाज उन्हें जीवन के आधार के रूप में देखता था। इसी सोच को सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने नर्मदा घाटी आंदोलन में जीवंत रूप दिया, जहाँ नदी, विस्थापन और महिलाओं के अधिकार जैसे तीनों प्रश्न एक साथ उठाए। वहीं इंदौर की पद्मश्री जनक मिलिगियन पलटा ने सौर उर्जा के माध्यम से सैकडों आदिवासी युवतियों के जीवन को रोशन करने का प्रयास किया है। पर्यावरण विद सुनीता नारायण ने दुनिया में कार्बन उर्त्सजन में कमी लाने के लिए सरकारों के साथ मिलकर नीतिगत मसलों पर काम किया है।
महिला नेतृत्वकर्ताओं ने देश के अनेक राज्यों में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जैविक खेती, रसोई बाग़, वर्मी कम्पोस्ट और वनौषधि उत्पादन जैसी पहलें शुरू की हैं। इन पहलों से न केवल महिलाओं की आय बढ़ी है, बल्कि रासायनिक खेती पर निर्भरता भी घटी है। मध्य भारत के कई क्षेत्रों में सामुदायिक खेती की परंपरा फिर से जीवित हो रही है, जहाँ पारंपरिक बीजों और प्राकृतिक तरीकों से खेती की जाती है। इसका परिणाम केवल उपज नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत, परिवारों का पोषण और महिलाओं का आत्मविश्वास है याने एक साथ तीनों का विकास।
इतिहास भी इस चेतना का साक्षी है। राजस्थान की मरुभूमि में सदियों पहले एक ऐसी घटना घटित हुई जिसने प्रकृति-प्रेम को आस्था का स्वर दे दिया। 1730 में जोधपुर रियासत के खेजड़ली गाँव में अमृता देवी विश्नोई ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। जब शाही सैनिक खेजड़ी वृक्ष काटने पहुँचे, तो उन्होंने पेड़ से लिपटते हुए कहा “सिर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण” याने यदि पेड़ बचाने में सिर भी कट जाए तो यह सौदा सस्ता है। उनके साथ 363 विश्नोई स्त्री-पुरुषों ने बलिदान दिया। विश्नोई समाज की जीवन पद्धति प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की मिसाल है; वे पेड़ों को परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं, वन्यजीवों को अपना साथी समझते हैं और पर्यावरण संरक्षण को धर्म मानते हैं। यह घटना केवल इतिहास नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है जिसमें स्त्री, प्रकृति और जीवन एक ही सूत्र में जुड़े हैं। अमृता देवी का बलिदान मानो समय की रेत पर लिखा वह संदेश है जो आज भी हर हरित पहल को प्रेरित करता है कि धरती की रक्षा केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जीवन का सबसे पवित्र संकल्प है।
1970 के दशक में उत्तराखंड की ग्रामीण महिला गौरा देवी और उनकी साथिनों ने पेड़ों से लिपटकर जंगल कटाई रोक दी। यही घटना आगे चलकर “चिपको आंदोलन” के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध हुई और इसने सिद्ध कर दिया कि पर्यावरण संरक्षण स्त्री जीवन से कितना गहरे जुड़ा है।
जमीनी स्तर पर सक्रिय महिला संगठन
भारत में कई महिला-केंद्रित संगठन पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण को साथ जोड़कर काम कर रहे हैं। ग्रामीण भारत में पीढ़ियों से महिलाएँ मौसम, मिट्टी और औषधीय पौधों का पारंपरिक ज्ञान संजोती आई हैं। अब कई संस्थाएँ इस ज्ञान को दस्तावेज़ित कर रही हैं और युवा पीढ़ी तक पहुँचा रही हैं। गाँवों में पर्यावरण पाठशालाएँ, महिला प्रशिक्षण शिविर और सामुदायिक संवाद इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं।सेवा (SEWA) वर्षों से हजारों महिलाओं को हरित आजीविका जैविक खेती, हस्तशिल्प और टिकाऊ उत्पादन से जोड़कर उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बना रहा है। मध्य भारत में सक्रिय दीक्षा महिला समूह सामुदायिक खेती और बीज संरक्षण के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहा है। झारखंड-छत्तीसगढ़ क्षेत्र में वनाधिकार महिला मंच आदिवासी महिलाओं को वनाधिकार, जल प्रबंधन और बीज बचाओ अभियानों से जोड़कर उनके नेतृत्व को सशक्त कर रहा है, जबकि राजस्थान में स्थानीय नेटवर्क के रूप में कार्यरत ग्रीन बेल्ट महिला समूह पौधरोपण, जल संरक्षण और चारागाह पुनर्जीवन जैसे कार्यों से रेगिस्तानी इलाकों में हरियाली की नई कहानियाँ लिख रहा है। ये पहलें प्रमाण हैं कि जब महिलाएँ संगठित होती हैं, तो पर्यावरणीय और सामाजिक परिवर्तन की गति कई गुना बढ़ जाती है।
झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के अनेक गाँवों में महिलाएँ सामुदायिक बीज बैंक चला रही हैं। उनके लिए बीज केवल खेती का साधन नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। ओडिशा के कोरापुट क्षेत्र की किसान लक्ष्मी हिड़का और उनका समूह चालीस से अधिक पारंपरिक धान किस्मों को संरक्षित कर रहा है। उनका विश्वास सरल लेकिन गहरा है “जब बीज हमारे पास होता है, तो खेती भी हमारे हाथ में होती है।”
इसी तरह बुंदेलखंड और मराठवाड़ा जैसे सूखा-प्रभावित क्षेत्रों में महिलाएँ जल संरक्षण अभियानों की अगुवाई कर रही हैं। वे पुराने तालाबों की सफाई, वर्षा जल संचयन और मिट्टी संरक्षण के कार्य कर रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर जिले में कमला देवी चौधरी के नेतृत्व में तीस महिलाओं ने तीन वर्षों में पाँच सौ से अधिक पौधे लगाए और जल संरचनाएँ बनाईं। परिणाम यह हुआ कि गाँव का तापमान घटा, नमी बढ़ी और पानी टिकने लगा मानो धरती ने राहत की साँस ली हो।
स्वावलंबन से सामाजिक बदलाव
ज्ञान की परंपरा भी इन स्त्रियों के हाथों सुरक्षित है। ग्रामीण समाज में महिलाएँ औषधीय पौधों, मौसम और मिट्टी के स्वभाव का गहरा ज्ञान रखती हैं। तेलंगाना की डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी और नवदान्य जैसे नेटवर्क इस पारंपरिक ज्ञान को दस्तावेज़ित कर नई पीढ़ी तक पहुँचा रहे हैं। इन पहलों में महिलाएँ स्वयं प्रशिक्षक बनकर खेती, पोषण, बीज संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा सिखाती हैं ज्ञान का यह साझा होना ही असली सशक्तिकरण है।
आर्थिक आत्मनिर्भरता इस बदलाव की धुरी है। जैविक खेती, मधुमक्खी पालन, वर्मी कम्पोस्ट और वनौषधि उत्पादन जैसी गतिविधियों से महिलाएँ स्थानीय बाज़ारों में सीधे अपने उत्पाद बेच रही हैं। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के कई क्षेत्रों में यह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है जहाँ आय के साथ-साथ निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ी है और महिलाओं की सामाजिक प्रतिष्ठा मजबूत हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि टिकाऊ विकास की नीतियाँ तभी सफल होंगी जब उनमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी हो। पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति इस दिशा में सकारात्मक संकेत है। देश में कुछ महिला संगठन लंबे समय से हरित विकास के लिए अपना योगदान दे रहे है।
हालाँकि चुनौतियाँ अब भी कम नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन, खनन परियोजनाएँ, भूमि अधिग्रहण और सामाजिक रूढ़ियाँ कई बार इन प्रयासों की राह में बाधा बनती हैं। पर्यावरणीय निर्णयों में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है, संसाधनों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। फिर भी छोटे-छोटे स्थानीय प्रयास यह विश्वास दिलाते हैं कि परिवर्तन नीचे से शुरू होकर ऊपर तक पहुँच सकता है।
भविष्य की राह: सहअस्तित्व का दर्शन
पर्यावरण नारीवाद का मूल संदेश यही है कि पर्यावरण संरक्षण कोई तकनीकी योजना भर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न है। जब महिलाएँ प्रकृति की रक्षा करती हैं, तो वे दरअसल अपने जीवन, अपने अधिकार और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा कर रही होती हैं। भारतीय परंपरा में धरती को “माँ” कहा गया है और शायद यही भाव इस पूरे आंदोलन की आत्मा है। धरती और स्त्री दोनों सृजन का स्रोत हैं; यदि दोनों को सम्मान और सुरक्षा मिले, तो विकास भी संतुलित, टिकाऊ और मानवीय होगा।
भारत के गाँवों में उभरती ये छोटी-छोटी हरित कहानियाँ आने वाले समय में एक विराट वन का रूप ले सकती हैं ऐसा वन जहाँ विकास, समानता और प्रकृति साथ-साथ फलें-फूलें। यही इस युग की सबसे सुंदर संभावना है साझेदारी का भविष्य, बगैर शोषण का।
कुमार सिद्धार्थ, पिछले चार दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय है। आप पर्यावरण, शिक्षा, सामाजिक आयामों पर देशभर के विभिन्न अखबारों/पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं।






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