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दिल्ली में आप की हार मौकापरस्त एवं मूल्यविहीन राजनीति की भी हार है….

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विश्वजीत सिंह 

चाणक्य से यदि पूछा जाता कि:

राहुल और कांग्रेस को दिल्ली चुनाव में क्या रोल निभाना चाहिए…? तो निसंदेह जवाब वही होता जो कांग्रेस ने दिल्ली चुनाव में किया है….

यदि आपको आम आदमी पार्टी की हार से एवं केजरीवाल और उनकी ब्रांड राजनीति से सहानुभूति है तो आप राजनीति और लोकतंत्र को नहीं समझते….

कांग्रेस के कारण आम आदमी पार्टी 14 सीटें हार गई है, जिसमें केजरीवाल एवं मनीष सिसोदिया भी शामिल हैं पर मत भूलिये कांग्रेस से समझौता नही करने की घोषणा सबसे पहले आप नेता गोपाल राय ने की थी, कांग्रेस ने नही,

और तो और यही केजरीवाल कांग्रेस को इंडिया गठबन्धन से निकलवाने की बात करते थे…

आखिर गोवा, गुजरात, हरियाणा में इनका कांग्रेस के प्रति क्या रोल रहा है? कांग्रेस को जिताने वाला या हराने वाला? 

 भ्रष्टाचार , साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद से खिन्न हो चुकी देश की जनता अन्ना आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी को एक वैकल्पिक राजनीति के तौर पर देख रही थी , केजरीवाल को सूचना के अधिकार दिलाने वाला ,भ्रष्टचार विरोधी नायक के तौर पर देख रही थी….

फलस्वरूप देश के बुद्धिजीवी, कानूनविद, पत्रकार, प्रोफेसर,सामाजिक एक्टिविस्ट वर्ग इस आंदोलन एवं पार्टी से जुड़े, पर कुछ समय के बाद त्याग, तपस्या, ईमानदारी का चोला ओढ़े हुए अरविन्द केजरीवाल का असली रूप सामने आने लगा… इसने एक एक करके लोगों को दूर करते गया और कुछ लोग स्वयं दूर होते चले गए..

रिसर्च में लीडरशिप का सबसे प्रमुख गुण चरित्र को बताया गया है, क्या केजरीवाल में आपको यह गुण कभी दिखा…? 

ऐसा व्यक्ति जो गाड़ी, बंगला, सुरक्षा नहीं लेने की बात की थी, वह शीशमहल में भारी सुरक्षा के बीच रहता था, जो कभी जनता से पारदर्शिता, लोकतंत्र की बात करता था वह अपनी पार्टी का स्वयंभू तानाशाह है, उसकी आवाज ही संविधान है… 

अत: एक लोकतांत्रिक समाज, मुल्क के लिए भी ऐसे नेता घातक हैं…

कौन नही जानता कि राम कृष्ण मिशन से कभी जुड़ा हुआ यह शख्स कभी हनुमान तो कभी गणेश , लक्ष्मी की बात कर खुद को बीजेपी से बड़ा हिंदूवादी दिखाने की कोशिश करता है…

कौन नहीं जानता कि इस शख्स द्वारा आर्गनाइज किया हुआ अन्ना हजारे का आंदोलन RSS प्रेरित था? 

 सच यही है कि केजरीवाल का ना कोई चरित्र है और ना ही उनकी आम आदमी पार्टी का कोई विचारधारा “

ऐसे में ऐसी पार्टियों का भविष्य स्थाई नहीं होता, इनका अस्तित्व खत्म होना अवश्यंभावी है…

भाजपा जैसी साम्प्रदायिक ,फासीवादी पार्टी के जीत से मुझे दुख है पर उसकी ही क्लोन के हार से खुशी भी है… दरअसल यह भारतीय राजनीति में मौकापरस्त एवं मूल्यविहीन राजनीति की भी हार है….

Ramswaroop Mantri

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