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प्रोफेसर पद छोड़कर आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे आचार्य जेबी कृपलानी

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44 वीं पुण्यतिथि पर आगामी 19 मार्च को रीवा में होगी विचार संगोष्ठी

रीवा । आजादी के आंदोलन के स्तंभ, नागरिक आजादी के कर्णधार और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के निकटतम सहयोगी आचार्य जेबी कृपलानी (जीवतराम भगवान दास कृपलानी) की 44 वीं पुण्यतिथि मनाने के लिए स्थानीय सिंधु भवन में वरिष्ठ समाजसेवी सरदार प्रहलाद सिंह की अध्यक्षता में एक तैयारी बैठक रखी गई। बैठक में लोकतंत्र सेनानी अजय खरे एवं समाजसेवी शंकर साहनी ने कार्यक्रम की रूपरेखा के संबंध में महत्वपूर्ण सुझाव रखे। यह तय किया गया कि आगामी 19 मार्च 2026 को आचार्य कृपलानी की पावन स्मृति में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक विचार संगोष्ठी रखी जाएगी। आचार्य कृपलानी का जन्म अविभाजित भारत के सिंध प्रांत के हैदराबाद में 11 नवंबर सन् 1888 को हुआ था।

महात्मा गांधी से उनकी पहली मुलाकात सन 1915 में शांतिनिकेतन में हुई । इसके बाद सन् 1917 के ऐतिहासिक चंपारण सत्याग्रह में उन्होंने महात्मा गांधी के प्रमुख सहयोगी की भूमिका निभाई। उस समय वह मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में प्रोफेसर थे। गांधीजी को सबसे पहले सहयोग देने वाले, उनका स्वागत करने वाले लोगों में थे। गांधी जी के आंदोलन में सक्रिय सहयोग के लिए आचार्य कृपलानी ने मुजफ्फरपुर के एल एस कॉलेज के इतिहास के प्रोफेसर पद से इस्तीफा दे दिया और फिर आजादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

आचार्य कृपलानी भारत की संविधान सभा में एक प्रमुख सदस्य थे। वे संयुक्त प्रांत से संविधान सभा के लिए चुने गए थे। वे मौलिक अधिकारों पर बनी उप-समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने संविधान में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को सुनिश्चित करने वाला मसौदा तैयार करने में अहम योगदान दिया। देश को जब आजादी मिल रही थी उस समय वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे। भारत विभाजन की अप्रिय स्थिति से उन्हें बहुत कष्ट था। आजाद भारत में उन्होंने मुखर विपक्षी नेता के रूप में अहम भूमिका निभाई। 19 मार्च 1982 को अहमदाबाद में 93 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

Ramswaroop Mantri

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