सलीम अंसारी
सबक है मेरा जिस्म मेरी मर्ज़ी वालों के लिये।
मर्ज़ी भी उसी की थी और जिस्म भी उसी का था मगर
सन्नाटे से गूंजता कमरा, बंद दरवाज़े के पीछे महीनों से ख़ामोश पड़ी लाश, और आस-पास न कोई आँख अश्कबार, न कोई मातम, न कोई दुआ। बस दीवारें थीं, जो चीख़-चीख़ कर उस औरत की तन्हाई की गवाह थीं, जो कभी अपनी ख़ुदमुख्तारी पर नाज़ाँ थी, जिसने रिश्तों के रेशमी बंधनों को आज़ादी की ज़ंजीर समझ कर तोड़ दिया, जो फ़ेमिनिज़्म के अफ़ीम से मदहोश हो कर अपने ख़ानदान, भाई, बाप, और सबसे बढ़ कर अपने रब से भी रूठ गई थी।
“अदाकारा हुमैरा असग़र” एक ख़ूबसूरत चेहरा, एक आज़ाद औरत, एक मशहूर नाम — लेकिन क्या वाक़ई वो कामयाब थी?
पुलिस अहलकार जब उसके भाई को फ़ोन करता है तो जवाब मिलता है:
“उसके वालिद से बात करें”
और जब वालिद को फ़ोन किया जाता है तो एक बाप की ज़ुबान से निकलता है:
“हमारा उससे कोई ताल्लुक़ नहीं, हम बहुत पहले उससे नाता तोड़ चुके, लाश है तो जैसे चाहो दफ़नाओ”
फ़ोन बंद हो जाता है, मगर सवाल खुला रह जाता है कि वो कौन सी ज़िन्दगी थी जो बाप के दिल को इतना सख़्त कर गई?
वो कौन सा रास्ता था जो भाई की ग़ैरत को ख़ामोश करा गया?
वो कौन सी सोच थी जिसने एक जीते-जागते वजूद को महीनों लाश बना कर सड़ने के लिये छोड़ दिया?
ये महज़ एक वाक़िआ नहीं, ये फ़ेमिनिज़्म की वो भयानक तस्वीर है, जो इश्तेहारों में ख़ूबसूरत, तक़रीरों में मुतास्सिरकुन, और सोशल मीडिया पर इनक़लाबी लगती है, मगर अंदर से खोखली, तन्हा और अंधेरे से लबरेज़ होती है।
फ़ेमिनिज़्म का आग़ाज़ औरत के हक़ूक़ से हुआ, मगर अंजाम उसकी तन्हाई पर हो रहा है।
फ़ेमिनिज़्म ने औरत को माँ, बेटी, बहन और बीवी के मुक़द्दस रिश्तों से निकाल कर सिर्फ़ “ख़ुद” बना दिया और यही “ख़ुद” आख़िरकार उसे अकेला कर गया।
ख़ानदान का इदारा, जिसे सदियों की तहज़ीब ने परवान चढ़ाया, जिसमें क़ुर्बानियाँ, मोहब्बतें, नाराज़गियाँ, मान और रिश्तेदारी की हरारत मौजूद थी, उसे आज की औरत ने “ज़ंजीर” समझ कर काट दिया।
और जब वक़्त की तेज़ धूप ने जलाया, तो कोई सायादार दरख़्त साथ न था।
फ़ेसबुक की दोस्तें, इंस्टाग्राम के फ़ॉलोअरज़, ट्विटर की आज़ादी के नारे — सब ख़ामोश थे।
बाप का दरवाज़ा बंद था, भाई का दिल पत्थर हो चुका था, और माँ शायद बरसों पहले रो-रो कर मर चुकी थी।
अजीब मुआशरा है ये भी —
जहाँ अगर बेटी नाफ़रमान हो तो बाप ज़ालिम कहलाता है,
और अगर बाप लाताल्लुक़ हो जाये तो बेटी की ख़ुदमुख्तारी का जश्न मनाया जाता है।
औरत जब घर से निकले, तो “ताक़तवर” कहलाती है,
जब तलाक़ ले, तो “बा-हिम्मत” बन जाती है,
जब रिश्ते तोड़े, तो “बग़ावत” नहीं बल्कि “ख़ुद-शऊरी” क़रार पाती है।
और जब मर जाये — तन्हा, बोसीदा लाश की सूरत —
तो सारा मुआशरा ख़ामोश तमाशाई बन जाता है।
काश हुमैरा असग़र ने जाना होता कि फ़ेमिनिज़्म माँ की गोद जैसा तहफ़्फ़ुज़ नहीं दे सकता।
काश वो समझ पाती कि बाप की डाँट, मोहब्बत की एक गूंज होती है, और भाई की ग़ैरत, इज़्ज़त की चादर होती है।
काश वो जान पाती कि मर्द दुश्मनी का नाम औरत दोस्ती नहीं, बल्कि ये फ़िक्री गुमराही है जो औरत को उसके रब, उसके दीन, और उसकी फ़ित्रत से काट देती है।
औरत मज़बूत ज़रूर हो, ख़ुदमुख्तार भी हो, लेकिन वो अपने अस्ल से जुड़ी रहे,
वो माँ का प्यार, बाप की शफ़क़त, भाई की ग़ैरत, और शौहर की रिफ़ाक़त को बोझ न समझे।
वर्ना फ़ेमिनिज़्म की राह में जो मंज़िल है, वो तन्हाई, बेरुख़ी, और बे-गोर-ओ-कफ़न लाश है।
हुमैरा असग़र चली गई,
लेकिन फ़ेमिनिज़्म की धुँध में गुम और कितनी बेटियाँ ऐसी ही गुम हो रही हैं,
बस हमें तब होश आता है,
जब ताफ़ुनज़दा लाश दीवारों से सवाल करने लगती है…
“आज़ादी चाहिए थी ना? ले लो… मगर अब मेरे पास कोई नहीं!” 💔💔💔





