
संजय कनौजिया की कलम”✍️
दलित चिंतक एवं लेखक, डॉ० सुरेंद्र अज्ञात ने अपनी लिखी किताब “बुद्ध धम्म-कुछ प्रश्न कुछ उत्तर” में जो दर्शाया है उसके मुख्य अंश प्रेषित हैं..बुद्ध स्वयं चलकर लोगों के घर जाकर मिलते-जुलते, भोजन करते, भिक्षा लेकर तथा अपने वचनों से ज्ञान देते थे..जैसे-जैसे समय बीता की उन्हें “दिव्य” बनाया गया, चमत्कार, पावर यह सब जुड़ते चले गए..”त्रिपिटक” में बहुत से अनेको किवदंतियां गढ़ी गईं..अज्ञात ने लिखा है जब “बुद्ध” का ब्रह्माणीकरण हो सकता है तो “त्रिपिटक” का क्यों नहीं ?..बुद्ध को शिव-विष्णु का अवतार बता दिया गया..नौंवी-दशवीं सदी में ऐसा हुआ..में, डॉ० अज्ञात जी कि बातों को ख़ारिज नहीं कर रहा हूँ, लेकिन केवल अकेला ब्राह्मण ही दोषी रहा होगा, ऐसा नहीं हो सकता..सम्राट अशोक के काल में भी जब बौद्ध धर्म पर ग्रंथो के लिखने की शुरुआत हुई थी और अशोक भी एक भिक्कु बनकर भ्रमण पर बुद्ध वचनो का प्रचार कर रहे थे तब एक समय ऐसा आया, जब अशोक ने उस लेखन क्रियाओं पर नज़र डाली तो, उन्होंने 18 ऐसे बिंदुओं को चिन्हित किया जो बुद्ध वचनो के विपरीत थे और जो भिक्कु लेखकों की अपनी कल्पना थी..तब अशोक ने उन 18 चिन्हित बिंदुओं में से 17 काल्पनिक स्तर पर रखे बिंदुओं को हटवाया ही नहीं बल्कि सजा का प्रावधान भी सुनिश्चित किया था, और “कथावत्तू” नामक ग्रन्थ, जो उसी काल में लिखा गया, शुद्ध बुद्ध वचनो पर आधारित है..जबकि यह ग्रन्थ त्रिपिटक का मुख्य खंड माना जाता है..त्रिपिटक कोई ग्रन्थ नहीं है इसका अर्थ है तीन पेटियां और इन तीन पेटियों में अलग-अलग, तीन-तीन खंड जिन्हे “त्रिरत्न” भी कहा जाता है, बुद्ध सिद्धांतों के व बुद्ध मार्ग के और उनके जीवन से सम्बंधित रखें होते हैं, जिसमे कथावत्तू भी एक महत्वपूर्ण खंड है..जाहिर है अशोक के काल में बौद्ध धर्म में तब किसी ब्राह्मण का प्रवेश तो हुआ नहीं था तो फिर काल्पनिक बाते लिखने की शुरुआत कहाँ से हुई ?..जब बौद्ध धर्म के शीर्ष पर विराजमान अनुयायी या यूँ कहें की बौद्ध धर्म की परिषद में मूल भिक्कुओं का ही एकाधिकार था तो उन्होंने लेखन आदि गंभीर मसलों में ब्राह्मणों को मौका क्यों दिया ?..इस बात को ख़ारिज नहीं किया जा सकता की धीरे-धीरे बौद्ध धर्म में ब्राह्मणो का प्रवेश भी शुरू हो गया था और उन्होंने बुद्ध के मूल सिद्धांतों की तस्वीर बिगाड़नी शुरू कर दी थी..इसका एक उदाहरण 17वीं-18वीं सदी का मिलता है जब अंग्रेजों ने बौद्ध मार्ग का अध्यन और स्रोतों की खोज की तब उन्होंने पाया कि बंगाल के चटगांव जिले के गांवों में ब्राह्मण रहा करते थे जो पाली भाषा में वर्णित त्रिपिटक पढ़ा करते थे और उसके मूल के साथ ब्राह्मणीकरण करते थे..!
दरअसल बौद्ध धर्म का सदैव उदार रुख रहा है, जिसने भी बौद्ध धर्म स्वीकार किया उसका स्वागत ही हुआ..और भारत से यही गुण, इस धर्म के पतन का कारण बना तथा बौद्ध मार्ग और सिद्धांत का हनन करता रहा..जिस तरह ब्राह्मणो ने बौद्ध धर्म में अपनी घुसपैठ बनाई, ठीक वैसे ही चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र, व्रह्दत्त मौर्य के काल में विदेशी आक्रांता, यवनो ने भारत की भूमि पर कब्ज़े के लक्ष्य हेतू बौद्ध धर्म में अपनी सेना के लोगों का प्रवेश करा दिया था और वे सभी यवन सेनानी भिक्कु बन गए और बाद में वह हथियार लाने शुरू कर दिए थे..जब यह षड़यंत्र व्रह्दत्त मौर्य के संज्ञान में आया तब उसने अपने ब्राह्मण योद्धा पुष्पमित्र-शुंग जो सेनापति था, उसको यवनो को कुचलने का आदेश दिया..हालांकि शुंग ने सभी यवनो को बुरी तरह कुचला ही नहीं, बल्कि उन सभी भिक्कुओं को मौत के घाट उतार दिया, जो यवन थे..लेकिन उसी के बाद छल से शुंग ने व्रह्दत्त मौर्य की भी हत्या कर दी और स्वयं राजा बन गया..बस यहीं से बौद्ध धर्म का भारत से पतन शुरू हो गया और लगभग बौद्ध धर्म का अंत कर दिया गया..उसके बाद 2500 वर्षों से भारत से गौण हुई सत्य की प्रतीक उपासना की पद्दति को बाबा साहब डॉ० भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में 2 मई, 1950 को “द-बुद्धा” की भव्य जयंती मनाकर पुनर्स्थापित किया गया था..इससे यह सिद्ध होता है कि बुद्ध धर्म में किवदंतियों के जनक केवल ब्राह्मण ही नहीं थे, बौद्ध भिक्कु भी उस काल खण्डों में जब विभिन्न पंथों की लेखन क्रिया चरम पर थी, उस प्रतिद्विन्दता में भिक्कू चिंतक और लेखों ने भी श्रेष्ठता को बनाये रखने में अपनी-अपनी भूमिका निभाई होगी..इसका जीता जागता उदाहरण है कि जब बाबा साहब का रचित ग्रन्थ “बुद्धा एंड हिज धम्मा” सार्वजिक हुआ तो ब्राह्मणवाद पार्ट-2 के, ये अनुयायी जो अनेकों बौद्ध धर्म के मठों के सर्वेसर्वा बने हुए थे जैसे भदन्त नन्द वर्धन बौद्धि, भदन्त कौशल्यान आदि और भी अनेकों मठों के सर्वेसर्वाओं ने बाबा साहब की कड़ी निंदा-आलोचना करनी शुरू कर ऐसे कटु शब्दों का प्रयोग किया गया, जितनी शायद हिन्दू मत के ब्रह्मणो ने भी नहीं की होगी..हालांकि अब धीरे-धीरे ऐसे मठाधीशों की संख्या कम होनी शुरू हो गई है..लेकिन आज भी इनकी संख्या पर्याप्त बनी हुई है..अब यह विषय बौद्ध अनुयायियों और अंबेडकरवादीयो के विवेक और दृश्टिकोण पर छोड़ देना चाहिए कि वह ब्राह्मणवाद से ग्रस्त “त्रिपिटक” को मान्यता देते हैं कि बाबा साहब के रचित ग्रन्थ “बुद्धा एंड हिज धम्मा” को..में समझता हूँ कि यह एक शोध का विषय भी है, साथ ही में, एक बात और स्पष्ट कर दूँ, सिवाए हिन्दू धर्म के अन्य सभी धर्मों की भांति बौद्ध धर्म भी दो मतों में विभाजित हो रखा है “हीनयान” और “महायान”..जिसका उल्लेख बड़े ही विस्तार से डॉ० लोहिया ने अपने लेख “हिन्दू बनाम हिन्दू” में किया हुआ है..जिसके कुछ अंशों की व्याख्या में अपने इसी खंड-1, के अधयाय-3 में कर चुका हूँ..!
बौद्ध अनुयायियों एवं अंबेडकरवादियों के जीवन से जुडी हक़-अधिकार की, इस अतिमहत्वपूर्ण पहेली को जरूर समझ लेना चाहिए जो बौद्ध आरक्षण, हिन्दू दलित आरक्षण एवं देश की कुल आबादी अनुसार, दलितों की संख्या के गिरते स्तर से सम्बंधित है…..
धारावाहिक लेख जारी है
(लेखक-राजनीतिक व सामाजिक चिंतक हैं)






