डॉ. प्रिया मानवी
_उपासना सैकड़ों प्रकार की है। जहां तक प्रश्न साधना का है, वह केवल दो हैं–पहली है योग-साधना और दूसरी है तन्त्र-साधना और दोनों की मूलभित्ति है–देवपरक अध्यात्म। आत्मा से सम्बंधित जो विषय है, वह है अध्यात्म। इन दोनों साधनाओं के मार्गो पर चलने के लिए सर्वप्रथम शरीर का पूर्णरूप से स्वस्थ रहना आवश्यक है।_
स्वास्थ्य शरीर का स्वधर्म है और शरीर को सदैव स्वस्थ रखना साधक का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए। जीवन साधक का कर्तव्य है कि वह शारीरिक और मानसिक स्तर का सन्तुलन बनाये रखने के लिए स्वधर्म का पालन करे। अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना जीवन की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
जैसे पहली प्राथमिकता अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना है, उसी प्रकार दूसरी प्राथमिकता है–जीवन के लिए ध्यान उपलब्ध करना। तीसरी प्राथमिकता है–आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण करना।
प्रत्येक शास्त्र का अपना एक स्वतंत्र विज्ञान है। आयुर्वेद का भी अपना विज्ञान है जिसे ‘आयुर्विज्ञान’ कहते हैं। उन्हीं में एक औषधि-तंत्र भी है। इस तन्त्र का उद्देश्य लोगों को रोगों से मुक्त रखना ही नहीं है, बल्कि उन्हें यह भी बतलाना है कि आदर्श जीवन किस प्रकार जीयें।
अत्यधिक ऊर्जावान कैसे बनें ? रोग और व्यधियों से कैसे लड़ें ?
औषधि-तन्त्र का जीवन को व्यवस्थित करना और किसी के भी अस्तित्व के विभिन्न स्तरों पर देश व काल के अनुसार जीने का मार्ग बतलाना है। संकट की स्थिति में वह सात्विक साधनों द्वारा उस स्थिति को दूर करने की कला भी सिखाता है और मृत्यु के लिए तैयार भी करता है। मृत्यु अपरिहार्य है।
जिसे जन्म मिला है, उसे एक दिन मृत्यु का सामना करना पड़ता है। लेकिन औषधि-तन्त्र मनुष्य के मृत्यु-भय को दूर कर उसे उसका सफलता पूर्वक सामना करना सिखाता है।
हर व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य को बराबर बनाये रखने के लिए स्वयं ही उत्तरदायित्व लेना पड़ता है। औषधि-तन्त्र के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति वह होता है जो त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) की दृष्टि सेे साम्यस्थिति में रहे। अर्थात–वात, पित्त और कफ दोषों में सन्तुलन बना रहे।
विकृत व नकारात्मक विचार, समय और बुद्धि का दुरुपयोग व्यक्ति को शारीरिक व मानसिक रूप से बीमार बना देता है।
मनुष्य का शरीर, मन, प्राण अस्वस्थ हो सकता है, लेकिन आत्मा नहीं। आत्मा कभी अस्वस्थ नहीं होती।
_समस्त रोगों का कारण अधर्म :_
औषधि-तन्त्र के अनुसार सभी शारीरिक व मानसिक अव्यवस्थाओं का मूल कारण अधर्म है जो अविवेक के कारण उत्पन्न होता है। कोई भी अस्वास्थ्यकारी क्रिया उस व्यक्ति के द्वारा उत्पन्न होती है जिसकी बुद्धि अव्यवस्थित होती है।
असीम इच्छाओं का होना, उनका दमन करना, कार्यों का अविवेकपूर्ण ढंग से आरंभ, उन कार्यों में असंतुष्टि, अत्यधिक कामुकता, अच्छे आचरण और विनम्रता का अभाव, सम्मान के स्थान पर तिरस्कार का उपयोग, जानबूझकर अव्यवस्थित वस्तुओं का प्रयोग, उन कारणों का उपयोग जो मस्तिष्क को विकृत करने का कारण होते हैं जैसे–गलत समय, स्थान और व्यक्ति का चयन, भय, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और ऐसी क्रियाएं जो रज और तम से उत्पन्न होती हैं, वे समस्त रोगों की कारण हैं।
_धर्म और आयुर्वेद–दोनों में एक ही ब्रह्माण्डीय नियम लागू होता है। ब्रह्माण्ड को संचालित करने वाले समस्त सिद्धांत जीवविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान में समान रूप से लागू होते हैं।_![]()





