अग्नि आलोक
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*मृत्यू के बाद …..!*

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        ~रश्मिप्रभा सिंह 

     मनुष्य की मृत्यु के बाद जाग्रत मन का अस्तित्व तो समाप्त हो जाता है लेकिन उसका मौलिक तत्व जिसमें वासना, संस्कार और तमाम भौतिक वृत्तियाँ रहती हैं, उस उपचेतन मन में चला जाता है।

      यही कारण है कि मरने के बाद उपचेतन मन की शक्ति और अधिक बढ़ जाती है। इतना ही नहीं, विराट मन या पराचेतना से भी उसका संपर्क अधिक घनिष्ठ हो जाता है। परामनोविज्ञान का यह अत्यन्त गम्भीर विषय है जिसपर प्रेतविद्या के सारे सिद्धान्त निर्भर हैं।

      प्रत्येक जीवित मनुष्य का मरने के बाद कुछ समय के लिए प्रेत होना निश्चित है.

     जिसे जीवात्मा कहा जाता है उसके तीन योगरूप हैं :

      *1–मनुष्यात्मा :*

जब जीवात्मा मनुष्य शरीर अर्थात् पार्थिव शरीर में रहती है, तो उसे ‘मनुष्यात्मा’ कहते हैं।

      *2–प्रेतात्मा :*

मरने के तुरंत बाद जब जीवात्मा वासनामय शरीर में रहती है, तो उसे ‘प्रेतात्मा’ कहते हैं।

     *3–सूक्ष्मात्मा :*

जब जीवात्मा की वासना का वेग समाप्त हो जाता है और वह सूक्ष्म परमाणुओं से निर्मित सूक्ष्म शरीर में चली जाती है, तो वह ‘सूक्ष्मात्मा’ कहलाती है। सूक्ष्मात्मा की स्थिति उपलब्ध होने का तात्पर्य है कि अब वह जीवात्मा पुनर्जन्म ग्रहण करने की अधिकारिणी हो गयी है।.

      सूक्ष्मात्मा के भी तिरोहित हो जाने का अर्थ है कि जीवात्मा को भवचक्र से हमेशा हमेशा के लिए मुक्ति प्राप्त हो गयी। इसी सूक्ष्म शरीर से मुक्ति पाने के लिए ही सारी साधनाएं, उपासनाएँ,तप आदि उपक्रम हैं।

      वासना शरीरधारी प्रेतात्माओं का जो जगत है, उसे ही हम ‘वासना जगत’ या ‘प्रेतलोक’ कहते हैं। कुछ लोगों का भ्रम है कि ‘प्रेतलोक’ सुदूर कहीं अंतरिक्ष में विद्यमान है। मगर नहीं, काफी छानबीन और अन्वेषण के बाद जो तथ्य सामने आये हैं,उनके अनुसार प्रेतलोक अंतरिक्ष में नहीं बल्कि हमारी इसी धरती पर दूध में पानी की तरह मिला हुआ है।        

       आधुनिक उपकरणों द्वारा पता करने पर उनका अस्तित्व,उनकी ‘लोफ्रीक्वेंसी’ की आवाज़ को रिकॉर्ड किया जा सकता है जो कि ‘भूत- प्रेत’ के अस्तित्व का वैज्ञानिक प्रमाण है।

      वासना दो प्रकार की होती है,अच्छी भी और बुरी भी। इसी दृष्टि से प्रेतलोक को भी हम दो भागों में विभाजित कर सकते हैं। अच्छी वासनाओं के भाग को’पितृलोक’ और बुरी वासनाओं के भाग को ‘प्रेतलोक’ कहा गया है।

      पितृलोक के ऊपर सुक्ष्मशरीर धारी आत्माओं का ‘सूक्ष्मलोक’ है। उसके बाद ‘मनोमय लोक’ है। इसे ही ‘देवलोक’ कहा गया है। यह मनोमय लोक नक्षत्र मण्डलों की सीमा और गुरुत्वाकर्षण की परिधि के बाहर सुदूर अंतरिक्ष में है। उसमें निवास करने वाली आत्माओं में मनःशक्ति और विचारशक्ति अति प्रबल होती है।

       इसी प्रकार सुक्षमात्माओं में इच्छाशक्ति और प्राणशक्ति अति प्रबल होती है। लेकिन जहांतक प्रेतात्माओं का सम्बन्ध है, उनमें सिर्फ वासना की प्रबलता रहती है। वासना की शक्ति ही उनकी स्व-शक्ति है।

      परामानसिक जगत के विद्वानों का कहना है कि देवात्माओं, सूक्ष्मात्माओं, प्रेतात्माओं में क्रमशः मनः-शक्ति, विचार शक्ति और इच्छाशक्ति या प्राणशक्ति विद्यमान हैं, वे सारी शक्तियां एकसाथ मनुष्य शरीर में विद्यमान हैं। इसीलिए मानव को और मानव शरीर को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

      मस्तिष्क के तीन भाग हैं। वे तीनों भाग मनः- शक्ति, विचार- शक्ति, इच्छा-शक्ति या प्राण-शक्ति के केंद्र हैं। प्राणशक्ति का केंद्र है–नाभि। उन शक्तिओं का सम्बन्ध प्राणशक्ति से जहाँ स्थापित होता है, वह है–हृदय।

       मानव शरीर में मनः शरीर, सूक्ष्म शरीर और वासना शरीर का बीज रूप में अस्तित्व है–इस तथ्य को आज वैज्ञानिको ने भी स्वीकार कर लिया है। भैतिक शरीर की रचना पञ्चभौतिक तत्वों के परमाणुओं के संगठन से होती है। इसी लिए सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर के सर्वाधिक निकट है।

      योगी लोग मनोमय शरीर और वासना शरीर से अधिक महत्व इसीलिए सुक्ष्मशरीर को देते हैं कि वे भौतिक शरीर की तरह इसका उपयोग अपनी इच्छानुसार कर सकते हैं।

Ramswaroop Mantri

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