अग्नि आलोक
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अग्निहोत्र : आधुनिकता की अंधी दौड़ में नहीं भूलें प्राचीनता की वैज्ञानिकता

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ज्योतिषाचार्य पवन कुमार (वाराणसी)

      समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् । आस्मिन् हव्या जुहोतन ।।

    ~यजुर्वेद (३/१ )

     शब्दार्थ :

 समिधा = यज्ञ कुण्ड में पीपल, बड़ आदि की – लकड़ियाँ रखकर, अग्निम् = अग्नि का, दुवस्यत = सेवन करो, जलाओ, घृतेः = गाय के घी से, बोधयत = उस अग्नि को तीव्र करो, अतिथिम् = जो अतिथि के समान आदर के योग्य है, अस्मिन् =  उस अग्नि में, हव्या = अनेक प्रकार के दिव्य औषधियों से निर्मित सामग्री को आ जुहोतन = अच्छी प्रकार से जलाकर यज्ञ करो।

भावार्थ :

     वेदों में अग्नि तत्त्व की महिमा बहुत दर्शाई गयी है और उसका अनेक प्रकार से उपयोग लेने का भी विधान किया गया है। अग्नि से जहाँ भोजन बनाने, भवन बनाने, कल कारखाने लगाने, जल यान, वायु यान, भूमि यान आदि अनेक प्रकार से यन्त्र का निर्माण-संचालन करके लाभ उठाने का वर्णन है, वहाँ पर पर्यावरण की शुद्धि के लिए अग्निहोत्र हवन करने का भी अनेकत्र विधान आया है।

     _अग्निहोत्र एक भौतिक रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें उल्टे पिरामिड के आकार वाला धातु का बर्तन लिया जाता है क्योंकि ऐसे आकार वाले पात्र में लकड़ी जलाने से अग्नि का तापमान खुली अग्नि से अनेक गुना अधिक ( ४००-५०० फारेनहाईट ) बनता है।_

      इस पात्र में पीपल, बड़, आम आदि की पतली-छोटी लकड़ियाँ रखकर जलाई जाती है। यह लकड़ियाँ शीघ्र जलने वाली, तीव्र अग्नि उत्पन्न करने वाली, कम कार्बन मोनोक्साईड उत्पन्न करने वाली तथा पूरी-पूरी जलने वाली होती है। इस अग्नि को और अधिक तीव्र करने के लिए गाय का घी उन जलती लकड़ियों पर चम्मच से धीरे-धीरे डाला जाता है।

        गाय के घी को जलाने से अनेक प्रकार की विशिष्ट गैस बनती है जो भूमि व आकाश में व्याप्त दूषित वायु जल प्रदूषण को शीघ्रता से समाप्त कर देती है।

      जब यज्ञ कुण्ड में गाय के घी से लकड़ियाँ अच्छी प्रकार से प्रज्वलित हो जाती हैं तब अग्नि में चार प्रकार के पदार्थों से बनी हुई हव्य सामग्री डाली जाती है।

यह हव्य सामग्री गिलोय आदि रोगनाशक औषधियाँ, केशर, कस्तूरी, अगर, तगर आदि सुगन्धित वस्तु, घी, दूध आदि पुष्टिकारक द्रव्य तथा गुड, किशमिश, खजूर आदि मधुर पदार्थों को कूट-पीस कर, मिला कर बनाई जाती है।

       इन ४०-५० प्रकार की विशिष्ट औषधियों, जड़ी-बूटियों, वनस्पतियों, फलों, फूलों, कन्दों, अन्नों से बनी इस सामग्री को तीव्र अग्नि में जलाने से अनेक प्रकार की गैसों का निर्माण होता है। जिसे वैदिक भाषा में भेषज वायु कहा जाता है।

      ये गैसें सूर्य की किरणों के माध्यम से आकाश में ऊपर जाकर प्रदूषित वायु तथा पानी को शीघ्र ही शुद्ध कर देती है।

वायु व पानी के शुद्ध होने से भूमि भी शुद्ध बनती है और शुद्ध होने से इससे उत्पन्न होने वाले अन्न, शाक, फल, भूमि के फूल, कन्दमूल, औषधियाँ आदि भी शुद्ध होते हैं। इसलिए वैदिक जीवन पद्धति में प्रतिदिन प्रातः सायं दोनों समय अग्निहोत्र करने का विधान है।

      किन्तु इस अल्प व्यय, अल्प समय वाली छोटी सी रासायनिक  प्रक्रिया से हजारों घन मीटर वायु शुद्ध होती है और इससे न केवल मनुष्यों को अपितु पशु-पक्षी, कीट-पतंग यहाँ तक कि वृक्ष-वनस्पति, कन्द मूल को भी लाभ पहुँचता है।

जब तक इस धरती पर घरों में प्रतिदिन दैनिक अग्निहोत्र होता रहा तब तक लोग स्वस्थ, बलवान, बुद्धिमान, दीर्घायु होते थे किन्तु यह प्रक्रिया जब से बन्द हुई तब से मनुष्य का शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सब प्रकार से पतन हुआ है। मनुष्यों द्वारा पर्यावरण की शुद्धि की इस प्रक्रिया के रुक जाने से सारा संसार एक गैस चैम्बर के समान बन गया है।

      ग्लोबल वार्मिंग का भस्मासुर सब कुछ का विनाश करने को तैयार है।

वेद मन्त्र मनुष्य को निर्देश करता है कि है, हे मनुष्यो ! इस अतिथि के समान अग्नि को यज्ञ कुण्ड में स्थापित करके इससे होने वाले अनेक प्रकार के लाभों को प्राप्त करो।

       इस अग्निहोत्र से निकली ज्वाला आपके घरों, ग्रामों, नगरो में फैले अनेक प्रकार के रोग के कीटाणुओं को तत्काल नष्ट कर देगी। थोड़े से परिश्रम, थोड़े से साधनों व थोड़े से समय में बहुत अधिक लाभ होने के कारण इस कार्य को श्रेष्ठतम कर्म बताया गया है।

       _रुस, जर्मनी, हॉलैण्ड, चीली, अमेरिका आदि देशों में अनेक वैज्ञानिकों ने भी जलती अग्नि में केशर, किशमिश, चावल, जौ, गुगल, शक्कर, गुड़ आदि पदार्थों को जलाने पर बनने वाली गैसों के लाभों का उल्लेख किया है। उनकी बुद्धि में यह विश्वास बनता जा रहा है कि प्राचीन काल में भारतीय जिस अग्निहोत्र से पर्यावरण शुद्ध करते थे वह वास्तव में अति उपयोगी है।_

      अपने परिवार समाज व राष्ट्र तथा विश्व के न केवल भौतिक प्रदूषण को दूर करें अपितु बौद्धिक, आत्मिक प्रदूषण को भी दूर करने हेतु अग्निहोत्र की परम्परा में स्वयं को शामिल करें. इस दिपावली के पर्व से अपने- अपने स्थल पर यज्ञ की सुरुवात अवश्य करें।

     (चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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