
तेजपाल सिंह ‘तेज’
डॉ. भीमराव अंबेडकर भारत के इतिहास की वह ज्वलंत चेतना हैं जिन्होंने न केवल
अपने युग को दिशा दी, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी स्वतंत्रता, समानता और न्याय
की राह प्रशस्त की। वे संविधान निर्माता थे, लेकिन उससे कहीं अधिक वे एक सामाजिक
क्रांतिकारी थे जिन्होंने दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, श्रमिकों और हर उस वर्ग के अधिकारों
की वकालत की जो सदियों से उत्पीड़न और बहिष्करण का शिकार था। आज जब हम देखते हैं
कि कुछ समूह अंबेडकर की तस्वीरों का अपमान करते हैं, संविधान को जलाने की धृष्टता करते
हैं और आरक्षण जैसे संवैधानिक उपायों को जातिवादी चश्मे से देखते हैं, तब यह सवाल ज़रूरी
हो जाता है—क्या हम उस महान व्यक्तित्व के योगदान को भूल चुके हैं, जिसने हमें इंसान होने
का गौरव दिया? यह निबंध अंबेडकर के उस विचार और संघर्ष को पुनः स्मरण कराने का
प्रयास है, जिसे मिटाने की साज़िशें की जा रही हैं। यह सिर्फ अंबेडकर का नहीं, भारत की आत्मा
का प्रश्न है।
एक विचार की हत्या की कोशिश:
भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में शायद ही कोई व्यक्ति डॉ. भीमराव
अंबेडकर जैसा हुआ हो, जिसने अपने व्यक्तिगत संघर्ष को पूरे समाज के उत्थान का माध्यम
बनाया। वे न केवल संविधान निर्माता थे, बल्कि करोड़ों वंचित, शोषित, दलित, आदिवासी और
महिलाओं के अधिकारों के पुरोधा भी थे। आज जब कुछ समूह उनके विचारों, मूर्तियों और
व्यक्तित्व का अपमान करते हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का
अपमान है। जो लोग संविधान जलाते हैं, आरक्षण को गाली देते हैं, अंबेडकर को ‘सिर्फ दलितों
का नेता’ बताकर अपमानित करते हैं, वे भूल जाते हैं कि आज जो अधिकार उन्हें प्राप्त
हैं—अभिव्यक्ति की आज़ादी, शिक्षा, समानता, न्याय—ये सब उसी संविधान की देन हैं जिसे
अंबेडकर ने रचा।
- अंबेडकर: संविधान निर्माता नहीं, सामाजिक क्रांतिकारी : डॉ. अंबेडकर ने जब
भारतीय संविधान का निर्माण किया, तो वे महज़ कानून की एक किताब नहीं लिख रहे थे। वे
उस समाज का खाका बना रहे थे जो शोषण, भेदभाव और जातिगत अन्याय से मुक्त हो। उनका
दृष्टिकोण ‘समता, बंधुता और न्याय’ पर आधारित था। उन्होंने संविधान की प्रस्तावना में यह
सुनिश्चित किया कि हर नागरिक—चाहे उसकी जाति, धर्म, लिंग, भाषा कुछ भी हो—उसे
समान अधिकार मिलें। वे केवल विधिवेत्ता नहीं थे, बल्कि युगद्रष्टा थे जिन्होंने यह भांप लिया
था कि भारतीय समाज की जड़ें किस तरह जातिवाद में गड़ी हैं, और उसे कैसे मिटाया जा
सकता है।
- अंबेडकर और श्रम अधिकार: जिन हाथों को सम्मान मिला, वही जला रहे
संविधान: जो हाथ आज संविधान को जलाते हैं, उन्हीं हाथों को अंबेडकर ने 8 घंटे काम,
साप्ताहिक अवकाश, न्यूनतम मजदूरी, यूनियन का अधिकार जैसे श्रम-संबंधी प्रावधान दिए।
1942 में वे वायसराय की कार्यकारी परिषद के श्रम मंत्री बने और वहाँ से उन्होंने भारतीय
श्रमिकों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। सोचिए, अगर अंबेडकर न होते, तो क्या
फैक्ट्रियों में काम करने वाले लोगों को इंसान समझा जाता? क्या उन्हें विश्राम, वेतन और हक़
मिल पाता? जो लोग आज संविधान की होली जला रहे हैं, वे उसी संविधान से अपनी छुट्टियों
और वेतन का हिसाब मांगते हैं। - आरक्षण: सिर्फ सुविधा नहीं, ऐतिहासिक न्याय: आरक्षण का विरोध करने वाले
अक्सर यह भूल जाते हैं कि यह नीति किसी ‘फेवर’ के तहत नहीं बनी, बल्कि यह सदियों के
अन्याय का जवाब है। यह केवल दलितों या आदिवासियों को ‘कोटा’ नहीं देता, यह उन्हें वह
स्थान देता है जो उनसे अन्यायपूर्वक छीन लिया गया था। जो लोग कहते हैं कि ‘हमें आरक्षण
नहीं चाहिए’, वे ही चुपचाप सरकारी नौकरियों में इसकी छांव में पले हैं। अंबेडकर ने
सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व (representation) की गारंटी
दी, ताकि लोकतंत्र केवल ऊँची जातियों की जागीर न बन जाए। - महिलाएं जो आज बोल रही हैं, पढ़ रही हैं—वो अंबेडकर की देन हैं : डॉ. अंबेडकर
ने महिलाओं को केवल शिक्षा नहीं दी, बल्कि उन्हें सम्पत्ति, तलाक, कामकाज, विवाह और
मातृत्व के अधिकार दिलाने के लिए हिंदू कोड बिल का मसौदा तैयार किया। यह इतिहास का
एक बड़ा सत्य है कि हिंदू समाज में महिलाओं को स्वतंत्र व्यक्ति नहीं माना जाता था। अंबेडकर
ने उस सोच को बदला। उन्होंने साफ कहा था, “I measure the progress of a
community by the degree of progress which women have achieved.”( मैं
किसी समुदाय की प्रगति को महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति के स्तर से मापता हूं।) आज
जो महिलाएं कोर्ट में खड़ी होकर न्याय मांग सकती हैं, कॉलेज जा सकती हैं, नौकरी कर सकती
हैं—वो अंबेडकर की सोच की ही शक्ति है। - अंबेडकर केवल दलितों के नहीं, पूरे भारत के नेता थे : अंबेडकर ने जब संविधान
लिखा, तब उन्होंने सिर्फ अछूतों के लिए नहीं लिखा था। उन्होंने उस किसान के लिए लिखा जो
साहूकार के कर्ज में डूबा है। उन्होंने उस मजदूर के लिए लिखा जो रोज़ तगारी उठाकर अपने
बच्चों का पेट पालता है। उन्होंने उस आदिवासी के लिए लिखा जो जल, जंगल और ज़मीन के हक
से वंचित है।
उन्होंने भारत के हर वर्ग के लिए समान अधिकार, न्याय और गरिमा सुनिश्चित की। आज जब
कोई उन्हें सिर्फ ‘दलितों का नेता’ कहता है, तो यह उनकी भूमिका को सीमित करने की कोशिश
है, जबकि सच यह है कि उन्होंने पूरे भारत को लोकतांत्रिक ढाँचा दिया।
- अंबेडकर का विरोध: ब्राह्मणवाद का नया रूप : जो लोग अंबेडकर को गाली देते हैं, वे
दरअसल उनकी उस सोच से डरते हैं जिसने सदियों से चले आ रहे ‘जाति आधारित वर्चस्व’ को
चुनौती दी। ब्राह्मणवाद की जड़ें उस सामाजिक व्यवस्था में हैं, जहाँ कुछ लोग जन्म से श्रेष्ठ माने
जाते हैं और बाक़ी ‘सेवा’ करने के लिए अभिशप्त। अंबेडकर ने इसी सोच पर हमला किया और
कहा—”Turn in any direction you like, caste is the monster that crosses your
path.”
(“आप जिस दिशा में चाहें मुड़ जाइये, जाति वह राक्षस है जो आपका रास्ता रोक लेता है।”)
आज अंबेडकर का विरोध उसी ‘मॉन्स्टर’ का प्रतिशोध है, जो यह नहीं पचा पा रहा कि एक
दलित व्यक्ति संविधान रचने की शक्ति पा गया। - मूर्तियों को तोड़ा जा सकता है, विचारों को नहीं : इतिहास गवाह है कि जब भी
किसी विचार ने सामाजिक असमानता को चुनौती दी, सत्ता में बैठे लोगों ने उसे मिटाने की
कोशिश की। अंबेडकर की मूर्तियाँ तोड़ी जा सकती हैं, लेकिन उनके विचार अमर हैं। “Ideas
are more powerful than guns,” यह स्टालिन ने कहा था, लेकिन अंबेडकर ने उसे भारत
में साबित किया। आज जो लोग अंबेडकर की तस्वीर पर जूते दिखाते हैं, वे यह नहीं समझते कि
यह जूते उनके अपने भविष्य पर पड़ रहे हैं। उनका विरोध आत्मघाती है, क्योंकि वे उसी
व्यवस्था को काट रहे हैं जिससे उन्हें भी लाभ मिल रहा है। - अंबेडकर और जातिविहीन भारत का सपना : अंबेडकर का सबसे बड़ा सपना
था—जातिविहीन भारत। उन्होंने कहा था—“Caste is not just a division of labor, it is
a division of laborers.” उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक जाति है, तब तक भारत
स्वतंत्र नहीं हो सकता। आज जो लोग जाति के नाम पर हिंसा कर रहे हैं, नौकरी में दलितों से
जलते हैं, उनकी तरक्की से चिढ़ते हैं, वे अंबेडकर नहीं, खुद अपने भीतर की बर्बरता को उभार
रहे हैं। अंबेडकर ने कहा था—”No man can be grateful at the cost of his honor, no
woman can be grateful at the cost of her chastity, and no nation can be
grateful at the cost of its liberty.” (“कोई भी व्यक्ति अपने सम्मान की कीमत पर कृतज्ञ
नहीं हो सकता, कोई भी महिला अपनी सतीत्व की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकती, और कोई
भी राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता।”) - अंबेडकर और भारत की एकता : अंबेडकर ने कभी देश को नहीं बाँटा। वे देश को
संविधान, समानता और न्याय के सूत्र में पिरोना चाहते थे। पाकिस्तान की माँग जिन्ना की थी,
पर विभाजन की ज़िम्मेदारी गांधी और कांग्रेस की विफलताओं पर थी। अंबेडकर ने तो स्पष्ट
किया था—”I was the first person to say that I am not for Pakistan.” आज जो
लोग कहते हैं कि अंबेडकर ने देश तोड़ा, वे इतिहास को झूठा बनाते हैं। यह आरोप दरअसल
जातिवादी मानसिकता का एक षड्यंत्र है, जो अंबेडकर की लोकप्रियता से घबराया हुआ है। - नई पीढ़ी और अंबेडकर की विरासत : आज की पीढ़ी को यह समझने की ज़रूरत है
कि अंबेडकर कोई ‘राजनीतिक कोटा’ नहीं, बल्कि संवैधानिक चेतना हैं। अगर आज एक दलित
छात्र मेडिकल कॉलेज पहुँच रहा है, अगर एक आदिवासी लड़की यूनिवर्सिटी में पढ़ रही है,
अगर एक पिछड़े गाँव की महिला पंचायत में मुखिया बन रही है—तो यह बाबा साहब की देन
है। यदि हम चुप रहे, और अंबेडकर का विरोध होते देखते रहे, तो हम सिर्फ अतीत को नहीं,
अपने भविष्य को खो देंगे।
निष्कर्षत: अब वक्त है कि हम तय करें—अंधेरा चाहिए या अंबेडकर :
जो लोग अंबेडकर का विरोध करते हैं, वे इस देश को फिर उसी अंधेरे में ले जाना चाहते
हैं जहाँ जाति, धर्म और लिंग के आधार पर इंसानों को बाँटा जाता था। अंबेडकर उस उजाले का
नाम है जो हर भारतीय को गरिमा के साथ जीने का हक़ देता है। अब फैसला हमारे हाथ में
है—क्या हम उनके साथ खड़े होंगे जिन्होंने हमें इंसान माना, या उनके साथ जो आज भी हमें
नीचा दिखाने पर आमादा हैं?
अंबेडकर एक व्यक्ति नहीं, विचार हैं :
बाबा साहब की तस्वीरें जला देने से उनका विचार नहीं मिटेगा। उनके विचार
न्यायालयों में, स्कूलों में, संसद में, खेतों में, कारखानों में, और दिलों में ज़िंदा हैं। यदि आपने
बाबा साहब से कुछ पाया है—सम्मान, अधिकार, शिक्षा, पहचान—तो अब उन्हें बचाने की
ज़िम्मेदारी आपकी है।
डॉ. अंबेडकर का विरोध करना केवल किसी व्यक्ति का विरोध नहीं, बल्कि भारत के
लोकतंत्र, संविधान और मानवता पर हमला है। यह विरोध उस परिवर्तन के विरुद्ध है, जिसने
सदियों से शोषित लोगों को मनुष्य होने का अधिकार दिलाया। जो लोग आज अंबेडकर की
मूर्तियों को तोड़ते हैं, उनके विचारों को मिटाना चाहते हैं, वे इस बात से डरते हैं कि जो
व्यवस्था कभी केवल उनके लिए थी, वह अब सभी के लिए समान हो गई है। परंतु यह सत्य है
कि विचार कभी मरते नहीं। अंबेडकर केवल किताबों में नहीं, वे हर उस हक़ में जीवित हैं जो
किसी छात्र को पढ़ने का अधिकार देता है, किसी महिला को नौकरी का अवसर देता है, किसी
दलित को न्याय दिलाता है। हमें यह तय करना है कि हम इतिहास में किस ओर खड़े दिखना
चाहते हैं—अंधकार के साथ या अंबेडकर के साथ। अब समय है कि हम चुप्पी तोड़ें, आवाज़
उठाएं और कहें:
“मैं अंबेडकर के विचारों के साथ हूँ।” क्योंकि जब कोई एक व्यक्ति सबके लिए लड़ा, तो क्या हम
सब मिलकर उसके लिए नहीं खड़े हो सकते?
यथोक्त के आलोक में एक बात जो हमारे सामने आती है, वह है कि क्या हमें बाबा साहेब
की पूजा करनी चाहिए अथवा उनके आदर्शों को स्वीकार करके समाजोन्न्मुक कार्य करने चाहिए।
यह प्रश्न अत्यंत विचारोत्तेजक है और सामाजिक-राजनीतिक चेतना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण
भी। आइए इसे विस्तार से समझते हैं: “बाबा साहेब जैसा कोई नहीं, तुम उनकी पूजा
करो”—एक लोकप्रिय भाव, परंतु आलोचनात्मक दृष्टिकोण आवश्यक है। इस वाक्य में बाबा
साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त की गई है। परंतु जब इस श्रद्धा को
“पूजा” में रूपांतरित कर दिया जाता है, तो यह एक वैचारिक और सामाजिक संकट का संकेत
भी बन जाता है। आइए तर्कों से इस बात का विश्लेषण करें कि बाबा साहेब की पूजा करना क्यों
तर्कसंगत नहीं है, और क्यों उनके विचारों पर चलना ही सच्चा सम्मान है।
भारत में श्रद्धा और भक्ति की परंपरा इतनी गहरी है कि हम किसी भी महान व्यक्ति को
देवता बना देते हैं — उसे पूजा के योग्य मान लेते हैं। यही हाल बाबा साहेब डॉ. भीमराव
अंबेडकर के साथ भी हो रहा है। “बाबा साहेब जैसा कोई नहीं, तुम उनकी पूजा करो” — इस
तरह के भाव आज आम हो गए हैं। जगह-जगह मूर्तियाँ लग रही हैं, जयंती मनाई जा रही है,
नारे लगाए जा रहे हैं — पर क्या यही बाबा साहेब का सम्मान है?
नहीं … अगर हम डॉ. अंबेडकर को सच्चे अर्थों में समझें, तो पाएंगे कि वे स्वयं ‘पूजा
संस्कृति’ के विरोधी थे। वे चाहते थे कि लोग उनकी नहीं, उनके विचारों और दर्शन की पूजा
करें। आज आवश्यकता है कि हम इस अंतर को समझें — अन्यथा अंबेडकर भी गांधी, भगत सिंह
और बुद्ध की तरह सिर्फ “मूर्ति” बनकर रह जाएंगे।
भारत में श्रद्धा और भक्ति की परंपरा इतनी गहरी है कि हम किसी भी महान व्यक्ति को
बहुत जल्दी “देवता” बना देते हैं — और फिर उसकी पूजा करने लगते हैं। यह प्रवृत्ति जहाँ एक
ओर भावनात्मक संतोष देती है, वहीं दूसरी ओर वह व्यक्ति जिन विचारों के लिए जिया और
लड़ा — वे विचार धीरे-धीरे विस्मृत हो जाते हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ भी यही हो
रहा है। वे हमारे संविधान निर्माता हैं, दलित आंदोलन के पथप्रदर्शक हैं, आधुनिक भारत के
सबसे बड़े बौद्धिक विद्रोही हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश आज उन्हें केवल एक “पूज्य मूर्ति” में बदल
दिया गया है।
“बाबा साहेब जैसा कोई नहीं, तुम उनकी पूजा करो”— यह वाक्य सुनने में सम्मानजनक
लगता है, लेकिन क्या यह अंबेडकरवादी चेतना के अनुकूल है? क्या वे सचमुच चाहते थे कि
लोग उन्हें पूजें? या फिर वे चाहते थे कि लोग शिक्षित बनें, तर्क करें, संगठित हों, और
सामाजिक क्रांति लाएँ? यह निबंध इसी प्रश्न पर केंद्रित है — कि डॉ. अंबेडकर की पूजा नहीं,
उनके विचारों का अनुकरण ही सच्चा सम्मान है।
- डॉ. अंबेडकर स्वयं ‘पूजा’के घोर विरोधी थे : “नायक-पूजा निश्चित रूप से पतन और
अंततः तानाशाही का मार्ग है।” (“Hero-worship is a sure road to degradation and
to eventual dictatorship.” — डॉ. अंबेडकर (Annihilation of Caste)
इस कथन में अंबेडकर ने नायक-पूजा (hero-worship) को सामाजिक पतन और
अधिनायकवाद का मार्ग बताया है। वे मानते थे कि यदि लोग किसी व्यक्ति की आँख मूँदकर
पूजा करते हैं, तो वे सोचने-समझने की क्षमता खो देते हैं। यही स्थिति जब किसी समाज में
सामान्य हो जाती है, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ता है और अंधभक्ति जन्म लेती है। - पूजा का तात्पर्य ‘अंधश्रद्धा’ से है, जबकि अंबेडकर ने ‘तर्कशीलता’ सिखाई: ‘पूजा’
एक धार्मिक प्रक्रिया है जिसमें तर्क और विश्लेषण का स्थान नहीं होता, बल्कि पूर्ण समर्पण और
आत्मविसर्जन की अपेक्षा होती है। यह प्रक्रिया ‘प्रश्न’ नहीं करती, केवल ‘स्वीकार’ करती है।
परंतु अंबेडकर का दर्शन विपरीत है: उन्होंने कहा — “मन को विकसित करें – यह मन ही है जो
मनुष्य को बनाता है” (“Cultivate the mind — it is the mind which makes a
man.”) उन्होंने अपने अनुयायियों से ‘सोचने’, ‘तर्क करने’ और ‘समाज के ढांचों को चुनौती देने’
की बात की, न कि उन्हें आंख मूंदकर पूजने की। - पूजा की संस्कृति व्यक्ति को ‘देवता’ बनाती है, विचारों को नहीं: जब आप किसी को
पूजते हैं, तो आप उस व्यक्ति को ‘त्रुटिहीन’ (infallible) मानने लगते हैं। इससे आलोचना और
आत्मावलोकन की गुंजाइश खत्म हो जाती है। यही कारण है कि आज कई लोग बाबा साहेब की
प्रतिमा के आगे फूल चढ़ाते हैं, लेकिन उनके विचारों से मुँह मोड़ लेते हैं। वे अंबेडकर को केवल
‘मूर्ति’ बनाकर पूजना चाहते हैं, ‘विद्रोही विचारक’ नहीं बनाना चाहते। - बाबा साहेब का विचार एक आंदोलन है, मूर्ति नहीं: अंबेडकर केवल एक व्यक्ति नहीं
थे; वे एक चेतना, एक क्रांति और एक वैचारिक आंदोलन थे। जब आप उन्हें पूजने लगते हैं, तो
आप उस आंदोलन को स्थिर कर देते हैं। विचारों का मंदिर नहीं होता — विचारों का पथ होता
है, जिस पर चलना होता है। बाबा साहेब ने जाति, धर्म, सत्ता और पितृसत्ता को तर्क के धरातल
पर चुनौती दी — वे किसी मंदिर में बैठने के लिए नहीं, समाज को बदलने के लिए पैदा हुए थे। - पूजा व्यक्ति को ‘मिथक’ बना देती है — आलोचना असंभव हो जाती है: पूजा की
संस्कृति यह स्वीकार नहीं करती कि कोई महान व्यक्ति भी गलत हो सकता है। जबकि एक
वैज्ञानिक/तार्किक समाज में कोई भी विचार, चाहे वह गांधी का हो या अंबेडकर का, उसे
जांचा-परखा जाना चाहिए। डॉ. अंबेडकर स्वयं भी मानते थे कि विचार समय के साथ बदलते
हैं, और उन्होंने कई बार स्वयं अपने विचारों की आलोचना भी की। यदि हम उन्हें ‘पूजनीय’
मान लेंगे, तो हम उनकी आलोचना नहीं कर पाएँगे — और यह उनके ही विचारों के साथ
अन्याय होगा।
- डॉ. अंबेडकर ने स्वयं कभी यह नहीं कहा कि वे पूजे जाएँ, बल्कि शिक्षा, संगठन और
संघर्ष को पूजो। “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” — यह उनका मूल मंत्र था।उन्होंने हमें
यह नहीं कहा कि मेरी मूर्तियाँ लगाओ, या मेरी पूजा करो, बल्कि यह कहा कि अपने आत्म-
सम्मान के लिए लड़ो। - पूजा समाज को निष्क्रिय बनाती है, क्रांतिकारी नहीं: जब कोई किसी की पूजा करता
है, तो उसमें यह भ्रम पैदा होता है कि वह अपना कर्तव्य पूरा कर चुका है। वह सोचता है —
“मैंने बाबा साहेब की जयंती मना ली, मूर्ति पर फूल चढ़ा दिए, अब मुझे कुछ करने की ज़रूरत
नहीं।” जबकि बाबा साहेब कहते हैं: “किसी भी समाज की प्रगति पूजा पर नहीं, बल्कि कर्म पर
निर्भर करती है” (“The progress of any society depends not on worship, but on
action.”)
आखिर करना क्या चाहिए?
पूजा पालन/अनुसरण
- मूर्तियों पर फूल चढ़ाना : विचारों को आत्मसात करना
- अंधश्रद्धा : तर्कशीलता
- गौरवगान : आत्ममंथन और आलोचना
- उत्सव मनाना : संगठित संघर्ष करना
- व्यक्ति-पूजा : समाज-परिवर्तन
- आज हम क्या कर रहे हैं?
बाबा साहेब की जयंती पर जुलूस निकालते हैं।
प्रतिमाओं पर फूल चढ़ाते हैं।
नारे लगाते हैं — “जय भीम!”
पर क्या उनके विचारों को अपनाते हैं?
क्या हम संविधान की मूल भावना को समझते हैं?
क्या हम जाति के विरुद्ध खड़े होते हैं?
क्या हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हैं?
क्या हम अपने भीतर अंबेडकर पैदा करते हैं?
इन सब सवालों उत्तर दुर्भाग्य से “नहीं” ही है।
- पूजा संस्कृति: ब्राह्मणवाद का जाल: बाबा साहेब ने ‘ब्राह्मणवाद’ की कड़ी आलोचना
की थी, जो पूजा, कर्मकांड, अंधविश्वास और जाति-व्यवस्था का पोषक है। आज जब हम बाबा
साहेब की पूजा करते हैं, तो अनजाने में उसी ब्राह्मणवादी ढांचे का पुनरुत्पादन कर रहे होते हैं।
यह कैसी विडंबना है कि जिसने पूजा को तोड़ा, हम उसकी ही पूजा करने लगते हैं? - मूर्ति-पूजन का राजनीतिक लाभ: विचारों से डरने वालों की चाल: राजनेता और
सत्ता-तंत्र भी यही चाहते हैं कि – अंबेडकर को पूजा का विषय बना दिया जाए, ताकि लोग
उनकी क्रांतिकारी चेतना को भूल जाएं। इसलिए:
बाबा साहेब की मूर्तियाँ लगाना मंजूर है,
आरक्षण पर बोलना नहीं,
संविधान बचाने की बात करना खतरनाक है तथा जाति-उन्मूलन की मांग करना
“देशद्रोह” हो जाता है।
जब आप पूजा करते हैं, तो आप सत्ता के लिए खतरनाक नहीं, अनुकूल बन जाते हैं। - बाबा साहेब के शब्दों में — क्रांति चाहिए, कर्मकांड नहीं: “Religion must
mainly be a matter of principles only. It cannot be a matter of rules.” (“धर्म
मुख्यतः सिद्धांतों का ही विषय होना चाहिए। यह नियमों का विषय नहीं हो सकता।”) धर्म या
आदर्श केवल उस समय सार्थक हैं जब वे नैतिकता और न्याय को जन्म दें। यही उनके बौद्ध धर्म
की नींव थी। परंतु आज उनके अनुयायी उनकी प्रतिमा को भगवान बुद्ध की तरह पूजने लगे हैं
— यह अंबेडकर की आत्मा के विरुद्ध है। - उनकी शिक्षाएँ आज कितनी प्रासंगिक हैं?
जब दलितों पर अत्याचार हो रहा हो,
जब आरक्षण पर हमले हो रहे हों,
जब शिक्षा प्रणाली का निजीकरण हो रहा हो,
जब संविधान की मूल भावना खतरे में हो,
इसलिए हमें बाबा साहेब की पूजा नहीं, उनके विचारों का कार्यरूप में परिवर्तित करने की
जरूरत है। - विचारों का अनुकरण कैसे करें?
शिक्षा के लिए संघर्ष करें — सरकारी स्कूलों को बंद होने से रोकें।
जाति उन्मूलन की पहल करें।
जातिवादी भाषा, परंपराएं और व्यवहार का विरोध करें।
धर्म और अंधविश्वास के विरुद्ध खड़े हों — वैज्ञानिक सोच अपनाएँ।
संविधान की रक्षा करें — बोलने की आज़ादी, न्याय और समानता की गारंटी के लिए
सक्रिय हों।
संगठित हों — सिर्फ बाबा साहेब की फोटो लगाकर संगठन नहीं बनता, बल्कि ज़मीन
पर आंदोलन चाहिए।
निष्कर्षत: “मैं महान नहीं, मेरे विचार महान हैं।” — यदि बाबा साहेब आज होते, तो
शायद यही कहते।बाबा साहेब को पूजना नहीं, जीना चाहिए। उन्हें किताबों में मत बाँधो,
संघर्षों में उतारो। उनकी मूर्तियों पर फूल नहीं, उनके सपनों पर कर्म चढ़ाओ। “जय भीम” एक
नारा नहीं, चेतना है। वह केवल तब सार्थक है जब वह सड़कों पर अन्याय के खिलाफ गूंजे —
जब वह स्कूल, न्यायालय, संसद, खेत, कारखाने, और मोहल्ले तक पहुंचे।
अंतिम आह्वान: हे! भारत के नागरिकों! बाबा साहेब की पूजा न करें — उन्हें पढ़ें, समझें,
जिएं, और सबसे जरूरी — उनके दिखाए पथ पर चलें। तभी यह देश सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक,
समतामूलक और न्यायप्रिय बन सकेगा।
सारांशत: यह एक आग्रह तो किया ही जाना चाहिए–बाबा साहेब की पूजा न करें —
उन्हें ‘जीएं’, ‘जियाएँ’, ‘जगाएँ’। उनका धर्म परिवर्तन प्रतीक नहीं था, वह समाज का पुनर्निर्माण
था। उनकी संविधान-रचना कर्मकांड नहीं थी, बल्कि दलितों की मुक्ति की युक्ति थी। यदि आप
वास्तव में बाबा साहेब को मानते हैं, तो उनकी हर बात को संघर्ष और संगठन के रूप में जीवन
में उतारें — यही उनका सच्चा सम्मान है। यथोक्त के आलोक में यह कहना कतई जायज है कि
आज जब हम बाबा साहेब की मूर्तियों पर माला चढ़ा रहे हैं, जयंती मना रहे हैं, “जय भीम” के
नारे लगा रहे हैं — तो हमें रुककर यह भी सोचना होगा कि क्या हम उनके विचारों को अपने
जीवन में उतार रहे हैं? या सिर्फ श्रद्धा के आवरण में उस विद्रोही चेतना को दबा रहे हैं, जिसने
समाज की सबसे सड़ी-गली परंपराओं को तोड़ा था?
डॉ. अंबेडकर ने कभी नहीं कहा कि उन्हें पूजो। उन्होंने कहा था — “Educate,
Agitate, Organize.” उन्होंने बुद्ध की तरह अंधविश्वास को ठुकराया, उन्होंने गांधी की तरह
प्रतीकों की राजनीति नहीं की, उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि बदलाव सिर्फ पूजा से
नहीं, संघर्ष और संगठन से आता है। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम बाबा साहेब को
मंदिरों और मूर्तियों से निकालकर स्कूलों, सड़कों, संविधान और चेतना में पुनर्स्थापित करें।
उनकी पूजा मत करो — उन्हें जियो। उनके विचारों को पढ़ो, समझो, और समाज में लागू करो।
यही सच्चा “जय भीम” होगा।
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