मुनेश त्यागी
अफगानिस्तान एक बार फिर तालिबान की गिरफ्त में है, यह अमेरिका की करारी शिकस्त है। अफगानिस्तान की सेना ने हथियार डाल दिए हैं। राष्ट्रपति अफगानिस्तान छोड़कर भाग गया है। अमेरिका और नाटो की सेनाएं तालिबान का सफाया करने में नाकाम रही हैं। अमेरिका ने 20 खरब डॉलर खर्च किए, नाटो के अफगानिस्तान में 1,30,000 सैनिक तैनात किए थे। यूके और यूरोप द्वारा खर्च धनराशि इसमें शामिल नहीं है।
पिछले 20 वर्षों में अमेरिकी शासन के हमलोंमें हजारों अफगानिस्तान नागरिक मारे गए हैं। यह आतंक के खिलाफ युद्ध नहीं था बल्कि धर्मांध और धार्मिक कट्टरपंथियों को सत्ता में बैठाना था। अमेरिका ने 20 साल में यही किया है। उसने इस क्षेत्र की प्रगतिशील, जनवादी और समाजवादी मूल्यों की ताकतों को उखाड़ फेंका है और उसके स्थान पर धर्मांध और धार्मिक कट्टरपंथियों को सत्ता में बिठा दिया है। ये धर्मनिरपेक्ष राज्य ,,,,इराक, लीबिया और सीरिया के खिलाफ हमले थे, वहां प्रतिक्रियावादी ताकतों को सत्ता में बैठाना था। तालिबान, अलकायदा, मुजाहिदीन, ओसामा बिन लादेन, आईएसआईएस, इस्लामिक राष्ट्र और दूसरे धर्मांध संगठनों को अमेरिका और उसके सहयोगियों ने खड़ा किया था। आज यह सब जन विरोधी संगठन अपने-अपने देशों में सत्ता संभाले हुए हैं, सत्ता में बैठे हुए हैं। अमेरिका ने उन्हीं के निजाम कायम किए थे। यह सब अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रभाव को आगे बढ़ाने के लिए किया गया था।
इराक, लीबिया और सीरिया के प्रगतिशील मूल्यों पर झूठ बोलकर, वहां हमले करके, उन्हें खत्म करके वहां प्रतिक्रियावादी धार्मिक कट्टरपंथी ताकतों को पाला पोसा गया और अब उन्हें सत्ता में बैठा दिया गया है। साम्राज्यवादी हमले और आतंकवाद साथ साथ चलते रहे और प्रगतिशील निजामों पर तरह-तरह के बहाने बनाकर हमले किए जाते रहे।
अफगानिस्तान में तालिबान का आना अमरीकी साम्राज्यवाद की बुरी पराजय है। अमरीका ने तालिबान को नेशनाबूद करने के लिए कुछ नहीं किया, इनके खिलाफ कोई मोर्चा नहीं बनाया, इन को समाप्त करने की कोई नीति नहीं थी बल्कि अब तो समझ में आता है कि अमेरिका ने ही इनको खड़ा किया था। दरअसल अमेरिका दक्षिण एशिया और एशिया के मुस्लिम देशों और इलाकों को अस्थिर करना चाहता है ताकि वहां की जनता जनतंत्र,समता, समानता, कानून के राज, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के रास्ते पर न चलें। इन सभी इलाकों में अमेरिका की यही नीतियां रही हैं। तालिबान के आने से उसकी नीतियों को बल मिलेगा,इन क्षेत्रों में और देशों में धर्मांधता और कट्टरपंथी ताकतों के गठजोड़ मजबूत होंगे, प्रतिक्रियावाद बढ़ेगा, प्रगतिशील मूल्यों पर हमले बढ़ने की और आशंकाएं पैदा हो गई हैं। इन साम्प्रदायिक और धर्मांध व अंध-राष्ट्रवादी तत्वों का मकसद जनता की बुनियादी समस्याओं जैसे,,, रोटी, रोजी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा को सुलझाने में इनकी कोई भूमिका नहीं है। हालात बता रहे हैं कि यह जन विरोधी ताकतें मानवाधिकारों पर, औरतों पर और तेज हमले करेंगी। ये ताकतें अपने-अपने देशों को डेढ़ डेढ़ हजार साल पहले की जंगली, बर्बर और असभ्य अवस्था में ले जाएंगी। यहां भारत को अपने हितों को देखते हुए अमेरिकी खेमे को छोड़कर बाहर आने की जरूरत है क्योंकि अमेरिका के खेमे में रहते हुए भारत अपने हितों की रक्षा नहीं कर सकता, अपने नागरिकों के हितों की रक्षा नहीं कर सकता। यहां पर भारत को रूस और चीन की तरह अपनी स्वतंत्र नीति अपनानी होगी और देश और अपनी जनता को इन जनविरोधी ताकतों के हमलों से बचाना होगा।





