अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

आणव’मल है जन्म-जन्मान्तर की पीड़ा का मूल*

Share

डॉ. विकास मानव 

 तंत्रदर्शन के अनुसार अनुग्रहात्मिका शक्ति के दो रूप हैं–काली और तारा। मानव शरीर में मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी के रूप में काली सुप्त अवस्था में विद्यमान है। इसी प्रकार आज्ञाचक्र में नील ज्योति के रूप में तारा विराजमान है।

     तारा का यांत्रिक स्वरूप उर्ध्व त्रिकोण का ध्यान आज्ञाचक्र में करने से अज्ञान का नाश होता है और मन अंतर्मुखी होता है।

      काली का यांत्रिक स्वरूप अधोमुख त्रिकोण है जिसका ध्यान मूलाधार में करने से माँ काली की अहेतु की कृपा प्राप्त होती है। कुण्डलिनी काली का लाक्षणिक नाम है। शक्तिपात दीक्षा प्राप्त होने पर कुण्डलिनी का जागरण और क्रमशः उत्थान होता है जिसके फलस्वरूप आणवमल का होता है प्रणास।

      तंत्र सबसे पहले आणवमल को महत्व देता है। उसके बाद महत्व देता है शरीर को। तंत्र का कहना है कि जब तक दिव्य शरीर की उपलब्धि नहीं होती, तब तक जीवन से मुक्त होना संभव नहीं।

     जिस शरीर में रोग उत्पन्न होता है, जिस शरीर में नाना प्रकार की व्याधियां उत्पन्न होती हैं, जो साधारण से साधारण कार्य करने में अशक्त बना देती हैं, भला उस शरीर से कोई साधना-उपासना हो सकती है ? योगाभ्यास हो सकता है ? पूजा-अर्चना में मन एकाग्र हो सकता है ?   

        इष्ट-सामीप्य लाभ हो सकता है और प्राप्त हो सकती है जीवन से मुक्ति ? असंभव,  ऐसे शरीर से कभी भी दुःख-कष्ट की निवृत्ति नहीं हो सकती। इसीलिए तंत्र का कहना है कि सर्वप्रथम शरीर को रोग-व्याधि रहित पूर्ण स्वस्थ बनाना अति आवश्यक है। इसी को तंत्र में कहते हैं-

“पिण्डस्थैर्य”(शरीर की स्थिरता)।

      तंत्र-साधना का पहला चरण जीवन-मुक्ति है। मुक्ति ज्ञान से प्राप्त होती है और अभ्यास के लिए स्थिर शरीर आवश्यक है अर्थात् पूर्णरूपसे शारीरिक और मानसिक रूप से स्थिर।

     शरीर भौतिक तत्वों से बना है। यह एक प्राकृतिक यंत्र के आलावा और कुछ नहीं है। आत्मा से शरीर का सम्बन्ध जोड़ने वाला एकमात्र ‘प्राण’ है। इस सूत्र के टूट जाने पर शरीर और आत्मा का सम्बन्ध हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।

       इसी अवस्था को मृत्यु कहते हैं। सूत्र मजबूत रहे। उसमें किसी भी प्रकार का विकार उत्पन्न न हो। उसका प्रवाह प्राकृतिक रूप से बराबर होता रहे–इसी के लिए प्राणायाम आवश्यक है और उससे सम्बंधित आसन भी।

     मनुष्य की योगदृष्टि से तीन मुख्य अवस्थाएं हैं–5 वर्ष से 25 वर्ष–यह पहली अवस्था है। इससे सम्बंधित 16 प्रकार के प्राणायाम और 16 प्रकार के आसन हैं।

       26 वर्ष से 46 वर्ष –यह दूसरी अवस्था है। इस अवस्था से सम्बंधित 12 प्रकार का प्राणायाम और 12 प्रकार के आसन हैं। 47 से 57 वर्ष –यह तीसरी अवस्था है। इस अवस्था से सम्बंधित 5 प्रकार के प्राणायाम और 5 प्रकार के आसन हैं।

        57 वर्ष की आयु के बाद प्राणायाम और आसन वर्जित हैं। श्वासरोग और गठिया की आशंका रहती है। इस अवस्था में केवल सुखासन और ध्यान सर्वोत्तम है।

शरीर लौकिक है और उसे स्थिर बनाये रखने के लिए लौकिक उपाय ही होना चाहिए और वह लौकिक उपाय है–“पारद”। पारद का प्रचलित नाम है पारा। पारद भस्म के सेवन से शरीर स्थाई रूप से निरोग, स्वस्थ और दिव्य हो जाता है। काल का भी प्रभाव उस पर नहीं पड़ता।

        पारद की सार्थकता इस बात में है कि संसार के सभी दुखों से मुक्त कर भवसागर के पार पहुंचा देता है। पार पहुंचा देने की अवस्था देने वाले को ‘पारद’ कहते हैं। इसीलिए इसे ‘पारद’ की संज्ञा प्रदान की गई है।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें