अग्नि आलोक
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बदलनी होगी औरत विरोधी सोच 

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मुनेश त्यागी

औरत ने जनम दिया मर्दों को
मर्दों ने उसे बाजार दिया ,
जब जी चाहा मसला कुचला
जब जी चाहा दुत्कार दिया।

भारतीय समाज में पुरातन काल से ही औरतों को साम्राज्ञी, जननी, गृहस्वामिनी ,सरस्वती और  लक्ष्मी की  उपाधियों से नवाजा जाता रहा है। आधुनिक काल में उसे ब्रह्मांड सुंदरी, विश्व सुंदरी, नगर एवं कस्बा सुंदरी भी कहा जाने लगा है।आज  स्त्री विमर्श एवं महिला मुक्ति और सशक्तिकरण की मांग हो रही है। 
 उसकी सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ कानून बनाए गए हैं लेकिन पिछले काफी समय से देखा जा रहा है कि औरत विरोधी अपराधों की बाढ़ सी आ गई है। राष्ट्रीय अपराध सांख्यिकी रिपोर्ट के हिसाब से औरतों के खिलाफ बलात्कार, छेड़छाड़, दहेज दहन ,वधू दहन, भ्रूण हत्या और ओनर किलिंग की घटनाओं ने विकराल रूप धारण कर लिया है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में रोजाना 7000 से अधिक बालिका भ्रूण हत्या की जा रही है।
  आखिर क्या कारण है कि इतने सारे कानून एवं विमर्श होने  के बाद भी औरत को पुरुष के बराबर दर्जा नहीं मिल पाया है? दरअसल मानवीय समाज में बहुत बड़े काल से औरत को पुरुष से कमतर ही आंका और माना गया है। बौद्धिक स्तर पर दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों और चिंतकों ने अपनी उक्तियों, टिप्पणियों और सिद्धांतों के माध्यम से उन्हें अपने से  नीचा साबित करने का प्रयास किया है। जिस किसी भी स्त्री ने वस्तुस्थिति को बदलने या अपना हक मांगने की कोशिश की तो या तो वह मारी गई या उसे कुलटा, डायन ,बदचलन, व्यभिचारिणी, रखैल या पागल ठहरा दिया गया। औरत के सुख ,खुशी या सुरक्षा के लिए कोई व्रत नियम या किसी पर्व किसी भी धर्म में निर्धारित नहीं किया गया है।
  हजारों वर्षों से औरतों में हीनता का बोध पैदा कर दिया गया है ताकि वह अपने को ही अपराधी, पापी ,अपवित्र, कमतर, धरती पर बोझ और अवांछित वस्तु मानने लगे, तरस खाने लगे, समर्पण कर दे और अधिकारों की बात भूल जाए। सभी शास्त्रों में औरत को वस्तु, रत्न और अमूल्य निधि मानकर उसे हथियाने और कब्जाने की कोशिश की है। उसे उपभोग का समान और मनोरंजन की वस्तु ही बनाया और समझा गया है। वह आज भी खुद को एक वस्तु या चीज यानी कमोडिटी ही समझती है।
   औरत काफी अर्से तक मानव की वासना की तृप्ति  का सामान बनी रही। उस का हरण किया गया, अग्नि परीक्षा और निष्कासन किया गया,जुए में लगाई गई। उस का चीर हरण किया गया, वह अबला और बाल विधवा बनी रही।  वहीं रूपजीवा  और अभितृप्ति से सिद्धि तक और मुक्ति का माध्यम बनी रही है। उसे ही मंदिरों की दीवारों पर नंगा लटकाया गया। वहीं गाय, बकरी, धन, जमीन की तरह दान में ली और दी गई है।उसे दासी की तरह खरीदा और बेचा गया। वह साम्राज्ञी,  गृह लक्ष्मी और जननी से गुलाम, देवदासी, नगरवधू और दासी ही बनती रही। 
  वहीं माता, पिता, भाई बहन और  पुत्री के सामने पर्दे बुर्के में रहने को अभिशप्त हुई वहीं आज मुनाफा कमाने की वस्तु, मनोरंजन का सामान, आइटम गर्ल, कॉल गर्ल और नग्न और  अर्धनग्न होकर देसी विदेशी मुनाफाखोरों  का सामान बेचकर उनका मुनाफा बढ़ा रही है और उनकी तिजोरियां भर रही है। शोषण के नए-नए रूप देखिए, पतन की पराकाष्ठा देखिए,,, आज हग-डे, किस-डे, प्रपोज-डे और आत्म-समर्पण-डे मनाये जा रहे हैं। 
 उसे आज भी पराया धन बताया जा रहा है। बचपन से ही उसके खिलाफ भेदभाव की शिक्षा दी जाती है। किस तरह से लड़के और लड़की में, बेटा और बेटी में भेदभाव किया जाता है हमारे  हमारे दिमागों में बचपन से ही ठूंसा जा रहा है। एक उदाहरण देखिए--- एक मां लड़के और बेटे के बारे में क्या कहती है,,,

उठो लाल अब आंखें खोलो,
पानी लाई हूं मुंह धो लो।
वहीं मां लड़की के लिए कहती है,,,,
विमला, जल्दी उठ,
गगरी उठा, पानी ला।

हकीकत यह है कि इस औरत विरोधी मानसिकता और सोच को आजादी के बरसों बाद भी बदला नहीं गया है। आज भी वही रूढियां, वहीं परंपराएं ,वही भेदभाव और वही भोग्या संस्कृति अपना काम कर रही है। परेशानी यह है कि लिंग समानता का दर्शन हमारे संविधान में लटका ही पड़ा है, वह आज भी हवाई ही बना हुआ है। इसे व्यवहार में लाए बिना स्त्री समानता की बातें और दावे बेकार और बेमानी हैं। महात्मा गांधी ने कहा था कि जिस समाज में जनसंख्या का आधा भाग गुलाम होता है यानि कि औरत, वह समाज कभी भी आजाद नहीं हो सकता।
यह कानून और व्यवस्था का प्रश्न नहीं है बल्कि यह महिला विरोधी मानसिकता और सोच का जीता जागता सवाल है। हमारे समाज में हजारों साल से फैली पितृसत्तात्मक सत्ता का और सोच का सवाल है। यह समस्या हमारे समाज सहित हमारे गीतों, कहानियों, धारावाहिकों, रीति-रिवाजों,मान्यताओं, नीतियों, सड़कों और गलियों तक में झलकती है। स्त्री का शरीर और मन सदियों से पुरुषवर्चस्व वाली सत्ता और सोच का बंधक रहा है, गुलाम रहा है। आज उसका सड़क पर चलना, होटल में खाना पीना, गहने पहन कर सड़क पर चलना दुश्वार हो गया है। यह कैसी मानसिकता है? यह कैसी समानता है? कौन सा विकास है? कैसी आजादी है? आज औरतें न पर्दे में महफूज है,न घूंघट में, न सड़क पर, न बाजार में, न रेल में, न होटल में, न थानों में, न सार्वजनिक स्थलों पर, न घर में और यहां तक कि गर्भ में भी सुरक्षित नहीं रह गई है। कम कपड़ों में भी छेडी जाती है और साडियों-बुर्कों में भी सुरक्षित नही है। भाइयों के साथ सुरक्षित नही है और ना ही पिता के साथ।
हजारों साल पुरानी इस औरत विरोधी सोच को बदलने के लिए पूरे समाज को मर्दों, महिलाओं, किसानों, मजदूरों, मेहनतकशों, छात्रों,नौजवानों, न्यायाधीशों, वैज्ञानिकों, मीडियाकर्मियों, लेखकों, बुद्धिजीवियों और वकीलों का संयुक्त अभियान चलाकर इस मानव विरोधी और महिला विरोधी मानसिक सांस्कृतिक विकृति को बदलना पड़ेगा। तमाम औरतों को यह जहनियत विकसित करनी पड़ेगी कि वे भोग्या और वस्तु या कमोडिटी नहीं बनेगी और यूज एंड थ्रो का बरसों पुराना रिवाज और गली सड़ी मानसिकता और सोच को समूल उखाड़ फेंकना पड़ेगा। उन्हें अपनी लाचारी,अनभिज्ञ्ता, अज्ञानता और बिखराव को तिलांजलि देनी पड़ेगी।
वैश्विक अनुभव बताता है एक राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में लैंगिक समता और समानता आने वाली नहीं है।इसके लिए सांस्कृतिक चेतना और विवेक मूलक एवं तर्कपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। अनेक देशों, समाजों एवं अवसरों पर यह बात साबित हो चुकी है कि अवसर मिलने पर औरतें एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकती हैं। इसके उदाहरण अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान रूस, चीन, वियतनाम, कोरिया, वेनेजुएला और पूर्व समाजवादी देश हैं। कुछ हद तक हमारे देश में भी औरतों को आगे बढ़ने का मौका मिला है। औरत पूरी तरह से आजाद हो, मनुष्य के बराबर हो, इसके लिए जरूरी है कि वह खुद को पहचाने और खुद को मेहनतकशों के साथ संगठित करे और विद्रोहिनी बने। अलग अलग रहने से, भागने और बचने से दुनिया नहीं बदलती। कितना अच्छा हो कि वह अपने आंचल और चुनरिया को इंकलाबी प्रचम बना लें। हम तो यही कहेंगे,,,,,,,

तरे चेहरे पे ये आंचल
बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आंचल को इक परचम
बना लेती तो अच्छा था ।

Ramswaroop Mantri

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