-विवेकरंजन सिंह
उन्नीस सौ नब्बे बैच की आई पी एस अनुराधा शंकर का नाम हमेशा चर्चा में रहा है। कारण, उनका गांधीवादी जीवन और उस जीवन का उनकी कार्यशैली पर प्रभाव। अनुराधा शंकर उन अधिकारियों में से रही हैं जिन्होंने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया। एक ईमानदार ऑफिसर के रूप में उन्होंने मध्य प्रदेश शासन के पुलिस विभाग में कई बड़े पदों पर रहकर न सिर्फ सेवाएं दीं बल्कि उनके चलते पुलिस विभाग की छवि में और अधिक इज़ाफ़ा ही हुआ है।विदिशा, होशंगाबाद, इंदौर और भोपाल जैसे शहरों में रहकर वे हमेशा समर्पित भाव से सेवा करती रहीं। उनकी विदाई हमेशा जनता और पुलिस को खली है और आज वो पद से सेवानिवृत्त हो गईं, मगर उनके साथ कुछ और भी बात है जो उन्हें कभी रिटायर नहीं होने देगा। वो है मां की साहित्यिक विरासत। विदित हो वे सुप्रसिद्ध कथाकार उषाकिरण खान जी की बेटी हैं। उनके साथ बीते कुछ घंटों के अनुभव से मैं अभिभूत हुआ हूं। जो साझा करने का सम्मोहन नहीं छोड़ पा रहा हूं।जिससे आप उनकी कार्यशैली ,विचार और तेवर का अंदाज़ा लगा सकते हैं….
वो भोपाल में दूसरा दिन था। मार्च का महीना। नन्द लाल सर के साथ भोपाल के साथ अन्य जनपदों का भी भ्रमण था। अब भोपाल हो घूमना एक दिन की बात तो है नहीं और उसमें भी अगर कुछ खास जगहों और कुछ खास लोगों से नहीं मिल पाए तो व्यर्थ ही है…अनुराधा शंकर जी उन नामों में सबसे ऊपर थीं। मेरी तीव्र इच्छा थी कि मैं उन्हें देखूं जिनके ईमानदारी की खबरें पढ़ता आया हूं। सुना ही था कि साहित्य से इनका गहरा लगाव है। स्पेशल डीजी ट्रेनिंग की हेड कैसी होंगी? पुलिस हैं और ऊपर से आईपीएस तो कैसा रूप होगा। जो भी तस्वीरें देखीं थीं उससे मैंने कभी उनके व्यक्तित्व का कोई ठोस अंदाज़ा नहीं लगा पाया था।
हम एक बड़े से भवन में गए। घूमते घुमाते, हर मोड़ पर नाम नोट कराते जब उनके ऑफिस के सामने पहुंचे तो देखा कि दरवाजा तो खुला है। एकाएक तो यही लगा कि शायद वो होंगी नहीं। वरना एक आईपी एस वो भी स्पेशल डीजी का कक्ष ऐसे कैसे खुला हो सकता है। एक छोटा सा छोटा अधिकारी भी जहां अपने चैंबर की कुंडी बंद रखता है और परमिशन के लिए पर्ची लिखवाता है, घंटों प्रतीक्षा करवाता है वहां इतने बड़े पद पर आसीन इस अधिकारी का चैंबर खुला हुआ। खैर तब तक मैं यह नहीं सोच पाया कि वो एक साहित्यकार की बेटी हैं। मगर जरूरी नहीं है कि वही संवेदनाएं उनमें भी हों। बहुत सी बातें दिमाग में उठीं जब तक कि मैं कमरे में प्रवेश नहीं कर गया।
प्रवेश करते ही हमें सामने की दो मुख्य कुर्सियों पर बैठने को कहा गया। जिस अंदाज में साड़ी का पल्लू लिए आपको तस्वीर में वो दिख रही हैं, बिल्कुल ऐसा ही अंदाज़ उस समय भी था। तस्वीर देखकर आप उनके व्यक्तित्व का अधिकांश अंदाजा लगा ही सकते हैं।
बहरहाल हम बैठे। पानी पिए और कार्यालय के कामों के साथ उनकी और हमारी वार्ता भी शुरू हुई। गजब की स्पष्टता बातों में। सधी हुई वक्ता। जितनी अच्छी हिंदी उतनी ही अच्छी अंग्रेजी। बीच बीच में अधिकारियों को भी निर्देश दे रही थीं, उनकी भी बातों को सुन रहीं थी, आगे के होने वाले कामों पर भी नजर बनाए हुई थी और साथ में हमसे भी संवाद कर रही थीं।
मैं सच कहूं तो मैं सिर्फ उनका चेहरा देख रहा था। मैं थोड़ा फिल्मी अंदाज़ में बोलूं तो वो मुझे किसी अभिनेत्री से कम नहीं लग रही थीं। मैं अंदाज लगा रहा था उनका वो चेहरा जब वो नौजवान आईपीएस अधिकारी बनकर पुलिस महकमे में आई होंगी। ये मेरी अपनी सोच थी, ये मेरा अपना नजरिया था। हमेशा से मुझे महिलाएं बड़े पदों (खासकर पुलिस या सेना) पर बैठी ज्यादा अच्छी लगती हैं। मैं गर्व से भर जाता हूं। मैं ये सोचता हूं कि चोर गुंडों पर जब ये लाठियां भांजती होंगी तो बेचारे क्या सोचते होंगे। मैं ऐसे ही बचकानी बातें करता हूं और सोचता हूं। बहुत उलझी बातें नहीं सोच पाता हूं। खासकर किसी के व्यक्तित्व को लेकर।
करीब एक घंटे पंद्रह मिनट की बातचीत में अनुराधा जी के साहित्य और कला प्रेम के साथ उनके गांधीवादी विचार तथा एक्टिविज्म से भी सामना हुआ। वो बदलते परिवेश को लेकर चिंतित और सजग हैं। उन्होंने उन सभी मुद्दों पर खुलकर बात की जिनपर अमूमन सरकारी महकमे के लोग बात करने से कतराते हैं भय में रहते हैं कि उनकी नौकरी न चली जाए। उनका प्रशासनिक तेवर भी कभी कम नहीं रहा। छिपाव का भाव नहीं है उनमें। जैसी हैं जो हैं सबके सामने हैं। उनके तबादले पर रोने वाले सैकड़ों पुलिस और जनता के लोग हैं,जिनको उन्होंने हमेशा बच्चों जैसा प्यार दिया। मां उषाकिरण खान की साहित्य विरासत को आगे बढ़ाने में लगी हैं। जीवन मूल्यों को अच्छे से समझती हैं।
एक और बात जो उनके व्यक्तित्व को और निखारती है वो है उनके बातचीत में उनकी मैथिली माटी की महक। उन्हें लोकगीतों और लोक व्यवहारों की अच्छी समझ भी है। वो ठेठ गंवई भी हो जाती हैं और निपट शहरी भी। उनकी बातों में साफ झलकता है कि वो लोकमन को कितना नजदीक से समझती हैं। यही कारण रहा कि अपनी सेवा के दौरान वो खुद जमीनी स्तर पर जाकर लोगों के सुख दुख में सहचर बनी रहीं। शांति में भी एक क्रांति छिपी होती है,ये बात उनके व्यक्तित्व पर सटीक बैठती है। प्रशासनिक सेवा में रहकर भी वो अपने साहित्यिक और कलात्मक अभिरुचियों को जिंदा रखे रहीं।
समाजसेवा हो या फिर व्याख्यान, वो हमेशा सक्रिय रहती हैं। साहित्य जगत के लोगों की उन्हें सुध रहती हैं। आज भले ही वो पद से सेवानिवृत्त हो रही हैं मगर अब आगे का सफर उनके लिए और भी सुनहरा हो ऐसी हम सबकी कामना है। उनके प्रशासनिक अनुभवों से बहुतों को सीख लेने की आवश्यकता हैं। अनुराधा शंकर जैसा व्यक्तित्व कभी भी रिटायर नहीं होता बल्कि वो एक नए सफर पर निकलता है,जिससे पथ में मिलने वाले लोग लाभान्वित होते हैं।





