ज्योतिषाचार्य पवन कुमार (वाराणसी)
_आर्य ख़ुद को बाहरी नहीं, भारतीय सावित करने की जदोजहद में लगे रहते हैं. लेकिन वेदों की भाषा को पुरानी संस्कृत कहा जाता है। लेकिन असल में वों संस्कृत नहीं है। वेदों की भाषा और ईरान की भाषा अवेस्ता में एक ही मुख्य फर्क है।_
अवेस्ता में स या श के बदले में ह लिखा जाता है। बाकी लगभग सारे शब्द वेदों की भाषा के साथ मिलते-जुलते हैं। वेदों में गाथा हैं, अवेस्ता में भी गाथा हैं। वेद की भाषा संस्कृत तो कतई नहीं है।
हां, लिपि तो अब सबकी नागरी ही हो गई है। वेद की भाषा को पहले छान्दस कहा जाता था। यह तो हर कोई स्वीकार करेगा कि वेद पाणिनि कृत संस्कृत से सदियों पुराने हैं।
_दरअसल, तीन-चार हज़ार साल पहले के ईरान, अरियन या आर्यन (प्राचीन अरबी लिपि के अनुसार) देश की सीमा और प्राचीन बृहत्तर भारत की सीमा एक दूसरे से मिली हुई थी। धर्म और जीवनचर्या के मामले में वे एक-दूसरे से अलग नहीं थे।_
दोनों अग्नि पूजक थे और जनेऊ पहनते थे। भले ही जनेऊ की मोटाई आजकल अलग दीखती है।पालि में श, ष, क्ष, ज्ञ, श्र, ऋ और त्र शब्द नहीं होते। साथ ही उसके स्वरों में औ, ऐ और अ: भी नहीं शामिल है। पालि में कुल 41 अक्षर हैं – आठ स्वर और 33 व्यंजन।
संस्कृत और हिंदी की वर्णमाला में कुल दस अक्षर और जोड़ दिए गए। साथ ही ळ भी कभी-कभी उसमें शामिल बताया जाता है। हालांकि ळ का प्रयोग गुजराती और मराठी में ज्यादा होता है। मसलन, हम जिसे टिटवाला बोलते हैं, वह असल में टिटवाळा है।
{चेतना विकास मिशन}





