अग्नि आलोक
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जब तक साम्राज्यवाद जिंदा है, युद्ध जारी रहेगा

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विवेक कुमार

विद्रोह के हर कदम उठने पर
सलाह दी जाती है कि
शांति बनाये रखो,सब
ठीक हो जायेगा।
लेकिन ज्ञात है कि
शांति से कुछ नहीं
ठीक होता।
बस शान्ति से भूख से
मरते बच्चे दम तोड़ते हैं
शान्ति से कर्ज में डूबे
किसान गले में रस्सी कस
लेते हैं।
शांति से आदिवासियों
की जमीन हड़प ली जाती है
शान्ति से एक महिला का
बलात्कार कर दिया जाता है।
शान्ति से बेरोजगारी में लोग
आत्महत्या कर लेते हैं।
शांति से एक दलित जातिव्यवस्था
का शिकार हो जाता है
शान्ति से एक महिला की सारी
स्वतंत्रताएं दबा दी जाती हैं।
शान्ति से एक मज़दूर की मज़दूरी
हड़प ली जाती है
शान्ति से एक महिला वेश्या बना
दी जाती है।
शान्ति से एक गरीब को भिखारी
बना दिया जाता है।
शांति से हर उठती आवाज को
दबा दिया जाता है।
शांति से आसमान में उठती मुठ्ठी
को हथकड़ियों में जकड़ दिया जाता है
शान्ति से एक राजा ,राजा बना रहता है
और एक पूंजीपति पूंजीपति।
शान्ति से बस अँधेरे में हमारी ऑंखें
टिमटिमा सकती हैं।
लेकिन विद्रोह हमारी हर बेड़ियों
को तोड़ सकता है।

विवेक कुमार

20वीं सदी के अंतिम बरसों में जब येल्तसिन के नेतृत्व में सोवियत संघ को विघटित कर रूस अमेरिका तथा अन्य साम्राज्यवादी सरगना G-7 के नए मेंबर के रूप में शामिल होकर G–8 का निर्माण कर रहा था, तब लेनिन के सम्राज्यवाद की चरित्र की व्याख्या को बहुतेरे  पूंजीवादी जनतंत्र के पुजारी मार्क्सवाद लेनिनवाद तथा समाजवाद के महत्व का उपहास करते हुए पूंजीवादी लोकतंत्र का महिमा मंडन करते अघाते नहीं थे। आज वही पूंजीवादी लोकतंत्र जिसमें पूंजी के मालिक तय करते हैं कि अगली सरकार कौन चलाएगा, आपस में युद्ध कर रहे हैं। यह युद्ध पहला नहीं है और पूंजीवादी लोकतंत्र में पूंजी के मालिकों के बाजार के वर्चस्व के लिए जारी लड़ाई में यह अंतिम युद्ध भी नहीं होगा। भविष्य में अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग गुटों का निर्माण होगा और बाजार पर नियंत्रण के लिए युद्ध लड़ते रहे जाएंगे। इसीलिए लेनिन ने प्रथम विश्व युद्ध के समय नारा दिया था कि विश्व युद्ध को जन युद्ध में बदल दो और  मेहनतकशों के राज्य को स्थापित करो। आज एक बार फिर जब रूसी साम्राज्यवाद को अमेरिका के नेतृत्व में चलने वाली साम्राज्यवाद के g-7 के द्वारा विश्व बाजार में दो दशक पहले भागीदारी देने के किए गए वायदे के अनुसार हिस्सेदारी देने के लिए तैयार नहीं है और पहले से ही उसके प्रभाव वाले सोवियत संघ के देशों को भी  पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेने की साजिश रच रहे हैं, तब दूसरे साम्राज्यवादी देश का शासक हमले पर उतर आया है। इस हमले में निश्चय ही यूक्रेन और साथ ही रूस की जनता को परेशानियां झेलनी पड़ रही है। लेकिन भौतिक स्थिति से जो मानव समाज की चेतना का विकास होता है, आज पूरी दुनिया के साथ साथ ऊक्रेन तथा रूस की जनता को भी सोचने के लिए बाध्य करेगी कि यह युद्ध आखिर क्यों लड़ा जा रहा है?हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि इस युद्ध के बाद रूस विश्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में पहले की तरह बने रहने की स्थिति में नहीं रहेगा। इस युद्ध में जनता के साथ- साथ रूसी पूंजीपतियों को भी घाटा होने जा रहा है और निश्चय ही वे पुतिन पर युद्ध को जल्दी से निबटने के लिए दबाव बनाएंगे। लेकिन युद्ध हमेशा शासकों की मनमर्जी के अनुसार नहीं चलता है। ऐसी स्थिति में गुजरते समय के साथ रूस के अंदर अंदरुनी विरोध भी बढ़ेगा, साथ ही यूरोप के अंदर युद्ध को आगे ना फैलाने का दबाव  बनेगा। नैटो के देशों के लिए इतना आसान नहीं है कि यूरोप को वे युद्ध के अखाड़े में बदल दें। इसलिए यूक्रेन पर रूसी हमला का विरोध करने के साथ-साथ यूरोप तथा अमेरिका के मेहनतकशों को अपने शासक वर्गों के हथियार बेचने और बाजार पर कब्जा करने के लिए युद्ध भड़काने की साजिश के खिलाफ आवाज उठाना चाहिए। अपने- अपने देशों के साम्राज्यवादियों के युद्धबिपाशा राजनीति को पर्दाफाश करना चाहिए। युद्ध विरोधी आंदोलन निश्चय ही पूरी दुनिया में एक नयी बहस को आगे लाएगा।  यदि यह बहस पूंजीवाद के छद्म राष्ट्रवाद और ताकतवर देशों के वर्चस्ववाद वाली मानसिकता की तरफ गयी तो, दुनिया को तबाह होने से बचाना मुश्किल है। लेकिन यदि यह वैचारिक बहस युद्ध की जड़ में पूंजीवाद के बाजार और मुनाफा के चरित्र को नंगा करेगी और जो जन आंदोलन खड़ा होगा, तो वह पूंजीवाद को चुनौती दे सकेगा और युद्ध को रोकने में समर्थ होगा।
*नरेंद्र कुमार*

Ramswaroop Mantri

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