शैलेन्द्र चौहान
बीत नहीं रहा
घिसट रहा है जीवन
जैसे किसी ज़ंग लगी रेल पर
फँसा डिब्बा
जिसकी खिड़कियों से
दृश्य नहीं
सिर्फ़ बीते मौसमों की धूल
अंदर गिरती है
पतझड़ विहंसता है
रिसता हुआ समय
सुबह की ओस
रात की थकान को
धो नहीं पाती
बस हड्डियों तक
ठंडा कर देती है
दिन ढलता है
हर रोज़
किसी बुझते दीपक की
अंतिम काँपती लौ की तरह
जो न हवा से डरती है
न तेल की प्रतीक्षा करती है
बस
अपने ही धुएँ में
धीरे-धीरे
काली हो जाती है
बीत गया और एक वर्ष
मुरझाए फूल
झरते पात
घर की दीवारों में उगी
सीलन की नसें
सब मिलकर
चेहरे पर
समय की कठोर लिपि
उकेरते हैं
दुश्मनी निभाती है
हर शै
ये झुर्रियाँ नहीं
ये वे वाक्य हैं
जो कभी कहे नहीं गए
अधूरे, दबे हुए
कंठ में अटके
शब्द
जो अब
मेरी त्वचा
पढ़ रही है
आईना अंधा नहीं होता
हर सुबह
उसकी आँखें खुली होती हैं
वह
देखने की ज़िम्मेदारी
मुझ पर छोड़ देता है
और खुद
चुप्पी ओढ़ लेता है
उम्र चढ़ती जाती है
किसी अदृश्य सीढ़ी पर
जिसके पायदान
गिने नहीं जाते
वे
टूटते हैं
हर साँस के साथ,
नीचे
अंधेरा
और गाढ़ा होता जाता है
यह सीढ़ी नहीं
बल्कि गिरने की
धीमी
सहज प्रक्रिया है
जिसमें शरीर
पहले थकता है
फिर स्मृति,
और अंत में
आवाज़
स्मृतियाँ अब
नहीं रहीं ताज़ा
वे धूप में पड़े
पुराने काग़ज़ हैं
जिन पर लिखे नाम
धुँधला गए हैं,
और ज़रा-सी हवा
उन्हें
चरमराकर
बिखेर देना चाहती है
भीतर कहीं
अब भी
एक मद्धम स्पंदन है
जैसे
बहुत गहरे दबा
कोई रोता हुआ प्रश्न
वह पूछता नहीं
सिर्फ़
धड़कता है
साँसों के जाल में
अब भी
फँसी है
एक अधूरी चाह
जैसे मकड़ी के जाले में
फड़फड़ाता
एक कीड़ा
जिसे पता है
उड़ान अब
संभव नहीं
शाम उतरती है
धीरे-धीरे
मेरे भीतर
और मैं
दिन को विदा करते हुए
खुद से कहता हूँ
अभी पूरी तरह
टूटना
बाक़ी है
मो.7838897877






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