अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

मनुवाद की जड़ों पर वार और आत्म परिवर्तन का आह्वान

Share

(राहुल नागपाल और दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद के बीच संवाद पर आधारित)

-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          आज का समाज धर्म और जाति की मीठी चासनी में इस कदर लिपट चुका है कि उसे अपनी ही बेड़ियाँ दिखाई नहीं देतीं। नीरज भाई ने अपने भाषण में इसी गहरी मानसिक गुलामी पर चोट की। उनका कहना था कि ब्राह्मणों की जगह यादव या कुर्मी पुरोहित बना देने से मनुवाद खत्म नहीं होगा, क्योंकि यह समस्या व्यक्ति नहीं, विचार की है। “हमने जिनके साथ खड़ा होना था, उनके पैरों में सिर झुका लिया,” उन्होंने कहा, “यही मानसिक गुलामी की जड़ है।”

          समाज में व्याप्त जातिगत और धार्मिक असमानताओं पर बोलते हुए नीरज भाई ने कहा कि अब वक्त आ गया है जब हमें अपने अंदर झाँकना होगा। उन्होंने सवाल उठाया — “क्या सिर्फ़ पुरोहित बदल देने से ब्राह्मणवाद खत्म हो जाएगा? क्या ब्राह्मण की जगह यादव, कुर्मी या पटेल पुरोहित बना देने से मनुवाद की जड़ें हिल जाएगी?” उनके मुताबिक नहीं। क्योंकि यह लड़ाई व्यक्ति या समुदाय की नहीं, बल्कि सोच और व्यवस्था की है — वह व्यवस्था जो सदियों से दिमाग़ में जकड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि हमने जिनके साथ बराबरी से खड़ा होना था, उनके पैरों में सिर झुका लिया। यही असली गुलामी है — मानसिक गुलामी।

धर्म का बाजार और हमारी भूमिका:

          नीरज भाई ने समाज की उपभोक्ता भूमिका पर ज़ोर देते हुए कहा कि धार्मिक व्यवसाय तब तक फलते-फूलते रहेंगे जब तक हम उपभोक्ता बने रहेंगे। “यकीन मानिए,” उन्होंने कहा, “जिस दिन खाने-पीने के स्टॉल्स पर जाने वाली भीड़ उन नकली कथा-वाचकों के स्टॉल्स पर जाना बंद कर देगी, उसी दिन धर्म की दुकानें बंद हो जाएँगी।” उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि धर्म आज सेवा नहीं, बल्कि उद्योग बन गया है — एक ऐसा उद्योग जिसमें अंधविश्वास और भय ही कच्चा माल हैं। उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा, “अगर तुम्हारा ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो फिर बीमा क्यों करवाते हो? अगर ज्ञान की देवी पर भरोसा है तो बच्चों को मिशनरी स्कूलों में क्यों पढ़ाते हो?” यह प्रश्न केवल धर्म के प्रति नहीं था, बल्कि हमारे दोहरे आचरण पर एक करारा प्रहार था।

          नीरज भाई ने समाज को आइना दिखाते हुए कहा कि धर्म आज उद्योग बन चुका है, और हम सब उसके ग्राहक हैं। “जिस दिन नकली कथा-वाचकों के स्टॉल पर भीड़ जाना बंद कर देगी, उसी दिन धर्म की दुकानें बंद हो जाएँगी,” उन्होंने कहा। यह तंज सिर्फ़ पुरोहितों या धर्मगुरुओं पर नहीं, बल्कि आम जनता पर था — जो अंधभक्ति में अपनी समझ गिरवी रख देती है। उन्होंने हमारे दोहरे जीवन पर भी सवाल उठाया। “अगर तुम्हें ईसा मसीह पर विश्वास है तो इलाज़ के लिए अस्पताल क्यों भागते हो? अगर ज्ञान की देवी पर भरोसा है तो बच्चों को मिशनरी स्कूलों में क्यों भेजते हो?” धर्म के नाम पर डर फैलाने वाली इस मानसिकता को तोड़ना, उनके अनुसार, असली क्रांति की शुरुआत है।

राजनीति बनाम सामाजिक परिवर्तन:

          कांशीराम साहब के विचारों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा, “राजनीति हर ताले की चाबी है,” परंतु यह चाबी तब तक बेअसर है जब तक सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन न हो। उन्होंने झाँसी की एक घटना का ज़िक्र किया — जहाँ एक यादव सिपाही और एक पटेल उप-निरीक्षक की शादी के विरोध में फतवा जारी कर दिया गया। “जब राजनीतिक परिवर्तन हो चुका है, तब  भी  अगर  सामाजिक  सोच  नहीं बदली, तो यह अधूरा बदलाव है,” उन्होंने कहा। नीरज भाई का तर्क था कि हमें सिर्फ़ राजनीति नहीं, बल्कि समाज की मानसिक संरचना बदलनी होगी। “मैं यह नहीं कहता कि राजनीति ज़रूरी नहीं,” उन्होंने कहा, “पर यह भी ज़रूरी है कि समाज सोचने लगे, सवाल करने लगे।”

आचरण की कसौटी और असली संविधानवाद:

          उन्होंने कहा कि आज हर नेता संविधान की बातें करता है, पर असली संविधानवादी वही है जो अपने आचरण में संविधान को जीता है। “भाषण देना आसान है,” उन्होंने कहा, “पर लोग आपके शब्दों से ज़्यादा आपके आचरण को देखते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि आज प्रतीकों की राजनीति अपने चरम पर है। हर समुदाय अपने-अपने नायकों की जयंती मनाता है, पर साल के बाकी दिनों में वही पुरानी सोच और भेदभाव कायम रहता है। “जागरूकता जयंती के दिन नहीं, रोज़ के जीवन में दिखनी चाहिए,” उन्होंने कहा। “अगर यादव समाज कर्पूरी ठाकुर को, पटेल समाज बाबू जगदेव प्रसाद को, और मौर्य समाज संत राम को रोज़ याद करने लगे, तो असली बदलाव दिखेगा।”

परिवार और समाज – बदलाव की पहली प्रयोगशाला:

          कांशीराम साहब को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि राजनीति हर ताले की चाबी ज़रूर है, पर अगर सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन साथ न हो, तो वह बेअसर है। उन्होंने झाँसी की एक घटना का उल्लेख किया — जहाँ एक यादव सिपाही और एक पटेल उप-निरीक्षक की शादी के विरोध में फ़तवा जारी कर दिया गया। “जब राजनीतिक सत्ता हमारे पास है, फिर भी सामाजिक सोच नहीं बदली, तो समझो बदलाव अधूरा है,” उन्होंने कहा। राजनीति सत्ता देती है, पर समाजिक चेतना ही उसे टिकाऊ बनाती है। यही कारण है कि उन्होंने ज़ोर दिया कि असली संघर्ष मन की बेड़ियां तोड़ने का है।

          भाषण का सबसे भावनात्मक हिस्सा तब आया जब उन्होंने आयोजकों से पूछा, “यहाँ कितने लोग अपनी पत्नियों और बच्चों को लेकर आए हैं?” उनका कहना था कि क्रांति केवल पुरुषों के मंचों तक सीमित न रहे। “हम कहते हैं कि हम बदल गए हैं, पर हमारी पत्नियाँ और बच्चे नहीं बदल रहे। क्या हमने कभी कोशिश की कि वे भी सुनें, समझें और सवाल करें?”उन्होंने सावित्रीबाई फुले का उदाहरण देते हुए कहा कि हमें अपने घर की स्त्रियों और बच्चों को इन आयोजनों में शामिल करना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी में यह चेतना स्वाभाविक रूप से जन्म ले।  उन्होंने आयोजकों और श्रोताओं से एक सीधा सवाल पूछा — “कितने लोग अपनी पत्नियों और बच्चों को लेकर आए हैं?” उनका संदेश स्पष्ट था: क्रांति घर से शुरू होती है। “हम कहते हैं कि हम जागरूक हैं, लेकिन हमारी पत्नियाँ और बच्चे नहीं। क्या हमने उन्हें इस जागरूकता में शामिल करने की कोशिश की?” नीरज भाई का मानना है कि जब तक परिवार के भीतर चेतना नहीं पहुँचेगी, समाज के बाहर का आंदोलन अधूरा रहेगा।

धर्म और राजनीति का दोहरापन:                                                                      

          नीरज भाई ने दोहराया कि धर्म का व्यापार और राजनीति की चाल दोनों ही तब तक चलते रहेंगे जब तक जनता भ्रमित रहेगी। उन्होंने कहा, “जो लोग ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ की बात करते हैं, उनके बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढ़ते हैं। जो आपको स्वदेशी का उपदेश देते हैं, उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं।” उनके अनुसार, यह दोहरा चरित्र ही असली समस्या है — और इसे तोड़ने का एकमात्र तरीका है आत्मचिंतन और आत्मक्रांति

          उन्होंने समाज के पाखंड को उजागर करते हुए कहा, “जो लोग ‘हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान’ की बातें करते हैं, उनके बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ते हैं। जो स्वदेशी का नारा लगाते हैं, उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं।” उन्होंने कहा कि जब तक हम दूसरों के दोहरेपन पर ताली बजाते रहेंगे और अपने भीतर झाँकने से डरेंगे, तब तक कोई बदलाव नहीं होगा

सहयोग की शक्ति – शाहूजी महाराज का उदाहरण:

          लेख के अंत में उन्होंने शाहूजी महाराज का उदाहरण दिया, जिन्होंने बाबासाहेब आंबेडकर को पहचानकर आगे बढ़ाया था। उन्होंने कहा, “कोई भी व्यक्ति बड़ा इसलिए नहीं बनता कि वह खुद आगे बढ़े, बल्कि इसलिए कि वह किसी और को आगे बढ़ने में सहयोग दे।”यह सहयोग ही असली सामाजिक शक्ति है — और यही वह भावना है जो हर व्यक्ति को अपने मोहल्ले, गली और समाज में लागू करनी चाहिए।

          उन्होंने छत्रपति शाहूजी महाराज को याद करते हुए कहा कि अगर उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर को पहचानकर आगे नहीं बढ़ाया होता, तो शायद इतिहास अलग होता। “कोई व्यक्ति बड़ा तब बनता है जब वह किसी और को आगे बढ़ने देता है,” उन्होंने कहा। यह ‘सहयोग’ ही सामाजिक शक्ति का सबसे पवित्र रूप है।

आचरण ही असली संविधानवाद:

          आज हर नेता संविधान की बातें करता है, लेकिन नीरज भाई के अनुसार असली संविधानवादी वही है जो उसे अपने जीवन में उतारे। “भाषण से नहीं, आचरण से बदलाव आता है,” उन्होंने कहा। उनके शब्दों में, “जागरूकता तब नहीं दिखती जब जयंती पर फूल चढ़ाते हैं, बल्कि तब जब रोज़ के व्यवहार में समानता उतारते हैं।” उन्होंने सुझाव दिया कि हर समुदाय अपने-अपने नायकों को संकीर्णता से मुक्त करे। “अगर यादव समाज कर्पूरी ठाकुर को, पटेल समाज बाबू जगदेव प्रसाद को और मौर्य समाज संत राम को याद करने लगे, तो यही असली सामाजिक क्रांति होगी।”

अंतिम आह्वान:

          नीरज भाई ने अंत में कहा —“अगर हम समाधान का हिस्सा नहीं हैं, तो हम स्वयं समस्या हैं।” उन्होंने लोगों से अपील की कि विरोध से आगे बढ़कर समाधान पर ध्यान दें। “हम 85% हैं,” उन्होंने याद दिलाया, “तो हम सबसे बड़े उपभोक्ता भी हैं। जब उपभोक्ता तय कर ले कि उसे किसकी दुकान पर जाना है, किसे वोट देना है, किससे सामान खरीदना है — तो तीन दिन में यह व्यवस्था हिल जाएगी।” उन्होंने धर्म और राजनीति दोनों के पाखंड पर सीधा वार करते हुए कहा कि बदलाव किसी और के आने से नहीं, खुद से शुरू होगा।

अंतिम आह्वान: खुद बदलोसमाज बदलेगा:

          नीरज भाई ने अंत में कहा, “अगर हम समाधान का हिस्सा नहीं हैं, तो हम स्वयं समस्या हैं।” उन्होंने लोगों से अपील की कि विरोध की राजनीति से आगे बढ़कर अपने स्तर पर काम करें। अपने मोहल्ले के दुकानदार से लेकर अपने वोट तक, सब निर्णय सोच-समझकर लें। “हम 85% हैं,” उन्होंने याद दिलाया, “तो बाज़ार और धर्म दोनों के सबसे बड़े उपभोक्ता भी हम हैं। अगर हम तय कर लें कि किसे समर्थन देना है, तो तीन दिन में ये व्यवस्था हिल जाएगी।” उनका संदेश स्पष्ट था —बदलाव किसी देवता या नेता से नहीं आएगाबल्कि हर व्यक्ति के भीतर से शुरू होगा। जो गड्ढे से बाहर निकलने की कोशिश करेगा, वही समाज को बाहर निकालने का अधिकार रखता है।

          नीरज भाई का यह भाषण महज़ एक आक्रोश नहीं, बल्कि आत्ममंथन की पुकार है। उन्होंने बताया कि सच्ची क्रांति बाहरी दुश्मनों से नहीं, भीतर के डर और भ्रम से लड़कर ही आती है। जो “गड्ढे से बाहर निकलने की कोशिश” कर रहा है, वही समाज को बाहर निकालने का हकदार है — बाकी जो गड्ढे में पड़े रहना चाहते हैं, वे वहीं रह सकते हैं। यह संदेश केवल किसी जाति या वर्ग के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है —कि अगर सोच नहीं बदलीतो व्यवस्था कभी नहीं बदलेगी।

        सारांशत: भाषण जातिवाद और धार्मिक व्यवसाय पर तीखा प्रहार है — यह कहता है कि केवल पुजारी-पुश्तों (ब्राह्मणों को बदल देने) से समस्या नहीं सुलझेगी क्योंकि मनुवाद और ब्राह्मणवाद मानसिक/संस्थागत जड़ों में गहरे बसे हैं। लेखक बताता है कि हमें बाहरी आदर्श/प्रतीक बदलने के बजाय अपने आचरण, वोटिंग व्यवहार और रोज़मर्रा की खपत से बदलाव लाना होगा — जैसे झूठे कथा-वाचकों के स्टॉलों पर भीड़ न भेजना, अपने घरों में बहुजन नायकों की याद रखना, शिक्षा-निर्णय और सामूहिक सहयोग पर काम करना। अंत में वह व्यक्तिगत परिवर्तन — घर, पत्नी, बच्चों को साथ लेकर जागृत करना — ज़ोर देकर कहते हैं कि छोटे-छोटे व्यवहार ही बड़े बदलाव की चाबी हैं।

मुख्य बिंदु :

  • ब्राह्मणों/पुरोहितों को बदलना समाधान नहीं; मनोवैज्ञानिक और सामाजिक गुलामी मिटानी होगी।
  • धार्मिक उद्योग (कथा-वाचक/स्टॉल) को उपभोक्ता-दबाव से रोका जा सकता है — भीड़ न जाने पर दुकानें बंद हो जाएंगी।
  • सामाजिक और राजनीतिक दोनों परिवर्तन ज़रूरी हैं; सिर्फ़ राजनीति से काम नहीं चलेगा।
  • प्रतीकों की राजनीति से आगे बढ़कर व्यवहारिक उदाहरण दिखाना आवश्यक: घरों में महापुरुषों की छवियाँ, जयंती मनाना, सामुदायिक सहयोग।
  • धर्म के नाम पर डर और सत्ता का प्रयोग — इसलिए लोग ढुलमुल आचरण करते हैं; असल परख आचरण से होगी, भाषण से नहीं।
  • व्यक्तिगत जिम्मेदारी: क्या तुमने अपने जीवन में वे तीन बदलाव किए? (स्पष्ट तीनों बिंदु भाषण में प्रतीकात्मक रूप से कहे गए)।
  • महिलाओं/बच्चों को साथ लाना ज़रूरी—परिवारों तक संदेश पहुंचाना;
  • जाति-आधारित प्रतिबंधों/निषेधों का उदाहरण (यामिनी, पटेल आदि) दिखाकर प्रणालीगत भेदभाव उजागर किया गया।

            यह भाषण जातिवाद और धार्मिक व्यवसाय पर तीखा प्रहार है — यह कहता है कि केवल पुजारी-पुश्तों (ब्राह्मणों को बदल देने) से समस्या नहीं सुलझेगी क्योंकि मनुवाद और ब्राह्मणवाद मानसिक/संस्थागत जड़ों में गहरे बसे हैं। लेखक बताता है कि हमें बाहरी आदर्श/प्रतीक बदलने के बजाय अपने आचरण, वोटिंग व्यवहार और रोज़मर्रा की खपत से बदलाव लाना होगा — जैसे झूठे कथा-वाचकों के स्टॉलों पर भीड़ न भेजना, अपने घरों में बहुजन नायकों की याद रखना, शिक्षा-निर्णय और सामूहिक सहयोग पर काम करना। अंत में वह व्यक्तिगत परिवर्तन — घर, पत्नी, बच्चों को साथ लेकर जागृत करना — ज़ोर देकर कहते हैं कि छोटे-छोटे व्यवहार ही बड़े बदलाव की चाबी हैं। (संदर्भ: राहुल नागपाल और दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद के बीच संवाद – “दलित नॉट पावर एंड बोल्ड 85” –https://youtu.be/GAhagRy-c80?si=DwJ_4xIkiB5eyziX)

                                        0000

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें