साल 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने कपिलवस्तु के प्राचीन स्तूप से इन पवित्र अवशेषों की खोज की थी. 2025 में उनके पड़पोते ने इन्हें नीलामी के लिए रख दिया.भारत ने भगवान बुद्ध से जुड़े 2500 साल पुराने दुर्लभ अवशेषों की हांगकांग में होने वाली नीलामी को रुकवा दिया ये अवशेष 1898 में कपिलवस्तु के प्राचीन स्तूप से खोजे गए थे और 2025 में नीलामी के लिए रखे गए थे भारत सरकार ने पहली बार पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए पुरावशेषों की घर वापसी का यह मिशन पूरा किया
भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी कूटनीतिक और सांस्कृतिक कामयाबी हासिल करते हुए भगवान बुद्ध से जुड़े 2500 साल पुराने दुर्लभ आभूषणों और अवशेषों की नीलामी को रुकवा दिया. पिपरहवा अवशेष के नाम से चर्चित इन रत्नों की हांगकांग में सोथबी की मशहूर नीलामी में बोली लगने वाली थी. शुरुआती बोली ही 100 मिलियन डॉलर (करीब 830 करोड़ रुपये) रखी गई थी. अगर भारत समय पर दखल न देता तो सभ्यता की यह अनमोल विरासत किसी प्राइवेट कलेक्शन का हिस्सा बनकर हमेशा के लिए खो सकती थी.
1898 में कपिलवस्तु में हुई थी खोज
इसकी पूरी कहानी किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है. साल 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने कपिलवस्तु के प्राचीन स्तूप से इन पवित्र अवशेषों की खोज की थी. 2025 में उनके पड़पोते ने इन्हें नीलामी के लिए रख दिया. नीलामी से ठीक 72 घंटे पहले भारत सरकार ने कानूनी नोटिस और कूटनीति का ऐसा दबाव बनाया कि नीलामी रोकनी पड़ी.
संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल की अगुआई में यह मिशन उस वक्त और खास बन गया, जब इसमें पुरावशेषों के मामले में पहली बार पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप का सफल प्रयोग किया गया. सरकारी एजेंसियों, संस्कृति के एक्सपर्ट्, कानूनी सलाहकारों और प्राइवेट व्यक्तियों के सहयोग से इस मिशन को अंजाम दिया गया.
गोदरेज ने निभाई अहम भूमिका
इस ऐतिहासिक उपलब्धि में गोदरेज ग्रुप के मशहूर उद्योगपति पिरोजशा गोदरेज ने अहम भूमिका निभाई. उन्होंने इन पवित्र रत्नों को अघोषित कीमत पर खरीद लिया और सरकार को लोन के रूप में सौंप दिया ताकि ये हमेशा भारत में ही रहें. ये पहली बार है जब सरकार और किसी निजी परोपकारी संस्था ने मिलकर देश की विरासत को वापस लाने के लिए इस तरह काम किया है. जानकारों का मानना है कि अगर भारत ये पहल न करता तो डर था कि इन अवशेषों पर चीन अपना कब्जा जमा सकता था.
रत्न नहीं, जीवित सभ्यता का हिस्सा
भारत ने इस मामले को महज कानूनी नजरिए से नहीं बल्कि एक दार्शनिक दृष्टिकोण से भी दुनिया के सामने रखा. अधिकारियों ने तर्क दिया कि ये आभूषण महज वस्तु नहीं हैं, बल्कि जीवित सभ्यता का हिस्सा हैं जो अहिंसा, करुणा और ज्ञान की निरंतरता को दर्शाते हैं. भारत की इस सॉफ्ट पावर रणनीति ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दिल जीत लिया और बिजनेस के ऊपर नैतिकता की जीत हुई. नेशनल म्यूजियम की एक्सपर्ट डॉ. सविता कुमारी और अबीरा भट्टाचार्य के अनुसार, ये आभूषण 2500 साल पुरानी सभ्यतागत कारीगरी का जीता जागता सबूत हैं.
बुद्ध के अस्थि अवशेषों के साथ प्रदर्शित
127 साल बाद ‘द लाइट एंड द लोटस’ प्रदर्शनी के जरिए इन आभूषणों को फिर से भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेषों के साथ रखा गया है. पिपरहवा से शुरू हुआ यह सफर अब एक नए अध्याय में प्रवेश कर चुका है. यह सफल ऑपरेशन भविष्य के लिए एक उदाहरण है कि किस तरह भारत अपनी सभ्यता और पहचान की सुरक्षा के लिए सीमाओं से पार जाकर भी पहल कर सकता है. भारत के लिए यह महज पुरावशेषों की घर वापसी नहीं है बल्कि सांस्कृतिक स्मृतियों, मौलिक पहचान और गौरवपूर्ण आत्मसम्मान को वापस लाने का एक ऐतिहासिक पल भी था.





