नीलम ज्योति
कृषि का आरंभ होने से पहले तक किसी अवतार की आवश्यकता न थी। अतिमानवीय शक्तियों में विश्वास था। देवत्व का विकास बाद में हुआ, पर उसको लेकर जो कथाएं रची गई, उनमें बहुत पीछे के चरण को भी समेट लिया गया और कुछ और आगे चल कर स्रष्टा और स संचालन करने वाली शक्ति/यों और किन्हीं परिघटनाओं के कारणों के अमूर्त विषयों पर भी चिंतन होने लगा।
अतिमानवीय शक्तियों में ही उनके पुरखे भी आते थे, जो परेत (प्रेत) बन जाने के कारण ऐसे कारनामे कर सकते थे जो असाधारण क्षमता वाले जीवित मनुष्योंं से संभव न हो, जिसे वे अपने जीवन काल कर पाने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे।
अवतार की कल्पना कृषि की स्थापना के बाद हुई। वह भी कृषि की समृद्धि के बाद, न कि आरंभिक चरण पर। तबतक कृषि के आरंभिक प्रयोगों और अवरोधों को किसी न किसी रूप में दुहराया अवश्य जाता रहा। इसके बिना उन विवरणों में वैसी वस्तुपरकता नहीं आ सकती थी।
भारतीय देव समाज के पुराने और नए महादेवों और हीन देवों की एक विशाल संख्या है, परंतु उनमें से दूसरा कोई देवता अवतार नहीं लेता। बार-बार विष्णु को ही अवतार लेना पड़ता है।
विष्णु में ऐसी क्या बात है?
कहा जाता है कि जब असुरों की उद्दंडता बढ़ जाती है, धर्म का ह्रास होने लगता है, देवगण त्रस्त हो जाते हैं, तब असुरों के विनाश, देवों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए विष्णु अवतार लेते हैं। यह विश्वास कई स्तरों की यादों के घाल-मेल रचा गया है जिसमें सत्य का अंश तो है परंतु इतना धुंधला कि उस पर प्रकाश डाला जाए तो उसका उजागर पक्ष भी उतना ही अविश्वसनीय लगेगा।
कहां है वह धाम जहां विष्णु निवास करते हैं? देवता कहां रहते हैं जिन्हें असुर सताने लगते हैं ? असुरों का निवास कहां है, जहां से वे देवलोक में पहुंच जाते हैंं। असुरों से त्रस्त देव किस रास्ते और कितनी दूरी पार करके विष्णु के पास अपना दुख सुनाने पहुंचते हैं?
देवों का धर्म क्या है जिसमें असुर बाधा पहुंचाते हैं? यदि वह यज्ञ है तो देव कब यज्ञ करते हैं, कहां करते हैं? इन सवालों का जवाब तलाशने का प्रयत्न नहीं किया गया।
देवों ने असुरों के उपद्रव से बचने के लिए अपनी अलकापुरी बसा रखी थी। उस पर संकट आता था तो वे रक्षा के लिए अयोध्या के राजाओं के पास दौड़ते थे।
उनकी संचार प्रणाली और परिवहन व्यवस्था क्या थी, इस पर विचार नहीं किया गया। वे अलका पुरियां कहां थीं जिन तक ये राजा पहुंच जाते थे, इंद्र के साथ असुरों से युद्ध करते थे, और उन्हें परास्त करके और मालामाल हो कर लौटते थे। इस तरह के हवाले स्वप्न तंत्र की तरह वास्तविक और अवास्तविक दोनों एक साथ प्रतीत होते हैं।
राम उसी रघुकुल में जन्म लेते हैं जिसको असुरों से लड़ने और परास्त करने लंबा अनुभव है। ऊपर से वह विष्णु के अवतार हैं। विष्णु ने पहली बार बलf के साथ छल करके उन्हें पाताल भेजने के लिए ही वामन अवतार लिया था।
इस काम को उन्होंने पूरा भी किया था, फिर पाताल से निकल कर असुरों ने देवों को सताना कैसे आरंभ कर दिया? पौराणिक आख्यान सत्य से इतने दूर होते हैं कि जहां उनका वास्तविकता से संबंध होता है, वहां भी उसको समझना आसान नहीं होता।
देवासुर संघर्ष भारतीय इतिहास का शाश्वत संघर्ष है – उत्पादन के स्रोतों पर अधिकार करने वालों और उसमें अपना उचित हिस्सा मांगने वालों के बीच का संघर्ष – मार्क्सवादी शब्दावली में वर्ग संघर्ष।
यह बार बार होता है, देवों को बार बार विष्णु के पास रक्षा की गुहार करते दौड़ लगानी पड़ती है। ये देव कौन हैं जिनके नाम से इतिहास में उनका रोना दर्ज है, त्राहि, पाहि, अव, दर्ज है, कोई कारनामा नहीं ? इसके बाद भी वे क्यों भारतीय परंपरा में एक ओर तो श्लाघ्य बने रहते हैं और दूसरी ओर उनका मजाक भी उड़ाया जाता है (समरथ के नहिं दोस गुसाईं, हरि विरंचि सुरसरि की नाईं)।
असुरों का बार बार दमन किया जाता है। और वे रक्तबीज हैं – बार बार उठ खड़े होते हैं – उनके दमन के लिए विष्णु को बार बार जन्म लेना पड़ता है। आरंभ में कभी असुरों ने देवों का उत्पीड़न किया था और यह उत्पीड़न हजारों साल तक चला था।
लड़ाई नस्ली न थी। रंगभेद की नहीं थी। वे एक ही प्रजापति की जिन्हें अनेक नामों से याद किया जाता रहा है (जीविका के स्रोत) के प्रतीक हैं। उनकी संतानों में विभाजन उनकी दो पत्नियों की संतानों के कारण होता है। पत्नियो के नाम (दिति, अदिति) बाद में रखे जाते हैं। इस नामकरण के भी कई चरण हैं।
भेद को पत्नी शब्द के अर्थ से समझा जाना चाहिए। पति का अर्थ है, पालन करने वाला। पत्नी का अर्थ है जीविका के साधन। अब दिति का अर्थ हुआ, देने वाली, उदार, अर्थात प्रकृति। इसी दिति के पुत्र दानव, उदार भाव से किसी को अपना सब कुछ देने को तैयार, आहार संचयी और आखेटजीवी जन हैं, जिनके धरती और वनस्पतियों से पिता पुत्र का संबंध है।
अदिति का अर्थ हुआ, कृषि कर्म के लिए साफ और समतल की गई भूमि जो स्वतः कुछ नहीं देसी। अपने पौरुष और परिश्रम से जिसमें धान्यों को उपजाना पड़ता है। इसलिए उसमें उगाई गई वनस्पतियां देवों की माताएं नहीं हैं, उनकी पत्नियां हैं। पूरे वैदिक साहित्य में असुर देवों के शत्रु नहीं, सौतेले भाई (सपत्न) बताए जाते हैं। (चेतना विकास मिशन).





