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आजाद भारत की विडंबनाएं: आत्ममंथन के लिए गहरी पीड़ा

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-तेजपाल सिंह तेज

          आजादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं होता, बल्कि यह एक ऐसी अवस्था है जहाँ जनता अपने भविष्य का निर्धारण स्वयं करती है और अपनी तकदीर की बागडोर अपने हाथों में लेती है। 1947 में भारत ने लंबे संघर्ष और असंख्य बलिदानों के बाद स्वतंत्रता प्राप्त की। यह अवसर न केवल हमारे लिए गौरव का क्षण था बल्कि एक नई उम्मीदों, सपनों और संभावनाओं का उद्घोष भी। किंतु, स्वतंत्रता के लगभग आठ दशकों के बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि आजाद भारत के समक्ष अनेक ऐसी विडंबनाएं खड़ी हैं जो उसके राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और अंतरराष्ट्रीय जीवन को उलझन भरा बनाती रही हैं।

          भारत की आत्मा  सहस्राब्दियों से स्वतंत्रता की प्यास से तड़पती रही। विदेशी शासन की बेड़ियों में जकड़े इस देश ने अपने हर मोड़ पर बलिदानों की गाथाएँ लिखीं—कहीं भगत सिंह के फांसी के फंदे की गूंज थी, तो कहीं गांधी के सत्याग्रह का उजाला। अंततः 15 अगस्त 1947 को जब स्वतंत्रता का सूरज उगा, तो यह केवल राजसत्ता के हस्तांतरण का दिन नहीं था, बल्कि आत्मगौरव, आत्मसम्मान और आत्म निर्णय की पुनर्प्राप्ति का ऐतिहासिक क्षण था। परंतु, हर स्वतंत्रता के साथ एक जिम्मेदारी भी जन्म लेती है। हमें ऐसा राष्ट्र गढ़ना था जहां राजनीति सेवा का पर्याय हो, समाज समानता का दर्पण बने, धर्म मानवता का संदेश दे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत शांति और सह अस्तित्व का प्रतीक बने। किंतु समय के साथ ये आदर्श धीरे-धीरे विडंबनाओं में बदलते चले गए। आज़ादी के 78 वर्षों के बाद जब हम अपने इतिहास पर दृष्टि डालते हैं, तो पाते हैं कि स्वतंत्रता का स्वर्णिम स्वप्न अनेक विरोधाभासों, संघर्षों और अपूर्णताओं से घिरा हुआ है। इन्हीं विरोधाभासों और संघर्षों को हम “आजाद भारत की विडंबनाएँ” कह सकते हैं।

          भारत का स्वाधीनता-संग्राम केवल एक राजनीतिक क्रांति नहीं था, वह एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आत्मा की मुक्ति का महान महाकाव्य था। न जाने कितने नाम गुमनाम हुए, न जाने कितनी माताओं ने अपने लाल खोए, और कितनी ही बेटियों ने सुहाग की वेदी पर बलिदान दिया। 15 अगस्त 1947 को जब लाल किले से आज़ादी का बिगुल बजा, तब ऐसा लगा मानो सहस्राब्दियों की दबी हुई साँसें एक साथ बाहर आ गई हों। परन्तु यह भी सच है कि स्वतंत्रता केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं होती, वह एक निरंतर प्रक्रिया होती है। और इसी प्रक्रिया में आजाद भारत ने जो विडंबनाएं झेली हैं, वे हमें गहरी पीड़ा और आत्ममंथन के लिए विवश करती हैं।

राजनीतिक विडंबनाएँ:                                                                                    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख आदर्श था लोकतंत्र, जिसमें जनता सर्वोपरि मानी जाए। लेकिन वास्तविकता यह है कि लोकतंत्र अक्सर केवल चुनावों और मतगणना तक सीमित रह गया है। राजनीतिक दल जनता की सेवा करने के बजाय सत्ता हासिल करने के हथकंडों में अधिक व्यस्त दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचार, धनबल, जातिगत समीकरण और क्षेत्रीय स्वार्थ राजनीति की दिशा तय करते हैं। चुनावों में विचारधारा और सिद्धांत गौण हो जाते हैं, और जाति-धर्म आधारित ध्रुवीकरण प्राथमिकता बन जाता है। लोकतंत्र का जो स्वरूप जनता की आकांक्षाओं को स्वर देने वाला होना चाहिए था, वही कभी-कभी भीड़तंत्र और सत्ता संघर्ष का उपकरण बनकर रह जाता है।

          लोकतंत्र भारत की आत्मा माना गया था। यह वही व्यवस्था थी जहाँ “जनता जनार्दन” सर्वोच्च मानी जानी थी। परंतु आज यह लोकतंत्र अक्सर केवल संख्याओं का खेल बनकर रह गया है। दलों की राजनीतिक सिद्धांतों से नहीं, बल्कि समीकरणों से संचालित होती है। चुनावी रैलियां लोकतंत्र की गंगा नहीं, बल्कि जातिवाद, क्षेत्रवाद और धनबल की मंडियाँ बन गई हैं। सत्ता की कुर्सी जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि राजमहल की तरह सजाने-संवारने का माध्यम बन चुकी है। गांधी ने जिस ‘रामराज्य’ की कल्पना की थी, वह कई बार भ्रष्टाचार, घोटालों और अवसरवादिता के दलदल में डूबा दिखाई देता है। विडंबना यह है कि आजादी दिलाने वाले नेताओं ने लोकतंत्र को जन-सेवा का साधन माना, जबकि बाद की राजनीति ने उसे सत्ता-लोलुपता का साधन बना दिया।

सामाजिक विडंबनाएँ:

          आजाद भारत का सपना एक ऐसे समाज का था जहाँ समानता और भाईचारे की भावना प्रबल हो। संविधान ने जातिगत भेदभाव, छुआछूत और असमानताओं को खत्म करने का प्रावधान किया। किंतु सामाजिक धरातल पर स्थिति अलग है। आज भी जाति और वर्ग आधारित असमानता बनी हुई है। ग्रामीण और शहरी समाज में खाई गहराती जा रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएँ हर व्यक्ति तक समान रूप से नहीं पहुँच पातीं। महिला सशक्तिकरण की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन आज भी समाज के अनेक हिस्सों में महिलाओं को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर नहीं मिल पाता। इस प्रकार स्वतंत्रता ने हमें अवसर तो दिए, परंतु उनका लाभ लेने में समाज का बड़ा वर्ग पिछड़ गया।

          आजाद भारत के सपने में एक ऐसा समाज था जहाँ कोई ऊँच-नीच न रहे, कोई अस्पृश्यता न रहे और हर बच्चा समान अवसर पाकर अपनी प्रतिभा से देश का भाग्य लिख सके। परंतु आज भी जातीय खांचे उतने ही मजबूत हैं जितने सदियों पहले थे। गाँव और शहर के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है। एक ओर चमकते महानगर हैं, गगनचुंबी इमारतें और डिजिटल इंडिया की तस्वीर है; तो दूसरी ओर ऐसे गाँव भी हैं जहाँ न बिजली है, न पानी, न शिक्षा और न स्वास्थ्य। महिला सशक्तिकरण की बात हम गर्व से करते हैं, लेकिन दहेज, बलात्कार और घरेलू हिंसा की खबरें रोज अख़बारों में रक्तरंजित शब्दों में झलकती हैं। यह विडंबना ही तो है कि जिस भारत ने दुर्गा और सरस्वती की पूजा की, वही भारत अपनी बेटियों को सुरक्षा और सम्मान देने में चूक जाता है।

धार्मिक विडंबनाएँ:

          भारत की पहचान उसकी बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक संरचना में निहित है। यहाँ विभिन्न आस्थाएँ, भाषाएँ और संस्कृतियाँ सहस्राब्दियों से एक साथ पनपती रही हैं। लेकिन स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि धर्म, जो व्यक्तिगत आस्था और आध्यात्मिक उन्नति का साधन होना चाहिए था, वह राजनीति और सत्ता का हथियार बन गया। साम्प्रदायिक दंगे, धार्मिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यकों के प्रति असुरक्षा की भावना आज भी सामाजिक एकता के लिए चुनौती बने हुए हैं। भारत के धार्मिक बहुलतावाद को शक्ति बनाने के बजाय कई बार इसे विभाजन और वैमनस्य का कारण बना दिया गया।

          भारत की आत्मा उसकी विविधता है। यह भूमि ऋषियों की तपोभूमि भी है और संतों की वाणी का गान भी। यहाँ कुरान की आयतें भी गूँजती हैं और गुरुग्रंथ साहिब की बानी भी। परंतु आज़ाद भारत की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि धर्म, जो आत्मा की शांति का मार्ग होना चाहिए था, वह राजनीति की आग में ईंधन बनने लगा। साम्प्रदायिक दंगों में जलती बस्तियाँ, मज़हब के नाम पर बँटते दिल, और ‘हम’ और ‘वे’ की विभाजनकारी सोच—यह सब उस गंगा-जमुनी तहज़ीब का अपमान है जिसके लिए भारत विश्व में जाना जाता था।
विडंबना यह है कि आज़ादी के समय हमने जो नारा लगाया था हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाईआपस में हैं भाई-भाई, वही नारा आज कई बार केवल किताबों में सजावट की तरह रह जाता है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों की विडंबनाएं:

          स्वतंत्रता के बाद भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, जिसका उद्देश्य था – किसी भी महाशक्ति के प्रभाव में आए बिना स्वतंत्र विदेश नीति चलाना। यह नीति आरंभ में एक आदर्श प्रतीत हुई, लेकिन समय के साथ भारत को आर्थिक, सैन्य और तकनीकी जरूरतों के कारण महाशक्तियों के समीकरणों में संतुलन बैठाना पड़ा। शीतयुद्ध के दौर में सोवियत संघ के करीब होना और आज अमेरिका तथा पश्चिमी देशों की ओर झुकाव इसी का परिणाम है। भारत ‘विश्वगुरु’ बनने का सपना देखता है, लेकिन घरेलू असमानताएँ और पड़ोसी देशों के साथ तनाव उसकी राह में बाधक बन जाते हैं। पाकिस्तान के साथ लगातार तनाव, चीन की विस्तारवादी नीतियों और वैश्विक मंचों पर सीमित प्रभाव यह दर्शाते हैं कि भारत की विदेश नीति में भी कई विडंबनाएं विद्यमान हैं।

          भारत की विदेश नीति का सपना था गुटनिरपेक्षता—किसी महाशक्ति की छाया में न रहकर आत्मनिर्भर और स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में विश्व को दिशा देना। परन्तु वास्तविकता यह रही कि हमें हर दौर में शक्ति संतुलन के खेल में फँसना पड़ा। शीत युद्ध में सोवियत संघ की छाया, फिर अमेरिका और पश्चिम की ओर झुकाव, और आज चीन-पाकिस्तान की चुनौतियाँ—यह सब दर्शाता है कि भारत का आत्मविश्वास कई बार बाहरी दबावों में झुक जाता है। भारत ‘विश्वगुरु’ बनने का सपना देखता है, लेकिन भीतर की सामाजिक दरारें और पड़ोसियों के साथ अस्थिर संबंध उसकी राह रोक लेते हैं। यही विडंबना है—कि भीतर से बँटा हुआ भारत बाहर से एकजुट होकर दुनिया का नेतृत्व कैसे कर सकता है?

आर्थिक विडंबनाएं:

          आज़ाद भारत का सपना था एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण, जहाँ हर व्यक्ति को रोटी, कपड़ा और मकान मिले; जहाँ गरीबी केवल इतिहास की किताबों में रह जाए और समृद्धि हर घर तक पहुँचे। परन्तु यह सपना आज भी अधूरा है। स्वतंत्रता के समय भारत निर्धन राष्ट्र था। आज हम विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, लेकिन अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और चौड़ी होती जा रही है। एक ओर अंबानी-अडानी जैसे उद्योगपति अरबों की संपत्ति जोड़ते हैं, तो दूसरी ओर करोड़ों लोग भूखे पेट सो जाते हैं। गाँव का किसान कर्ज़ में दबकर आत्महत्या करता है, जबकि शहर का अमीर विदेशी गाड़ियों और गगनचुंबी इमारतों में विलासिता का जीवन जीता है। यह सबसे बड़ी विडंबना है कि विकास की रोशनी सब तक समान रूप से नहीं पहुँच पाती।

          स्वतंत्रता सेनानियों का सपना था कि हर हाथ को काम मिलेगा। परंतु आज भी युवा डिग्रियाँ हाथ में लिए नौकरी के लिए भटकता है। पढ़ा-लिखा युवक रिक्शा चलाने को मजबूर होता है और योग्य किसान अपने बच्चों को खेतों से दूर भेजना चाहता है। बेरोज़गारी केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक असुरक्षा और मानसिक पीड़ा का कारण भी है। भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, परंतु सबसे अधिक उपेक्षित क्षेत्र भी यही है। हरित क्रांति ने उत्पादन बढ़ाया, परंतु किसानों की स्थिति सुधरी नहीं। लागत बढ़ती गई, समर्थन मूल्य पर्याप्त नहीं मिला, और बिचौलियों ने किसान की मेहनत का फल छीन लिया। नतीजा यह कि जिस किसान ने आज़ादी की लड़ाई में देश का पेट भरा, वही किसान आज आत्महत्या की खबरों में मिलता है।

          आज भारत में बड़े-बड़े बाँध, राजमार्ग और उद्योग विकास की निशानियाँ माने जाते हैं। परंतु यह भी विडंबना है कि इसी विकास के नाम पर लाखों लोग अपनी ज़मीन, जंगल और घर खो देते हैं। आदिवासी और ग्रामीण समुदाय विस्थापन की पीड़ा झेलते हैं, जबकि विकास का लाभ उन्हें सबसे कम मिलता है।  वैश्वीकरण ने भारत को विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया। मल्टीनेशनल कंपनियों और डिजिटल क्रांति ने नया परिदृश्य रचा। परंतु लाभ केवल शहरों और उच्च वर्ग तक सीमित रहा। गाँवों, मज़दूरों और छोटे व्यापारियों की स्थिति और कठिन होती गई। स्टार्टअप इंडिया और डिजिटल इंडिया की चमकदार तस्वीरों के बीच रोज़ कुएँ पर मेहनत करने वाला मज़दूर आज भी हाशिए पर खड़ा है।

          आर्थिक विडंबनाएँ हमें यह बताती हैं कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं होती; इसका अर्थ है हर नागरिक को समान अवसर देना। परंतु आज़ादी के आठ दशकों बाद भी यदि करोड़ों लोग गरीबी की रेखा के नीचे जी रहे हैं, यदि किसान कर्ज़ में डूब रहा है और युवा बेरोज़गार घूम रहा है, तो यह आज़ाद भारत की सबसे गहरी पीड़ा है।
फिर भी आशा की किरण यही है कि भारत में संसाधनों की कमी नहीं, केवल न्यायपूर्ण वितरण की आवश्यकता है। यदि नीतियाँ गरीब और आम आदमी के हित में केंद्रित हों, तो वही भारत आर्थिक असमानताओं से ऊपर उठकर सच्चे अर्थों में स्वतंत्र कहलाएगा।

सारांशत: आजाद भारत की विडंबनाएँ हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमने स्वतंत्रता का सही अर्थ समझा है? क्या स्वतंत्रता केवल शासन बदलने तक सीमित है, या यह समाज और व्यक्ति की चेतना को भी मुक्त करने का आह्वान करती है? राजनीतिक अवसरवादिता, सामाजिक असमानता, धार्मिक कट्टरता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असमंजस – ये सब मिलकर आज के भारत की जटिल तस्वीर खींचते हैं। फिर भी, यह याद रखना आवश्यक है कि हर विडंबना अपने भीतर एक संभावना भी समेटे होती है। भारत के पास विशाल मानव संसाधन, समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और लोकतंत्र की मजबूत नींव है। यदि हम इन विडंबनाओं को आत्मचिंतन और सुधार का अवसर मानें, तो वही भारत दुनिया के सामने एक आदर्श रूप में उभर सकता है, जिसकी कल्पना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी।

          आजाद भारत की विडंबनाएँ हमें यह बताती हैं कि स्वतंत्रता केवल सत्ता-परिवर्तन का नाम नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की आत्मा, समाज की चेतना और राष्ट्र की आत्मनिर्भरता की परख है। हमने आज़ादी तो पा ली, लेकिन आज़ादी के आदर्शों को आत्मसात करने में हम बार-बार चूक जाते हैं। राजनीति में आदर्शवाद का स्थान अवसरवाद ने ले लिया, समाज में समानता की जगह भेदभाव ने, धर्म में सहिष्णुता की जगह कट्टरता ने और विदेश नीति में स्वतंत्रता की जगह दबावों ने। फिर भी, निराशा में डूबना भारत की आत्मा नहीं है। यह वही भूमि है जिसने अंधकार से उजाला पाया है, जिसने गुलामी से स्वतंत्रता अर्जित की है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इन विडंबनाओं को केवल आलोचना का विषय न मानें, बल्कि आत्मचिंतन और सुधार का अवसर मानें। तभी भारत सचमुच उस स्वप्नलोक की ओर बढ़ेगा जिसकी कल्पना हमारे शहीदों ने की थी।

          भारत की आत्मा सहस्राब्दियों से स्वतंत्रता की प्यास से तड़पती रही। विदेशी शासन की बेड़ियों में जकड़े इस देश ने अपने हर मोड़ पर बलिदानों की गाथाएँ लिखीं—कहीं भगत सिंह के फांसी के फंदे की गूंज थी, तो कहीं गांधी के सत्याग्रह का उजाला। अंततः 15 अगस्त 1947 को जब स्वतंत्रता का सूरज उगा, तो यह केवल राजसत्ता के हस्तांतरण का दिन नहीं था, बल्कि आत्मगौरव, आत्मसम्मान और आत्मनिर्णय की पुनर्प्राप्ति का ऐतिहासिक क्षण था। परंतु, हर स्वतंत्रता के साथ एक जिम्मेदारी भी जन्म लेती है। हमें ऐसा राष्ट्र गढ़ना था जहाँ राजनीति सेवा का पर्याय हो, समाज समानता का दर्पण बने, धर्म मानवता का संदेश दे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत शांति और सहअस्तित्व का प्रतीक बने। किंतु समय के साथ ये आदर्श धीरे-धीरे विडंबनाओं में बदलते चले गए। आज़ादी के 78 वर्षों के बाद जब हम अपने इतिहास पर दृष्टि डालते हैं, तो पाते हैं कि स्वतंत्रता का स्वर्णिम स्वप्न अनेक विरोधाभासों, संघर्षों और अपूर्णताओं से घिरा हुआ है। इन्हीं विरोधाभासों और संघर्षों को हम “आजाद भारत की विडंबनाएँ” कह सकते हैं।

Ramswaroop Mantri

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