बिहार में एक बार फिर से पिछड़ों की राजनीति तेज हो रही है। पिछड़ों का कौन ज्यादा बड़ा हिमायती हो, इसके लिए बीजेपी और जेडीयू आमने-सामने आ गए हैं। पूरे बिहार में इसके लिए दोनों दलों के नेता भी सड़क पर उतर रहे हैं। यह सारी कवायद शुरू हुई पटना हाईकोर्ट के एक आदेश से। पिछले दिनों कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनाव में मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पर रोक लगा दी। हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर मौजूदा हालात में चुनाव होते हैं तो अति पिछड़ों के लिए आरक्षित सीट सामान्य कैटिगरी की मानी जाएगी। इस आदेश के तुरंत बाद बीजेपी राज्य में आक्रामक रूप पर उतर आई और नीतीश कुमार को अति पिछड़ों का विरोधी बताने लगी। वहीं जेडीयू पलटवार करते हुए पूरे प्रकरण के लिए बीजेपी को ही इसका दोषी ठहरा रही है। बीजेपी नेता पूरे राज्य में इस मुद्दे पर लोगों को बता रहे हैं कि नीतीश कुमार की लापरवाही के कारण निकाय चुनाव से आरक्षण समाप्त हो रहा है। वहीं जेडीयू नेता कह रहे हैं कि बिहार में अति पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिए बिना निकाय चुनाव संभव ही नहीं है और बीजेपी हाई कोर्ट के इस फैसले पर लगातार भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है।

मुद्दा और, निशाना कहीं और
बिहार में भले ही यह मुद्दा पटना हाई कोर्ट के फैसले के बाद गरम हुआ, लेकिन हकीकत यह है कि इस सियासी टकराव के पीछे खेल कुछ और ही है। जब से बिहार में नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ छोड़कर आरजेडी के साथ महागठबंधन कर सरकार बनाई है, तब से यह सवाल उठ रहा है कि अगले चुनाव में अति पिछड़े वोटरों का रुख क्या होगा? राज्य में अब तक सत्ता की चाबी अति पिछड़ों के हाथ में ही रही है। 2024 आम चुनाव में इस राज्य की 40 लोकसभा सीटों का भी अहम योगदान होगा। बिहार में पिछड़े और अति पिछड़ों का वोट लगभग 51 फीसदी है। इसमें से यादव वोट हटा दें तो बाकी वोट 2004 के बाद अधिकतर बीजेपी-नीतीश को ही मिलता रहा है। 2015 में जब नीतीश कुमार आरजेडी के साथ आकर विधानसभा चुनाव लड़े थे, तब अधिकतर अति पिछड़ा वोट महागठबंधन को मिला। दरअसल, अति पिछड़ों के बीच नीतीश कुमार की पकड़ रही है और यही उनका मूल वोटबैंक रहा है। यही कारण है कि नीतीश जिधर जाते हैं, उनके साथ यह वोट आने से उस गठबंधन का पलड़ा भारी हो जाता है।
इसलिए आरजेडी और जेडीयू के एक होने के बाद अगर इनमें मुस्लिम वोट और जोड़ लें तो महागठबंधन कागजों पर बहुत मजबूत दिखने लगता है। बीजेपी को भी इसका एहसास है और नीतीश कुमार से अति पिछड़ा वोट छीनने की कोशिश में वह अभी से जुट गई है। सूत्रों के अनुसार बीजेपी जल्द राज्य में नया नेतृत्व सामने लाएगी, जिसकी कमान अति पिछड़ों के हाथ में ही होगी। बीजेपी का आकलन है कि सवर्ण आरजेडी के साथ नहीं आएंगे और अगर अति पिछड़ा उनके साथ आ गए। तब नीतीश-तेजस्वी के अलायंस का लाभ समाप्त हो जाएगा। वहीं महागठबंधन को भी पता है कि अगर 2024 में उसे बीजेपी को राज्य में मात देनी है तो नीतीश कुमार को अपना वोट बैंक ट्रांसफर करवाना ही होगा।
बीजेपी के लिए भी यह मुद्दा राज्य में ठीक ऐसे समय में आया, जब नीतीश और तेजस्वी राज्य में जाति जनगणना के मुद्दे पर केंद्र की बीजेपी सरकार को घेर रहे हैं। केंद्र सरकार इससे इंकार कर रही है और आरजेडी-जेडीयू इसे पिछड़ा विरोधी फैसला बता रहे हैं। दोनों दलों ने संकेत दिया कि अगले साल वे इस मुद्दे पर बड़ा आंदोलन करेंगे। इस पर बीजेपी बैकफुट पर ही रही है। नीतीश कुमार ने अगले साल राज्य सरकार की ओर से जाति जनगणना कराने का संकेत भी दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके बाद आए आंकड़ों के अनुसार सभी जातियों को उनके हिसाब से आरक्षण दिया जाएगा। दरअसल, जबसे केंद्र सरकार ने पचास फीसदी की आरक्षण सीमा को पार करते हुए 10 फीसदी ईडब्ल्यूएस देने का कानून बनाया है, तभी से पिछड़ों का कोटा भी बढ़ाने की मांग उठती रही है। बीजेपी इस मुद्दे पर भी पशोपेश में रही है। जाहिर है कि बिहार में स्थानीय निकाय चुनाव में आरक्षण के मसले पर जो सियासी युद्ध शुरू हुआ है, वह अब वहीं तक टिकता नहीं दिख रहा है और आने वाले दिनों में यह सिर्फ बिहार तक नहीं रहने वाला है।
मंडल बनाम कमंडल
2014 के बाद नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने सियासत में सोशल इंजीनियरिंग की बदौलत दूसरे दलों से बढ़त ले ली। कभी सवर्णों-शहरी मतदाताओं की पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी ने पिछले कुछ सालों में पिछड़े वोटरों के बीच अपनी पैठ बहुत मजबूत की है। बिहार और उत्तर प्रदेश के संदर्भ में यह गैर-यादव पिछड़ा और अति पिछड़ा वोट हो जाता है। पिछले कुछ सालों से विपक्ष ने इस तबके में बीजेपी की बढ़त को महसूस की और इनके बीच अपने नेतृत्व को बढ़ाने में लगा। जिस तरह से 2014 से ओबीसी और इनसे जुड़े मुद्दे पर होने वाली सियासत केंद्र में आ गई है, सभी दलों का आकलन है कि 2024 में जिस सियासी टीम में जितने मजबूत ओबीसी खिलाड़ी होंगे, उसे उतना ही लाभ मिलेगा और चुनावी पिच पर वह उतना ही बेहतर स्कोर कर पाएंगे। विपक्ष का मानना है कि अगर वह ओबीसी वोट में अपनी स्थिति नहीं सुधारता है, तो उसके लिए आने वाले दिनों में दिक्कत और बढ़ेगी।
वैसे इसके लिए उन्हें पार्टी के अंदर मजबूत ओबीसी नेतृत्व की भी जरूरत होगी। संख्या के लिहाज से भी यह सबसे बड़ा समूह है। साथ ही विपक्षी दलों को एहसास है कि बीजेपी के आक्रामक कमंडल राजनीति को वे मंडल राजनीति से ही काउंटर कर सकते हैं। और विपक्ष की इस रणनीति में नीतीश कुमार एक अहम ओबीसी चेहरा हैं। यही कारण है कि बीजेपी इस चेहरे पर सबसे अधिक हमलावर होना चाहती है। वहीं नीतीश कुमार भी जब से महागठबंधन में आए हैं तभी से बीजेपी के इस मजबूत पक्ष पर अधिक से अधिक चोट करने की कोशिश में हैं। आने वाले दिनों में वह पिछड़ों के पक्ष में कई और नेताओं को साथ करने के अलावा इनके मुद्दों को भी उठाने के संकेत दे रहे हैं। यही कारण है कि पटना हाई कोर्ट के एक फैसले से जो सियासत शुरू हुई वह अभी और पसरेगी, जिसमें कई शह-मात होंगे।




