दरभंगा का वह ऐतिहासिक स्कूल, जिसने देश को जननायक कर्पूरी ठाकुर और नेपाल को प्रधानमंत्री दिया. आज खंडहर में तब्दील हो चुका है. जिस क्लासरूम से महापुरुष निकले, वहां आज गंदगी का अंबार है. देखिए, कैसे अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है आजादी की गौरव गाथा का यह गवाह.
बिहार की सांस्कृतिक राजधानी दरभंगा में एक ऐसा शिक्षण संस्थान है, जिसका इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है. लेकिन अफसोस आज यह विद्यालय अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. जिस क्लासरूम ने देश-विदेश को महान नायक दिए. वहां आज खड़ा रहना भी दूभर है. जानिए इस स्कूल को जहां से नेपाल के पीएम से लेकर बिहार के सीएम और कई महान लोग पढ़ाई कर चुके हैं. जानें इसकी गौरवशाली और दुखद कहानी.
महात्मा गांधी ने की थी शुरुआत
इस विद्यालय का ऐतिहासिक महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि साल 1920 में खुद महात्मा गांधी ने इस नेशनल स्कूल की नींव रखी थी. आजादी की लड़ाई के दौरान यह स्कूल न केवल शिक्षा का केंद्र था, बल्कि कई स्वतंत्रता सेनानियों के लिए सुरक्षित शरणस्थली भी रहा है.
महान विभूतियों की रही है नर्सरी
इस स्कूल की बेंचों पर बैठकर शिक्षा ग्रहण करने वालों की सूची लंबी और प्रभावशाली है. यहां के पूर्व छात्रों में
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और जननायक कर्पूरी ठाकुर, नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री मातृका प्रसाद कोइराला शामिल हैं. वहीं महान स्वतंत्रता सेनानी बैकुंठ शुक्ल और बृजनंदन शर्मा स्वतंत्रा संग्राम के दौरान यहां रुक देश की आजादी की रणनीति बनाई थी. यह स्कूल आजादी की लड़ाई का गवाह भी रहा है.
गौरवशाली अतीत, शर्मनाक वर्तमान
बिहार राज्य परामर्शदात्री सदस्य उज्जवल कुमार बताते हैं कि इस विद्यालय का अतीत जितना गौरवपूर्ण है, वर्तमान उतना ही लज्जास्पद है. स्कूल का अधिकांश हिस्सा खंडहर में तब्दील हो चुका है. जिस पवित्र स्थान पर बैठकर महापुरुषों ने देश का भविष्य गढ़ा, आज वहां लोग मल-मूत्र त्याग करते हैं. क्लासरूम की दीवारें गिर रही हैं. हर ओर परिसर गंदगी का अंबार बन चुका है.
पुनरुद्धार की जरूरत
उज्जवल कुमार का कहना है कि यह पूरे समाज और सरकार के लिए शर्म की बात है. उनका मानना है कि इस विद्यालय को महज एक इमारत नहीं, बल्कि हेरिटेज (विरासत) के रूप में देखा जाना चाहिए. सरकार को तुरंत हस्तक्षेप कर इसे फिर से जीवंत करना चाहिए, ताकि आजादी की वह गौरव गाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहे.






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