डॉ. विकास मानव
“नदीनां च यथा गंगा
पर्वतानां हिमालय:।
तथा समस्त शास्त्राणां
तंत्रशास्त्रमनुत्तम्।।”
उपर्युक्त वचन पूर्णरूप से यथार्थवादी और आर्ष वचन है। वेद, शास्त्र, पुराण, उपनिषद आदि जितने भी सनातन धर्म के अन्तर्गत आने वाले वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ ग्रन्थ हैं.
सभी का एक स्वर में कहना है : *तंत्रशास्त्र के शरण में गए बिना न भवमुक्ति है और न तो है मोक्ष की उपलब्धि ही।*
तन्त्र एक विशाल व्यापक शब्द है और उसी प्रकार उसका अर्थ भी है–विशाल, व्यापक और असीम। सम्पूर्ण विश्व में जितने भी धर्म हैं ( वास्तविकता यह है धर्म एकमात्र सनातन धर्म ही है ), जितने भी सम्प्रदाय हैं और जितनी भी साधना-उपासना की पद्धतियां हैं, सभी तन्त्र की सीमा के अन्तर्गत समाविष्ठ हैं।
तन्त्र का दृष्टिकोंण समन्वयवादी है। वैदिक, अर्धवैदिक यहां तक कि अवैदिक साधना-उपासना की भी चरम परिणति तन्त्र में ही होती है। *तन्त्र ही एक ऐसा परम शास्त्र है जो सभी धर्मों के प्रति समभाव रखने वाला, उनका आदर-सम्मान करने वाला तथा साधना के सर्वोच्च लक्ष्य को उपलब्ध करने वाला पथ है।
तन्त्र-वाङ्गमय अत्यंत विशाल है। उसके दो विभाग हैं :
1- तत्व
2- साधना।
समस्त तन्त्र-वाङ्गमय के चार स्तम्भ हैं–विद्या, क्रिया, योग और चर्चा। इन चारों का आधार है ज्ञान। जहां तक तांत्रिक साधना का प्रश्न है, वह दो प्रकार की है–बहिरंग साधना और अन्तरंग साधना।
बहिरंग साधना का मार्ग अति कंटकाकीर्ण है। उस पर चलना तलवार की धार पर चलने के समान है। यदि इस मार्ग में सफलता प्राप्त हो गयी तो अंतरंग साधना का मार्ग स्वयं सरल और प्रशस्त हो जाता है।
अन्तरंग साधना के अन्तर्गत जो भी तांत्रिक साधनाएं-उपासनाएँ हैं वे सभी-की-सभी मानसिक और भाव-प्रधान हैं, किन्तु इस मार्ग में सफलता तभी उपलब्ध होती है जब साधक की मानसिक शक्ति स्वच्छ, निर्मल और प्रबल होगी, भाव भी जब गहन और प्रगाढ़ होगा।
उच्चकोटि के तंत्र-साधक अन्तरंग साधना-मार्ग के ही पथिक होते हैं। अन्तरंग साधना मार्गी साधकों को आप कभी और किसी भी अवस्था में पूजा-पाठ, मन्त्र-जप अथवा अन्य प्रकार की साधना-उपासना, अन्य क्रियाएं करते नहीं देख सकते।
लेकिन फिर भी वे भीतर-ही-भीतर आध्यात्मिक दृष्टि से जो कुछ भी करते हैं, उसकी कल्पना करना सहज नहीं है। उनके शरीर में स्थित शक्ति के तीनों केन्द्र–नाभि, हृदय और मस्तिष्क सदैव सक्रिय रहते हैं।
मस्तिष्क की एक करोड़ तीस लाख कोशिकाएं जिनका सम्बन्ध अगोचर रूप से हर समय लोक-लोकान्तरों में बना रहता है, सक्रिय रहती हैं। मस्तिष्क की 90 लाख कोशिकाएं ऐसी हैं जिनका सम्बन्ध बराबर दैवीय राज्य और भाव राज्य से बना रहता है।
इन दोनों प्रकार के सम्बन्ध विशेष के द्वारा साधक बैठे-ही-बैठे जहां एक ओर उच्चतम ज्ञान को उपलब्ध होते हैं, वहीं दूसरी ओर लौकिक और पारलौकिक कल्याण भी करते हैं। यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि हर युग में और हर काल में धर्म, संस्कृति और साधनाओं-उपासनाओं का विकृत रूप भी रहा है।
तन्त्र भी इनका अपवाद नहीं है। आदि शंकराचार्य के समय तन्त्र के माध्यम से अवैदिक धारा का प्रचार-प्रसार अपने शिखर पर था जो अपने आप में वीभत्स और विकृत था। उसी अवस्था में महामाया शम्बर तन्त्र, यौगिक जाल शम्बर तन्त्र, भैरवाष्टक, बहुसमाष्टक, यमलाष्टक आदि तन्त्र के नाम पर भोगप्रधान ग्रन्थों की रचना स्वयंभू तांत्रिकों और कापालिकों द्वारा हुई परिणामस्वरूप तांत्रिक साधना-उपासना आदि योगप्रधान न होकर भोगप्रधान हो गयी।
मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन आदि तमोगुणी तांत्रिक क्रियाओं द्वारा जनमानस भ्रमित होने लगा। तन्त्र के सात आचारों में #कौलाचार का अपना महत्व है विशेषकर आंतरिक रूप में।
लेकिन उस समय कौलाचार के अंतर्गत पंचमकारों को प्रत्यक्ष साधन और पूजन का आधार बना दिया गया था। ऐसी विषम परिस्थिति में #समयाचार पर आधारित #श्रीविद्या #तन्त्र का आविर्भाव किया आदि शंकराचार्य ने जिसे समस्त तंत्रों का सारभूत बतलाया गया और यह भी बतलाया गया कि श्रीविद्या तन्त्र सकल पुरुष की साधना भी है।
आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित सौंदर्यलहरी इसी सत्य का प्रतिपादन करती है। यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो सभी तन्त्रों में श्रीविद्या तन्त्र सर्वश्रेष्ठ है। इसके साधना-मार्ग का द्वार सभी के लिए खुला है।
इस तंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका जो यन्त्र रूप है वह समस्त ब्रह्माण्ड का प्रतीक रूप है। उसी में सारा विश्वब्रह्माण्ड समाया हुआ है।
श्रीयन्त्र की पूजा-साधना-उपासना से निश्चित ही लौकिक-पारलौकिक कामनाएं पूर्ण होती हैं–इसमें सन्देह नहीं। इस प्रसंग में यहां यह भी बतला देना आवश्यक है कि तन्त्र की अपनी कई विशेषताएँ हैं। पहली तो यही है कि अन्य साधनाओं-उपासनाओं की तुलना में वर्ण, जाति और धर्म-सम्प्रदाय का भेद नहीं है। इसकी साधना और इसके अभ्यास में वर्ग-भेद का भी स्थान नहीं है।
दूसरी विशेषता यह है कि योग की तरह इसमें अष्टांग (यम, नियम, आसन प्राणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि ) जैसे साधनों की भी आवश्यकता नहीं है।
तांत्रिक साधना के विकास की तीन स्थितियां हैं–पशुभाव, वीरभाव और दिव्यभाव। प्रथम दोनों भावों के विकास के बाद दिव्यभाव अभ्यास से स्वयं विकसित होता जाता है। तन्त्र के सात आचार हैं–वेदाचार, वैष्णवाचार्य, शैवाचार, दक्षिणाचार, वामाचार, सिद्धांताचार और कौलाचार। इन सातों आचारों से तन्त्र के मुख्य सात साधना-मार्गों का जन्म समयानुसार हुआ।
तीसरी विशेषता यह है कि तन्त्र-साधना वर्तमान दृश्य और अदृश्य के सत्य और संसार के सत्य को अस्वीकार नहीं करता है।
*तन्त्र ‘संसार’ को ब्रह्म की माया नहीं कहता। उसका कहना है कि ‘संसार’ स्वयं ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है। परब्रह्म परमेश्वर नारायण की योगनिद्रा का स्वप्न है यह संसार। जिस समय उनकी योगनिद्रा भंग हो जाएगी, उसी क्षण संसार का अस्तित्व भी नष्ट हो जाएगा।*
इस दृष्टि से एक तन्त्र-साधक अपने आपको भौतिक संसार के अध्ययन और विवेचन के लिए बहुत ही अनुकूल और बहुत ही उपयुक्त स्थिति में पाता है। वह संसार का आत्मनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ–दोनों पद्धतियों से अध्ययन करता है। यही कारण है कि रसायनशास्त्र, औषधिशास्त्र, वास्तुशास्त्र, दर्शनशास्त्र, काव्यशास्त्र, भौतिकशास्त्र आदि शास्त्रों का ज्ञाता भी हो सकता है वह तन्त्र-साधक।
दैवीय सौंदर्य, प्राकृतिक सौंदर्य और भौतिक सौन्दर्य का भी प्रेमी होता है वह। इन तीनों सौन्दर्यों को माँ के रूप में नारी में देखता है। आदि शंकराचार्य की सौंदर्यलहरी इसी दिशा की ओर संकेत करती है।
_यह कहना अप्रसांगिक न होगा कि संपूर्ण तांत्रिक वाङ्गमय गोचर-अगोचर रूप से वासना-कामना रहित ‘कामशास्त्र’ पर आधारित है।_
*सच्चे तन्त्र-साधक की सौन्दर्यानुभूति में वासना अथवा कामना लेशमात्र भी नहीं रहती। तन्त्र अपनी मूल प्रकृति में ‘भोग’ नहीं है। भोगानुभूति कराते हुए भी भोग को अस्वीकार करता है वह। तन्त्र के सम्बन्ध में एक बहुत बड़ी भ्रान्ति यह है कि वह भोगवादी है। भोग का ही दर्शन कराता है वह। यह एक सर्वथा मिथ्या धारणा है। यह धारणा तब भी मिथ्या है जब तन्त्र को वाममार्ग या पंचमकार के रूप में ही स्वीकार किया गया हो।*
तन्त्र में तीन बातों को भारी महत्व दिया गया है–निर्लिप्तता, निरपेक्षा और अनासक्तता। यदि ये तीनों तन्त्र-साधक में हैं तो वह निःसंदेह साधक है, अन्यथा नहीं। तन्त्र-साधना में भोग- सामग्री अवश्य रहती है, रहना अनिवार्य भी है, लेकिन फिर भी सच्चा तन्त्र-साधक उससे निर्लिप्त रहता है।
भोग-सामग्री के प्रति किसी भी प्रकार की आसक्ति नहीं होती। यदि इस दृष्टि से देखा जाय तो निश्चय ही तन्त्र-साधना अति दुरूह है–इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। इसमें संयम की पूरी परीक्षा है।
साधक ने यदि संयम को तोड़ा तो समझिए उसका अधःपतन निश्चित है और अधःपतन हुआ तो सर्वनाश भी निश्चित है।
जैसा कि संकेत किया जा चुका है कि जब वाममार्गीय तन्त्र-साधना अपनी वीभत्स रूप में चरम सीमा पर थी, नर-बलि, पशु-बलि, पक्षी-बलि और नारी का विविधि प्रकार से यौन-शोषण द्वारा शक्ति का अर्जन किया जा रहा था, उसी समय *श्रीविद्या* का ,आविर्भाव तन्त्र के वास्तविक स्वरूप की रक्षा के लिए हुआ और वह भी दक्षिण के एक परमयोगी (आदि शंकराचार्य) के माध्यम से।
निश्चय ही श्रीविद्या के गर्भ में समस्त तांत्रिक साधनाएं और समस्त बहिरंग और अन्तरंग क्रियाएं समाहित हैं। श्रीविद्या का आधार एकमात्र *ब्रह्मविद्या* है।
श्रीविद्या के दो अंग हैं– *कादि विद्या और हादि विद्या।* इन दोनों महाविद्याओं को ‘टहा विद्या’ कहते हैं। व्यष्टि रूप लक्ष्मी के माध्यम से समष्टि रूप लक्ष्मी को उपलब्ध होना ‘टहाविद्या’ की साधना है जो सबके वश की बात नहीं है। कादिविद्या और हादिविद्या का मुख्य विषय सृष्टि है।
कादिविद्या के अनुसार सृष्टि ‘काम’ यानी संकल्प से हुई है, जबकि हादिविद्या के अनुसार अव्यक्त शिव की मायाशक्ति से हुई है। तन्त्र की जो आद्याशक्ति है, वह वेद की ‘श्री’ है। श्रीविद्या वास्तव में तंत्रपरक वेदविद्या है।
श्रीविद्या एक प्रकार से वेद और तन्त्र का समन्वित रूप है। श्रीविद्या प्रत्यक्ष रूप से राज-राजेश्वरी त्रिपुरसुंदरी है। श्री का एक अर्थ ‘विष’ भी है। उसे धारण किया भगवान शिव ने जिसके कारण भगवान शिव को *श्रीकण्ठ* भी कहते हैं।
उस विष को शिव ने श्रीयंत्राकार बना लिया। शिव के मस्तक के ऊपर स्थित षष्ठी का चंद्रमा उसी विष का गोचर रूप है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर षष्ठी पर्यन्त तिथियां विषतुल्य हैं। इन तिथियों में चंद्रमा की कलाओं को मृतकला कहते हैं जो पितृलोक को मात्र प्रकाशित करती हैं।
एक विशेष बात यह है कि इन छः तिथियों में जिन राशियों में चंद्रमा प्रवेश करता है, उनमें जन्म लेने वाले जातक की आत्मा पितृलोक की निवासिनी होती है। जिस परिवार में जातक जन्म लेता है। अधिक संभावना उसी परिवार के जन्म लेने की होती है।
यदि ऐसा होता है तो वह परिवार सभी दृष्टि से उन्नति करता है। षष्ठी तिथि के चन्द्रमा को अर्धकला कहते हैं। शुक्लपक्ष की यह तिथि अर्धकला के कारण सभी दृष्टि से अशुभ मानी गयी है।
ज्योतिष तन्त्र के अनुसार जातक के षष्ठी स्नान का समय उसके भविष्य से सम्बंधित होता है। माँ की गोद में स्नान करते समय जातक अपने हाथ-पांव जोर-जोर से हिलाकर यदि उच्च स्वर में रोता है तो समझ लेना चाहिए कि उस जातक का सम्पूर्ण जीवन किसी-न-किसी कारणवश रोते हुए ही बीतेगा।
यदि जातक का मुखमण्डल तेजोमय, शान्त और सौम्य है तो उसे भाग्यशाली समझना चाहिए। यदि उस समय जातक आंखें खोलकर मन्द-मन्द मुस्करा रहा हो तो समझ लेना है कि वह निश्चय ही युवावस्था में सन्यास ले लेगा और एकांतवास में रहेगा।
यदि जातक नेत्र बन्द किये हुए तंद्रिल अवस्था में हो और उसके मुख पर शान्ति का भाव हो तो समझ लेना चाहिए कि वह परम विद्वान, ख्यातिप्राप्त, यशस्वी और कीर्तिवान होगा।
यदि जातक षष्ठी स्नान के समय अपना लिंग पकड़ता हो तो समझ लीजिये कि वह अत्यधिक कामुक, चरित्रहीन और तामसिक प्राकृतिक का होगा। यदि वह अपना शरीर खुजलाता हो तो जीवन के मध्याह्न काल में राजदण्ड का भागी होगा। इस तरह के भावी जीवन के सम्बन्ध में अनेक और भी संकेत हैं जिनको स्थानाभाव के कारण प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।
चन्द्रमा का रत्न मोती है। एक रत्ती का मोती आयु नाश करता है। दो रत्ती का मोती मानसिक अशान्ति देता है। तीन रत्ती के मोती से घरेलू अशांति रहती है। चार और पांच रत्ती के मोती रोग उत्पन्न करते हैं। छः रत्ती के मोती सर्वस्व हरण करते हैं। सात और आठ रत्ती के मोती शुभ हैं।
नौ रत्ती का मोती असीम मानसिक शांति देता है। दस और ग्यारह रत्ती के मोती धन-वैभव और ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।
तन्त्र के मूल में दो तत्व हैं–शक्तितत्त्व और शिवतत्त्व। तन्त्र के अनुसार दोनों के मिथुन भाव से सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ है।
तन्त्र की यन्त्र-भूमि में अधोमुख त्रिकोण शिव का और ऊर्ध्वमुख त्रिकोण शक्ति का प्रतीक है। वर्णाक्षरों में ‘ह’ शिव का और ‘स’ शक्ति का प्रतीक है।
तन्त्र के मुख्य विषयों में कुण्डलिनी भी है। इस विषय में अनेक भ्रामक धारणाएं हैं। ‘कुण्डलिनी’ से सम्बंधित अब तक जितनी भी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, उनमें दो-चार को छोड़कर सभी खानापूर्ति मात्र हैं। किसी ने भी उसकी गहराई में जाने का प्रयास नहीं किया है।
_कुण्डलिनी कहाँ पर स्थित है ?_
वास्तव में गुदा स्थान के निकट जहां रीढ़ की हड्डी समाप्त होती है, एक ऐसा स्थान है, वहां शरीर की तीन मुख्य नाड़ियां आकर आपस में मिलती हैं। वे नाड़ियां हैं–मनोवहा नाड़ी, प्राणवहा नाड़ी और रक्तवहा नाड़ी। आध्यात्मिक भाषा में इनको गंगा, यमुना और सरस्वती कहते हैं।
योगियों का वह त्रिवेणी संगम है। तन्त्र के शब्दों में इनका नाम है–इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। इन तीनों नाड़ियों के मिलन-केंद्र को योग-तन्त्र की भाषा में ‘मूलाधार चक्र’ कहते हैं। उपर्यक्त मिलन से उस चक्र में एक विलक्षण तत्व का जन्म होता है जिसे ‘परामानसिक तत्व’ कहा जाता है।
इसका पर्यायवाची नाम ‘परामानसिक चेतना’ है। परामानसिक चेतना के दो रूप हैं–मानसिक चेतना और परामानसिक चेतना। इन्हीं को ‘चेतन मन’ और ‘अचेतन मन’ भी कहते हैं। वास्तव में दोनों परामानसिक तत्व के दो रूप हैं। परामानसिक चेतना समष्टि रूप है और सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्ड में व्याप्त है.
उसका जो व्यष्टि रूप है, वही कुण्डलिनी के रूप में मूलाधार चक्र में विद्यमान है।
कुण्डलिनी शब्द लाक्षणिक है। सच बात तो यह है कि परामानसिक चेतना इतनी सूक्ष्म ऊर्जा है कि वह केवल अनुभूति-पथ पर ही आ सकती है।
ऊर्जा का स्वभाव है कि सूक्ष्मतम प्राण में वलयाकार रूप में ऊपर की ओर उठती है और उसके बाद उसकी गति सूर्य-किरण की तरह सीधी हो जाती है। वलयाकार होने के कारण उसे लोग ‘कुण्डलिनी’ कहने लगे। कुण्डलिनी शब्द, देखा जाय तो सर्प की कुण्डली से लिया गया है।
तन्त्र का दूसरा विषय है–‘षट्चक्र’। योग और तन्त्र दोनों में षट्चक्र अपना समान महत्व रखता है। यही एक विषय है जो योग और तन्त्र एक दूसरे पर आश्रित कराता है।
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि परामानसिक चेतना के व्यष्टि रूप को तन्त्र में ‘कुण्डलिनी शक्ति’ कहते हैं। यह महाशक्ति है।
इसी का एक महत्वपूर्ण अल्प अंश चेतना के रूप में शरीर में क्रियाशील है और शेष सुप्तावस्था में है यानी निष्क्रिय है। सुप्तावस्था से जगाना यानी निष्क्रिय से क्रियाशील बनाना ही ‘कुण्डलिनी-जागरण’ है।
अब षट्चक्र पर विचार करते हैं।
वास्तव में यदि देखा जाय तो चक्रों की कुल संख्या नौ है–मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूरक चक्र, अनाहद चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्त्रार चक्र, शक्ति चक्र और ब्रह्माण्ड चक्र। इनमें से पांच चक्र क्रमशः रीढ़ की हड्डी पर स्थित है.
आज्ञा चक्र भ्रूमध्य में स्थित है। सहस्त्रार चक्र अधोलघु मस्तिष्क में स्थित है। ब्रह्माण्ड चक्र मुख्य मस्तिष्क और अधो लघुमस्तिष्क के बीच में स्थित है। शक्ति चक्र पेट के नीचेे स्थित है जिसका रूप बिच्छू के समान है और रंग भी वैसा ही है।
यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि शक्ति चक्र को छोड़कर कोई भी चक्र स्त्री में नहीं होता, कुण्डलिनी शक्ति भी नहीं। स्त्री का जो गर्भाशय है, वही शक्ति चक्र है जिसे मातृ चक्र भी कहते हैं। स्त्री को मातृत्व लाभ उसी चक्र से होता है। इनके अलावा पुरुष के पेट में बायीं ओर ‘प्राण चक्र’ होता है जिस पर ध्यान केंद्रित करके सूक्ष्मशरीर को स्थूल शरीर से अलग किया जाता है।
तांत्रिक साधना के मूल में ‘काम’ और ‘सौंदर्य’ है। तन्त्र ने काम और सौंदर्य को भौतिक स्तर से उठाकर उनका प्रकृति से तादात्मीकरण का अभिनव कार्य किया है। काम और सौंदर्य–दोनों का योग-तन्त्र में मणिकांचन योग है.
दोनों के देहान्तरण की प्रक्रिया में काम को लेकर जिस अतीन्द्रिय सौंदर्य की सृष्टि हुई, उसमें क्षीणता, नश्वरता और नकार के स्थान पर एक सार्वभौमिक सत्य की स्वीकृति देखी गयी। भारतीय वाङ्गमय में ‘पुरुषार्थ चतुष्टय'(धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) के समान सत्य, शिव और सुन्दर जीवन की सार्थकता प्रतिबिंबित करने लगे। तन्त्र की शक्ति ‘काम’ है, इसलिए उसे कामेश्वरी भी कहते हैं।
‘कामेश्वरी’ कामेश्वर यानी शिव की शक्ति है। तन्त्र कामेश्वरी के सौंदर्य का साक्षी है–इसमें सन्देह नहीं।
गीता में जिस दैवी सम्पदा और आसुरी सम्पदा की चर्चा की गई है, तन्त्र उनको ‘सदवृत्ति’ और ‘असदवृत्ति’ कहता है।
सदवृत्ति वाला व्यक्ति ही तन्त्र-साधना पर चल सकता है और सफलता भी प्राप्त कर सकता है।
मेरी दृष्टि में गीता जैसा कोई योग-ग्रंथ नहीं है और दुर्गा सप्तशती जैसा कोई तन्त्र-ग्रन्थ भी नहीं है। दुर्गा सप्तशती के प्रत्येक श्लोक का अपना बीजाक्षर मन्त्र है.
वर्तमान परिदृश्य में जनसाधारण की मानसिकता यह है कि मदिरा, मांस, मैथुन, नारी, शव, खोपड़ी, श्मशान, चिता, बलि आदि का समायोजन ही तन्त्र-साधना की इतिश्री है। नहीं, कदापि नहीं।
यह भ्रम है। यह सत्य है कि तन्त्र की तमोगुणी साधना में वे सब उपादान हैं और उनका अगोचर सम्बन्ध तमोगुणी आत्माओं से है किन्तु उन वस्तुओं का उपयोग करना साधारण व्यक्ति के वश की बात नहीं है।
जो उन वस्तुओं के गूढ़ तत्वों को समझेगा, वही उनका सही ढंग से उपयोग कर सकेगा और लाभान्वित भी हो सकेगा।
तन्त्र के मुख्य विषयों में षट्कर्म-साधना भी है। उसका आध्यात्मिक रूप भी है और तांत्रिक रूप भी। तांत्रिक रूप का सम्बन्ध मस्तिष्क की कोशिकाओं से है, जबकि आध्यात्मिक रूप भाव प्रधान है।
यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो तंत्रशास्त्र गहन, गम्भीर, विशाल सागर के समान है–इसमें सन्देह नहीं।
आप तंत्र-साधना पथ के मेरे तमाम अनुभव और साधनाओं से संबंधित अनेक घटनाक्रम पढ़ चुके हैं. मैने इस विद्या में महारत व्यवसाय के उद्देश्य से नहीं, स्वांत-सुखाय के उद्देश्य से हासिल की. जो आप नहीं देख पाते, जो आप नहीं अर्जित क़र पाते : वह है ही नहीं, यह मान लेना अपाहिजनेश है.
_आपको सब जानना, देखना, अनुभव करना या पाना है तो आप समय दें – और कुछ मत दें. हम आपको यह स्वीकर करा देंगे की : असंभव कुछ-भी नहीं है._ ![]()





