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आधारभूत चिंतन : हमारी आत्माएं अलग-अलग हैं या एक?

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 डॉ. विकास मानव

    एक सुधी सज्जन ने लिखा : यदि मां के पेट में पुरुष और स्त्री आत्मा के जन्मने के लिए अवसर पैदा करते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आत्माएं अलग- अलग हैं और सर्वव्यापी आत्मा नहीं है। अद्वैत दर्शन कहता है कि एक ही सत्य है. एक ही परमात्मा है. एक ही आत्मा है. ये दोनों बातें तो कंट्राडिक्टरी विरोधी हैं।

     ये दोनों बातें विरोधी नहीं हैं। परमात्मा तो एक ही है, आत्मा तो वस्तुत: एक ही है, लेकिन शरीर दो प्रकार के हैं। एक शरीर जिसे हम स्थूल शरीर कहते हैं, जो हमें दिखाई पड़ता है, एक शरीर जो सूक्ष्म शरीर है, जो हमें दिखाई नहीं पड़ता है।

     एक शरीर की जब मृत्यु होती है, तब स्थूल शरीर तो गिर जाता है, लेकिन जो सूक्ष्म शरीर है, वह जो सटल बाडी है, वह नहीं मरती है। आत्मा दो शरीरों के भीतर वास कर रही है, एक सूक्ष्म शरीर और एक स्थूल शरीर। मृत्यु के समय स्थूल शरीर गिर जाता है। यह जो मिट्टी —पानी से बना हुआ शरीर है, यह जो हड्डी—मांस —मज्जा की देह है, यह गिर जाती है।

       फिर अत्यंत सूक्ष्म विचारों का, सूक्ष्म संवेदनाओं का, सूक्ष्म वायब्रेशंस का, सूक्ष्म तंतुओं का शरीर शेष रह जाता है।

        वह तंतुओं से घिरा हुआ शरीर आत्मा के साथ फिर यात्रा शुरू करता है और फिर नए जन्म के लिए स्थूल शरीर में प्रवेश करता है। जब एक मां के पेट में नई आत्मा का प्रवेश होता है, तो उसका अर्थ है सूक्ष्म शरीर का प्रवेश। मृत्यु के समय सिर्फ स्थूल शरीर गिरता है, सूक्ष्म शरीर नहीं।

     लेकिन परम मृत्यु के समय—जिसे हम मोक्ष कहते हैं —उस परम मृत्यु के समय स्थूल शरीर के साथ ही सूक्ष्म शरीर भी गिर जाता है। फिर आत्मा का कोई जन्म नहीं होता, फिर वह आत्मा विराट में लीन हो जाती है। वह जो विराट में लीनता है, वह एक ही है। जैसे एक बूंद सागर में गिर जाती है।

*समझने योग्य 03 जरूरी बातें :*    

    आत्मा का तत्व एक है। उस आत्मा के तत्व के संबंध में आकर दो तरह के शरीर सक्रिय होते हैं—एक स्थूल शरीर और एक सूक्ष्म शरीर। स्थूल शरीर से हम परिचित हैं, सूक्ष्म शरीर से योगी परिचित होता है। और योग के भी जो ऊपर उठ जाते हैं, वे उससे परिचित होते हैं जो आत्मा है।

       सामान्य आंखें देख पाती हैं स्थूल शरीर को। योग —दृष्टि, ध्यान देख पाता है सूक्ष्म शरीर को। लेकिन ध्यानातीत, बियांड योग, सूक्ष्म के भी पार, उसके भी आगे जो शेष रह जाता है, उसका तो समाधि में अनुभव होता है।

     ध्यान से भी जब व्यक्ति ऊपर उठ जाता है, तो समाधि फलित होती है। और उस समाधि में जो अनुभव होता है, वह परमात्मा का अनुभव है।

साधारण मनुष्य का अनुभव शरीर का अनुभव है, साधारण योगी का अनुभव सूक्ष्म शरीर का अनुभव है, परम योगी का अनुभव परमात्मा का अनुभव है। परमात्मा एक है, सूक्ष्म शरीर अनंत हैं, स्थूल शरीर अनंत हैं।

      वह जो सूक्ष्म शरीर है, वह है कॉजल बाडी। वह जो सूक्ष्म शरीर है, वही नए स्थूल शरीर ग्रहण करता है। हम यहां देख रहे हैं कि बहुत से बल्‍ब जले हुए हैं। विद्युत तो एक है, विद्युत बहुत नहीं है। वह ऊर्जा, वह शक्ति, वह इनर्जी एक है, लेकिन दो अलग बल्बों से वह प्रकट हो रही है।

      बल्‍ब का शरीर अलग — अलग है, उसकी आत्मा एक है। हमारे भीतर से जो चेतना झांक रही है, वह चेतना एक है। लेकिन उस चेतना के झांकने में दो उपकरणों का, दो वेहिकल्स का प्रयोग किया गया है। एक सूक्ष्म उपकरण है, सूक्ष्म देह; और दूसरा उपकरण है, स्थूल देह।

हमारा अनुभव स्थूल देह तक ही रुक जाता है। यह जो स्थूल देह तक रुक गया अनुभव है, यही मनुष्य के जीवन का सारा अंधकार और दुख है। लेकिन कुछ लोग सूक्ष्म शरीर पर भी रुक सकते हैं। जो लोग सूक्ष्म शरीरों पर रुक जाते हैं, वे ऐसा कहेंगे कि आत्माएं अनंत हैं।

     लेकिन जो सूक्ष्म शरीर के भी आगे चले जाते हैं, वे कहेंगे, परमात्मा एक है, आत्मा एक है, ब्रह्म एक है।

       इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है। इसका अर्थ है वह आत्मा जिसका अभी सूक्ष्म शरीर गिर नहीं गया है। इसलिए जो आत्मा परम मुक्ति को उपलब्ध हो जाती है, उसका जन्म —मरण बंद हो जाता है।

    आत्मा का तो कोई जन्म —मरण है ही नहीं, वह तो न कभी जन्मी है और न कभी मरेगी। वह जो सूक्ष्म शरीर है, वह भी समाप्त हो जाने पर कोई जन्म —मरण नहीं रह जाता है। क्योंकि सूक्ष्म शरीर ही कारण बनता है नए जन्मों का।

      सूक्ष्म शरीर का अर्थ है, हमारे विचार, हमारी कामनाएं, हमारी वासनाएं, हमारी इच्छाएं, हमारे अनुभव, हमारा शान, इन सबका जो संग्रहीभूत, जो इंटिग्रेटेड सीड है, इन सबका जो बीज है, वह हमारा सूक्ष्म शरीर है। वही हमें आगे की यात्राओं पर ले जाता है।

     लेकिन जिस मनुष्य के सारे विचार नष्ट हो गए, जिस मनुष्य की सारी वासनाएं क्षीण हो गईं, जिस मनुष्य की सारी इच्छाएं विलीन हो गईं, जिसके भीतर अब कोई भी इच्छा शेष न रही, उस मनुष्य को जाने के लिए कोई जगह नहीं बचती, जाने का कोई कारण नहीं रह जाता। जन्म की कोई वजह नहीं रह जाती।

*एक दृष्टांत :*

     विवेकानंद के गुरू रामकृष्ण को जो लोग बहुत निकट से जानते थे, उन सबको यह बात जानकर अत्यंत कठिनाई होती थी कि रामकृष्ण जैसा परमहंस, रामकृष्ण जैसा समाधिस्थ व्यक्ति भोजन के संबंध में बहुत लोलुप था। रामकृष्ण भोजन के लिए बहुत आतुर होते थे और भोजन के लिए इतनी प्रतीक्षा करते थे कि कई बार उठकर चौके में पहुंच जाते और पूछते शारदा को, बहुत देर हो गई, क्या बन रहा है आज?

     ब्रह्म की चर्चा चलती और बीच में ब्रह्म —चर्चा छोड्कर पहुंच जाते किचन में और पूछने लगते, क्या बना है आज? और खोजने लगते। शारदा ने भी उन्हें कहा कि आप क्या करते हैं ऐसा? लोग क्या सोचते होंगे कि ब्रह्म की चर्चा छोड्कर एकदम अन्न की चर्चा पर आप उतर आते हैं! रामकृष्ण हंसते और चुप रह जाते।

      उनके शिष्यों ने भी उन्हें बहुत बार कहा कि इससे बहुत बदनामी होती है। लोग कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति क्या ज्ञान को उपलब्ध हुआ होगा, जिसकी अभी रसना, जिसकी अभी जीभ इतनी लालायित होती है भोजन के लिए!

      एक दिन उनकी पत्नि शारदा ने बहुत कुछ भला —बुरा कहा तो रामकृष्ण ने कहा कि पागल, तुझे पता नहीं, जिस दिन मैं भोजन के प्रति अरुचि प्रकट करूं, तू समझ लेना कि अब मेरे जीवन की यात्रा केवल तीन दिन और शेष रह गई।

     बस तीन दिन से ज्यादा फिर मैं जीऊंगा नहीं। जिस दिन भोजन के प्रति मेरी उपेक्षा हो, तू समझ लेना कि तीन दिन बाद मेरी मौत आ गई है।   

      शारदा कहने लगी, इसका अर्थ? रामकृष्ण कहने लगे, मेरी सारी वासनाएं क्षीण हो गई हैं, मेरी सारी इच्छाएं विलीन हो गई हैं, मेरे सारे विचार नष्ट हो गए हैं, लेकिन जगत के हित के लिए मैं रुका रहना चाहता हूं। मैं एक वासना को जबर्दस्ती पकडे हुए हूं, जैसे किसी नाव की सारी जंजीरें खुल गई हों और एक जंजीर से नाव अटकी रह गई हो, और एक जंजीर और छूट जाए तो नाव अपनी अनंत यात्रा पर निकल जाएगी। मैं चेष्टा करके रुका हुआ हूं।

      उस दिन किसी की समझ में शायद यह बात नहीं आई। लेकिन रामकृष्ण की मृत्यु के तीन दिन पहले शारदा थाली लगाकर रामकृष्ण के कमरे में गई। वे बैठे हुए देख रहे थे। उन्होंने थाली देखकर आंखें बंद कर लीं, लेट गए, और पीठ कर ली शारदा की तरफ।

      उसे एकदम से खयाल आया कि उन्होंने कहा था कि तीन दिन बाद मौत हो जाएगी, जिस दिन भोजन के प्रति अरुचि प्रकट करूं। उसके हाथ से थाली झन्नाकर नीचे गिर पड़ी, वह छाती पीट कर रोने लगी। रामकृष्ण ने कहा, रोओ मत! तुम जो कहती थीं वह बात भी अब पूरी हो गई। ठीक तीन दिन बाद रामकृष्ण की मृत्यु हो गई। एक छोटी —सी वासना को प्रयास करके वे रोके हुए थे।

      उतनी छोटी —सी वासना जीवन —यात्रा का आधार बनी थी, वह वासना भी चली गई तो जीवन—यात्रा का सारा आधार समाप्त हो गया।

*सार की बात :*

      जिन्हें हम तीर्थंकर कहते हैं, जिन्हें हम बुद्ध कहते हैं, जिन्हें हम ईश्वर के पुत्र कहते हैं, जिन्हें हम अवतार कहते हैं, उनकी भी एक ही वासना शेष रह गई होती है। और उस वासना को वे शेष रखना चाहते हैं करुणा के हित, सर्वमंगल के हित, सर्व लोक के हित। जिस दिन वह वासना भी क्षीण हो जाती है, उसी दिन जीवन की यह यात्रा समाप्त और अनंत की अंतहीन यात्रा शुरू हो जाती है।

       उसके बाद जन्म नहीं है, उसके बाद मरण नहीं है, उसके बाद उसके बाद न एक है, न अनेक है। उसके बाद तो जो शेष रह जाता है, उसे संख्या में गिनने का कोई उपाय नहीं है।

       इसलिए जो जानते हैं, वे यह भी नहीं कहते हैं कि ब्रह्म एक है, परमात्मा एक है। क्योंकि एक कहना व्यर्थ है जब कि दो की गिनती न बनती हो। एक कहने का कोई अर्थ नहीं, जब कि दो और तीन न कहे जा सकते हों। एक कहना तभी तक सार्थक है जब तक कि दो तीन चार भी सार्थक होते हैं।

          संख्याओं के बीच ही एक की सार्थकता है। इसलिए जो जानते हैं, वे यह भी नहीं कहते कि ब्रह्म एक है, वे कहते हैं, ब्रह्म अद्वैत, नानडुअल है, दो नहीं है। बहुत अदभुत बात कहते हैं। वे कहते हैं, परमात्मा दो नहीं है।

     वे यह कहते हैं कि परमात्मा को संख्या में गिनने का उपाय नहीं है, एक कहकर भी हम संख्या में गिनने की कोशिश करते हैं, वह गलत है।

     लेकिन उस तक पहुंचना तो दूर, अभी तो हम स्थूल शरीर पर खड़े हैं, उस शरीर पर, जो अनंत है, अनेक है। उस शरीर के भीतर हम प्रवेश करेंगे, तो एक और शरीर उपलब्ध होगा, सूक्ष्म शरीर। उस शरीर को भी पार करेंगे, तो वह उपलब्ध होगा, जो शरीर नहीं है, अशरीर है, जो आत्मा है।

Ramswaroop Mantri

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